भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८५ शुद्ध तूतिया के गुण-शुद्धतूतिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारा, वमन कराने वाला, लघु, लेखन, मल का भेदन करने वाला, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवं कफ, पित्त, विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को दूर करने वाला होता है इसी प्रकार शुद्ध खपरिया के भी ये ही सब गुण हैं ॥११८-११९॥ अथ कांस्यपित्तलयोः शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि कांस्यस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ॥१२०॥ गोमूत्रे च कुलत्थानां कषायेऽत्र त्रिधा त्रिधा । एवं कांस्यस्य रीतेश्च विशुद्धिः सम्प्रजायते ।। काँसा तथा पीतल के शोधन की विधि-काँसा के पतले-पतले पत्तरों को प्रथम आग में तपाले, पश्चात् उन्हें तपा-तपा कर तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में क्रम से प्रत्येक में तीन-तीन बार बुझावे, ऐसा करने से काँसे की शुद्धि हो जाती है । इसी प्रकार पीतल के पत्तरों की भी शुद्धि की जाती है ॥१२०-१२१॥ अथ तयोर्मारणविधिमाह- अर्कक्षीरेण सम्पिष्टो गन्धकस्तेन लेपयेत् । समेन कांस्यपत्राणि शुद्धान्यम्लद्रवैर्मुहुः ॥१२२॥ ततो मूषापुटे धृत्वा पचेद्गजपुटेन च । एवं पुटद्वयात् कांस्यं रीतिश्च म्रियते ध्रुवम् ॥१२३॥ काँसा तथा पीतल के मारने की विधि-प्रथम आक के दूध में पिसे हुये गन्धक के तौल के बराबर काँसे के शुद्ध किये हुये पत्तरों को लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से बारम्बार लगाकर खूब साफ कर ले पश्चात् उन सबों पर उक्त गन्धक का लेप कर के मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर सन्धियों को कपड़मिट्टी से बन्द कर और सुखा कर गजपुट की आँच में पकावे, इस तरह दो बार पुट देने से काँसा मर जाता है । इसी भाँति शुद्ध पीतल के पत्तरों का भी मारण होता है ॥१२२-१२३॥ अथ मारितकांस्यरीत्योर्गुणानाह- कांस्यं कषायं तीक्ष्णोष्णं लेखनं विशदं सरम् । गुरु नेत्रहितं रूक्षं कफपित्तहरं परम् ॥१२४॥ रीतिका तु भवेद् रूक्षा सतिक्ता लवणा रसे । शोधनी पाण्डुरोगघ्नी कृमिहृन्नातिलेखनी ॥१२५॥ मारे हुये काँसा तथा पीतल के गुण-काँसा-कषायरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, लेखन तथा विशदगुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिये हितकर, रूक्ष एवं कफ तथा पिन का अत्यन्त नाशक होता है । पीतल-तिक्त तथा लवणरसयुक्त, रूक्ष, देह का शोधन करने वाला, पाण्डुरोगनाशक, कृमि को दूर करने वाला एवं अत्यन्त लेखनगुणयुक्त नहीं होता अर्थात् किंचित् लेखन गुण युक्त होता है ॥१२४-१२५॥ अथ सिन्दूरस्य शोधनबिधिमाह- दुग्धाम्लयोगतस्तस्य विशुद्धिर्गदिता बुधैः ॥१२६॥ सिन्दूर के शोधने की विधि-सिन्दूर को दूध तथा अम्लपदार्थ नींबू आदि के रस में दो प्रहर तक अलग-अलग खरल करने से उसकी शुद्धि होती है ॥१२६॥ अथ सिन्दूरस्य गुणानाह- सिन्दूर उष्णो वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहः । भग्नसन्धानजननो व्रणशोधनरोपणः ॥१२७॥ सिन्दूर के गुण-शुद्ध सिन्दूर-उष्ण, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करने वाला, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला तथा व्रण का शोधन एवं रोपण करने वाला होता है ॥१२७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA