भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1039, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें९८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शोधितशिलाजतुनो गुणानाह- शिलाजतु स्मृतं तिक्तं कटूष्णं कटुपाकि च । रसायनं योगवाहि श्लेष्ममेहाश्मशर्कराः ।। १४४ ।। मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं शोधमर्शसि पाण्डुताम् । वातरक्तं तथा कुष्ठपस्मारोदरं हरेत् ।। १४५ ।। शुद्ध किये हुये शिलाजीत के गुण-शोधित शिलाजीत तिक्त तथा कटु रसयुक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन, योगवाही और कफ, मेहरोग, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, वातरक्त, कुष्ठ, मिर्गी तथा उदर रोग को दूर करने वाला होता है ॥१४४-१४५॥ अथ रसस्य शोधनविधिमाह । तत्रादौ स्वेदनमाह- नानाधान्यैर्यथाप्राप्तैस्तुषवजैर्जलान्वितैः । मृद्भाण्डं पूरितं रक्षेद्यावदम्लत्वमाप्नुयात् ।। १४६ ।। तन्मध्ये भृङ्गराङ् मुण्डी विष्णुकान्ता पुनर्नवा । मीनाक्षी चैव सर्पाक्षी सहदेवी शतावरी ।। त्रिफला गिरिकर्णी च हंसपादी च चित्रकम् । समूलं कुट्टयित्वा तु यथालाभं विनिक्षिपेत् ।। रस के शोधने की विधियों में प्रथम स्वेदन की विधि-एक मिट्टी के पात्र में जितने धान्य उस समय मिल सकें उन सबों की भूसी अलग कर केवल धान्यों को रखकर ऊपर से जल भी पूर्णरूप से भरकर तक रख दे जब तक खट्टापन न आजावे अर्थात् कांजी न बन जाय पश्चात् उस कांजी युक्त पात्र में भांगरा, गोरखमुण्डी, कोयल, पुनर्नवा, मछेछी, सरहटी, सहदेई, शतावर, त्रिफला (हरड़ बहेरा, आँवला), सफेद फूल की कोयल, हंसराज और चीता इन सबों को जहाँ तक मिल सके वहाँ तक जड़ के सहित ही कूट कर डाल दे ॥१४६-१४८॥ ❖ विष्णुकान्ता गिरिकर्णी चापराजितैव श्वेतनीलपुष्पभेदात् ।। १४६-१४८ ।। यहाँ 'विष्णुकान्ता तथा गिरिकर्णी' इन दोनों से श्वेत तथा नील फूलों के भेद से कोई दो प्रकार की अपराजिता (कोयल) होती है उसी का ग्रहण करना चाहिये ॥१४६-१४८॥ पूर्वाम्लभाण्डमध्ये तु धान्याम्लकमिदं स्मृतम् । स्वेदनादिषु सर्वत्र रसराजस्य योजयेत् । अत्यम्लमारनालं वा तदभावे प्रयोजयेत् ॥१४९॥ पूर्वोक्त कांजी युक्त पात्र में उक्त ओषधियों के छोड़ने से उस कांजी का नाम 'धान्याम्लक' होता है। उसका पारा के स्वेदन आदि कार्यों में सर्वत्र प्रयोग किया जाता है। धान्याम्ल के अभाव में अत्यन्त खट्टी कांजी का भी प्रयोग किया जाता है ॥१४९॥ ❖ तदभावे=धान्याम्लाभावे ।। १४९ ।। यहाँ 'तदभावे' पद का 'धान्याम्ल के अभाव में' यह अर्थ करना चाहिये ॥१४९॥ त्र्यूषणं लवणं राखी रजनी त्रिफलाऽऽर्द्रकम् । महाबला नागबला मेघनादः पुनर्नवा ।। १५० ।। मेषशृङ्गी चित्रकञ्च नवसारं समं समम् । एतत्समस्तं व्यस्तं वा पूर्वाम्लेनैव पेषयेत् ।। १५१ ।। प्रलिम्पेत् तेन कल्केन वस्त्रमङ्गुलमात्रकम् ।। १५२ ।। तन्मध्ये निक्षेपेत्सूतं बद्ध्वा तत्त्रिदिनं पचेत् । दोलायन्त्रेऽम्लसंयुक्ते जायते स्वेदितो रसः ।। इसके बाद सोंठ, पीपर, मिर्च, सेंधा नमक, राई, हरदी, त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), अदरक, महाबला (सहदेई, नागबला (गंगेरन), चौलाई (शाक), पुनर्नवा, मेढ़ाशृङ्गी, चीता, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर एकत्र अथवा अलग-अलग उक्त धान्याम्लक से पीस कर कल्क सा बना ले और उसी कल्क से एक वस्त्र के ऊपर एक अंगुल