भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ
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९८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शिलाजतुनो लक्षणं शोधनविधिश्चाह- गोमूत्रगन्धवत्कृष्णं स्निग्धं मृदु तथा गुरु। तिक्तं कषायं शीतञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ।।१२८।। शिलाजीत के लक्षण-जिसमें गोमूत्र के समान गन्ध हो तथा जो देखने में काले रङ्ग का हो एवं स्निग्ध, कोमल, गुरु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतल हो ऐसे शिलाजीत को उत्तम समझना चाहिये। यह लोहे का उपधातु है ।।१२८।।
- आयसम् = अयउपधातुसम्बन्धि ।। १२८ ।। यहाँ 'आयसम्' पद का 'लोहे का उपधातु' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२८।। विन्ध्यादौ बहुलं तत्तु यत्र लौहं यतोऽधिकम् । तच्छोधनमृते व्यर्थमनेकमलमेलनात् ।।१२९।। शिलाजतु समानीय सूक्ष्मं खण्डं विधाय च । निक्षिप्यात्युष्णपानीये यामैकं स्थापयेत्सुधीः ।।१३०।। मर्दयित्वा ततो नीरं गृह्णीयाद्वस्त्रगालितम् । स्थापयित्वा च मृत्पात्रे धारयेदातपे बुधः ।।१३१।। उपरिस्थं घनं यत्स्यात्तत्क्षिपेदन्यपात्रके । एवं पुनः पुनर्नोतं द्विमासाभ्यां शिलाजतु ।।१३२।। भवेत्कार्यक्षमं वह्नौ क्षिप्तं लिङ्गोपमं भवेत् । निर्धूमञ्च ततः शुद्धं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।१३३।। शोधनविधि-यह (शिलाजीत) विन्ध्य आदि पहाड़ों पर अधिकतर पाया जाता है, क्योंकि वहाँ लोहा अधिक रूप से होता है। शिलाजीत में अनेक प्रकार के मलों का मेल होने से बिना शोधन किये हुए कार्य में लेने योग्य नहीं होता है। अतः प्रथम शिलाजीत को लाकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर अत्यन्त गरम जल में एक प्रहर तक रहने दे पश्चात् उसी जल में उसे खूब मल कर कपड़े से छान ले और छने हुए जल को मिट्टी के पात्र में रख कर धूप में रख दे। तत्पश्चात् जो उसके ऊपर उतराया हुआ घन भाग हो उसे धीरे से निकाल कर एक दूसरे पात्र में रख दे इस तरह से बारम्बार ऊपर तैरते हुये मलाई के समान घन भाग को निकाल कर एक दूसरे पात्र में रखता जाय, इस भाँति दो मास तक करने से जब ऊपर की मलाई पड़नी बन्द हो जाय तब नीचे के काले बैठे हुये भाग को निकाल लेना चाहिये। यही भाग शिलाजीत का कार्य में लेने योग्य होता है और वह आग में डालने से लिङ्ग के समान हो जाता है तथा उससे धूआँ नहीं निकलता। ऐसा जब शिलाजीत हो जाता है तब उसे शुद्ध समझना चाहिये और हर एक कार्य में उसका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९-१३३।। अथान्यं प्रकारमाह- तत्र प्रथमतस्तस्य बहिर्मलमपाकर्त्तुं केवलजलेन प्रक्षालनं कर्त्तव्यं, ततस्तदन्तर्गतमृत्ति, कासिकतादि- दोषदूरीकरणाय वक्ष्यमाणक्वाथेन तत्र भावना देयेत्यत्र वाग्भटस्य मतमाह, तद्यथा- व्याधिव्याधितसात्म्यं समनुसरन् भावयेद्वयःपात्रे । प्राक् केवलजलधौतं शुष्कं क्वाथैस्ततो भाव्यम् ।।१३४।। तुल्यं गिरिजेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्काथ्यम् । तत्क्वाथे पादांशे पूतोष्णे प्रक्षिपेद् गिरिजम् ।।१३५।। तत्समरसतां यातं संशुष्कं प्रक्षिपेद्रसे भूयः । स्वैः स्वैरैवं क्वाथैर्भाव्यं वारान् भवेत्तु सप्त ।।१३६।। अथ स्निग्धस्य शुद्धस्य वृतं तिक्तकसाधितम् । त्र्यहं युञ्जीत गिरिsurface गिरिर्जैकैकन तथा त्र्यहम् ।।१३७।। फलत्रयस्य यूषेण पटोल्या मधुकस्य च शिलाजमेवं देहस्य भवत्यत्युपकारकम् ।।१३८।। शिलाजीत शोधने की दूसरी विधि-प्रथम शिलाजीत के बाहरी मल को दूर करने के लिये उसे केवल जल से धोवे, उसके बाद उसके अन्दर रहने वाली मिट्टी, बालू आदि दोष को दूर करने के लिये आगे कहे जाने वाले क्वाथ से उसमें भावना देनी चाहिये। इसी विषय में 'वाग्भट' का मत यह है कि-रोग तथा रोगी के लिये जो सात्म्य अर्थात् हितकर द्रव्य हो उसका विचार करते हुये उसी द्रव्य के क्वाथ से शिलाजीत को लोहे के पात्र में रख कर भावना देनी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA