भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८७ चाहिये। उसका प्रकार यह है कि—प्रथम केवल जल से शिलाजीत को धोकर सुखा ले पश्चात् क्वाथ से भावना देवे और उस क्वाथ के बनाने में जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो उसे शिलाजीत के बराबर भाग में लेकर अठगुने जल में पकावे और जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तब छान कर गरम-गरम रहते ही उसमें शिलाजीत को छोड़ दे। जब वह पानी में खूब घुल जाय तब सुखा डाले, पश्चात् पुनः उक्त प्रकार से दूसरा क्वाथ बना कर उसमें फिर से सूखे पूर्वोक्त शिलाजीत को डाल कर घुल जाने पर सुखा डाले इस प्रकार कुल सात भावना क्वाथ से दे। उसके बाद रोगी को स्निग्ध पदार्थों के द्वारा स्नेहन तथा विरेचनादि से शोधन करके उसे तिक्तक (अड़ूसा, नीम, गिलोय, कटेरी तथा परवल) द्रव्यों के कल्क से सिद्ध किया हुआ घी तीन दिन तक खिलावे तत्पश्चात् एक दिन त्रिफला के क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे, दूसरे दिन परवर के जूस के साथ, तीसरे दिन मुलेठीके क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे। इस तरह यदि शिलाजीत का प्रयोग किया जाय तो वह शरीर के लिये अत्यन्त उपकारक होता है ।।१३४-१३८।। अथ क्वाथ्यद्रव्याणां भावनाफलञ्चाह हारीतः- लोहस्थितं निम्बगुडूचिसर्पिर्यवैर्यथावत्परिभावयेत्तत्। सन्तानिकाकीटपतङ्गदंशदुष्टौषधीदोषनिवारणाय ।।१३९।। जिन द्रव्यों का क्वाथ बनाया जाता है उनकी भावना देने के फल के विषय में 'हारीत' का मतशिलाजीत के बाहर भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई, कीट, पतङ्ग (फतिङ्गा), डाँस, मच्छर आदि तथा दुष्ट ओषधियों के दोष को दूर करने के लिये लोह के पात्र में शिलाजीत को देख कर नीम, गिलोय और जौ का क्वाथ एवं घी की यथोक्त रूप से भावना देवे ।।१३९।। ❖ सन्तानिका=तद्बहिःसंलग्नमृत्तिकादिमयी ।।१३९।। यहाँ 'सन्तानिका' पद का 'शिलाजीत के बाहरी भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३९।। एवं भावनां दत्त्वा संशोष्य केवलेन जलेन शोधनं कर्त्तव्यं तत्प्रकारमाहाग्निवेशः- उष्णे च काले रवितापयुक्ते व्यभ्रे निवाते समभूमिभागे । चत्वारि पात्राण्यसितायसानि न्यस्यातपे तत्र कृतावधानः ।।१४०।। शिलाजतु श्रेष्ठमवाप्य पात्रे प्रक्षिप्य तस्माद् द्विगुणञ्च तोयम् । उष्णं तदूर्ध्वं क्वथितञ्च दत्त्वा विशोधयेत्तन्मृदितं यथावत् ।।१४१।। ततस्तु यत्कृष्णमुपैति चोर्ध्वं सन्तानिकावद्रविरश्मितप्तम् । पात्रे तदन्यत्र ततो निदध्यात्तत्रापरं कोष्णजलं क्षिपेच्च ।।१४२।। पुनश्च तस्मादपरत्र पात्रे पश्चाच्च पात्रादपरत्र भूयः । यदा विशुद्धं जलमेवमूर्ध्वं कृष्णं समस्तं मलमेत्यधस्तात् । तदा त्यजेत्तत्सलिलं भलञ्च शिलाजतु स्याज्जलशुद्धमेवम् ।।१४३।। इस प्रकार भावना देकर और सुखा कर पश्चात् केवल जल से साफ करना चाहिये, उसका प्रकार 'अग्निवेश' महर्षि कहते हैं कि—ग्रीष्मऋतु में जब सूर्य का ताप (धूप) अधिक हो, आकाश मेघ से रहित दीख पड़ता हो तथा हवा न चलती हो ऐसे समय में किसी समतल भूमि पर धूप में काले लोहे के पात्र रख कर एक में उत्तम शिलाजीत सावधानी से लाकर रख दे और उसी में जो जलते-जलते आधा शेष रह गया हो ऐसा दूना गरम जल छोड़ दे तथा इसमें शिलाजीत को खूब मल कर मिला दे इसके बाद जो सूर्य की किरणों से तप कर ऊपर काली सी मलाई पड़ जावे उसे धीरे से उठा कर दूसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें गरम जल थोड़ा छोड़ दे फिर उसमें भी जब मलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर तीसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें भी गरम जल थोड़ा छोड़ दे, जब इसमें भी भलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर चौथे लोहे के पात्र में रख कर ऊपर से गरम जल कुछ छोड़ दे ऐसा करते-करते ऊपर केवल उत्तम निर्मल जल रह जाता है और काला मल नीचे बैठ जाता है। ऐसा जब हो जाय तब जल को निकाल कर फेंक दे और नीचे बैठा हुआ जो काला सा पदार्थ होता है वही जल से शुद्ध शिलाजीत होता है ।।१४०-१४३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA