भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 1035

१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ तारमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- स्वर्णमाक्षिकवद्दोषा विज्ञेयास्तारमाक्षिके। अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं शोधनं तस्य कथ्यते ।।१११।। कर्कोटीमेषशृङ्ग्युत्थैरार्द्रवैर्जम्बीरजैर्दिनम्। भावयेदातपे तीव्रे विमला शुद्ध्यति ध्रुवम् ।।११२।। रूपामाखी शोधने की विधि-सोनामाखी के जो दोष कहे हुए हैं वे ही रूपामाखी के भी समझने चाहिये। अतः उन सब दोषों को शान्त करने के लिये रूपामाखी के शोधने की विधि कहते हैं। रूपामाखी को एक दिन तक खेखसा, मेढ़ासि (शृ) ङ्गी तथा जमीरी नीबू के रस से भावना देकर तीव्र धूप में सुखाने से रूपामाखी शुद्ध हो जाती है ॥१११-११२॥ ❖ कर्कोंटी=खेखसा। मेषशृङ्गी। विमला=तारमाक्षिका ।।१११-११२।। यहाँ 'कर्कोंटी' पद से 'खेखसा' और 'मेढ़ाशृङ्गी' तथा 'विमला' पद से 'रूपामाखी का' ग्रहण करना चाहिये ।।१११- ११२॥ अथ तारमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत्। मरणं वाऽऽजमूत्रेण तारमाक्षिकमृच्छति ।।११३।। रूपामाखी के मारने की विधि-कुलथी का क्वाथ, तिल का तेल, तक्र या बकरे के मूत्र से रूपामाखी को घिस (खरल) करके अग्नि की आँच देने से रूपामाखी मर जाती है ।।११३।। अथ स्वर्णमाक्षिकरूप्यमाक्षिकयोर्विशेषगुणानाह- न केवलं स्वर्णरूप्यगुणास्तापीजयोर्मताः। द्रव्यान्तरस्य संसर्गात्सन्त्यन्येऽपि गुणास्तयोः ।।११४।। माक्षिकं मधुरं तिक्तं स्वर्यं वृष्यं रसायनम् ।।११५।। चक्षुष्यं बस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेहविषोदरम्। अर्शः शोफं क्षयं कण्डूं त्रिदोषञ्च नियच्छति ।।११६।। सोनामाखी तथा रूपामाखी के विशेष गुण-केवल सोना तथा चाँदी के ही गुण क्रम से सोनामाखी तथा रूपामाखी में नहीं रहते हैं किन्तु दूसरे-दूसरे द्रव्यों का भी संयोग होने से उनके भी गुण रहते हैं। गुण-सोनामाखी तथा रूपामाखी-मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, स्वर को उत्तम करने वाली, वीर्यवर्धक, रसायन, नेत्रों के लिये हितकर एवं बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, मेहरोग, विष, उदररोग, बवासीर, शोथ, क्षय, खुजली तथा त्रिदोष को नष्ट करने वाली होती है ।। अथाशुद्धतुत्थस्य शोधनविधिमाह- विष्ठया मर्दयेत्तुत्थं मार्जारिककपोतयोः। दशांशं टङ्कणं दत्त्वा पचेल्लघुपुटे ततः। पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैर्देयं तुत्थविशुद्धये ।।११७।। अशुद्ध तूतिया के शोधन की विधि-बिल्ली और कबूतर की विष्ठा के साथ तूतिया को खरल कर उसी में दशवाँ भाग सुहागा भी डाल कर खरल कर हलकी आग की पुट देवे तदुपरान्त पहले दही के साथ और अन्त में शहद के साथ भी खरल करके पुट देने से तूतिया शुद्ध हो जाता है ।।११७।। अथ शुद्धतुत्थखर्परयोर्गुणानाह- तुत्थकं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु ।।११८।। लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत्। विषाश्मकुष्ठकण्डूघ्नं तद्गुणं खर्परं मतम् ।।११९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA