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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

९८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शोधितशिलाजतुनो गुणानाह- शिलाजतु स्मृतं तिक्तं कटूष्णं कटुपाकि च । रसायनं योगवाहि श्लेष्ममेहाश्मशर्कराः ।। १४४ ।। मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं शोधमर्शसि पाण्डुताम् । वातरक्तं तथा कुष्ठपस्मारोदरं हरेत् ।। १४५ ।। शुद्ध किये हुये शिलाजीत के गुण-शोधित शिलाजीत तिक्त तथा कटु रसयुक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन, योगवाही और कफ, मेहरोग, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, वातरक्त, कुष्ठ, मिर्गी तथा उदर रोग को दूर करने वाला होता है ॥१४४-१४५॥ अथ रसस्य शोधनविधिमाह । तत्रादौ स्वेदनमाह- नानाधान्यैर्यथाप्राप्तैस्तुषवजैर्जलान्वितैः । मृद्भाण्डं पूरितं रक्षेद्यावदम्लत्वमाप्नुयात् ।। १४६ ।। तन्मध्ये भृङ्गराङ् मुण्डी विष्णुकान्ता पुनर्नवा । मीनाक्षी चैव सर्पाक्षी सहदेवी शतावरी ।। त्रिफला गिरिकर्णी च हंसपादी च चित्रकम् । समूलं कुट्टयित्वा तु यथालाभं विनिक्षिपेत् ।। रस के शोधने की विधियों में प्रथम स्वेदन की विधि-एक मिट्टी के पात्र में जितने धान्य उस समय मिल सकें उन सबों की भूसी अलग कर केवल धान्यों को रखकर ऊपर से जल भी पूर्णरूप से भरकर तक रख दे जब तक खट्टापन न आजावे अर्थात् कांजी न बन जाय पश्चात् उस कांजी युक्त पात्र में भांगरा, गोरखमुण्डी, कोयल, पुनर्नवा, मछेछी, सरहटी, सहदेई, शतावर, त्रिफला (हरड़ बहेरा, आँवला), सफेद फूल की कोयल, हंसराज और चीता इन सबों को जहाँ तक मिल सके वहाँ तक जड़ के सहित ही कूट कर डाल दे ॥१४६-१४८॥ ❖ विष्णुकान्ता गिरिकर्णी चापराजितैव श्वेतनीलपुष्पभेदात् ।। १४६-१४८ ।। यहाँ 'विष्णुकान्ता तथा गिरिकर्णी' इन दोनों से श्वेत तथा नील फूलों के भेद से कोई दो प्रकार की अपराजिता (कोयल) होती है उसी का ग्रहण करना चाहिये ॥१४६-१४८॥ पूर्वाम्लभाण्डमध्ये तु धान्याम्लकमिदं स्मृतम् । स्वेदनादिषु सर्वत्र रसराजस्य योजयेत् । अत्यम्लमारनालं वा तदभावे प्रयोजयेत् ॥१४९॥ पूर्वोक्त कांजी युक्त पात्र में उक्त ओषधियों के छोड़ने से उस कांजी का नाम 'धान्याम्लक' होता है। उसका पारा के स्वेदन आदि कार्यों में सर्वत्र प्रयोग किया जाता है। धान्याम्ल के अभाव में अत्यन्त खट्टी कांजी का भी प्रयोग किया जाता है ॥१४९॥ ❖ तदभावे=धान्याम्लाभावे ।। १४९ ।। यहाँ 'तदभावे' पद का 'धान्याम्ल के अभाव में' यह अर्थ करना चाहिये ॥१४९॥ त्र्यूषणं लवणं राखी रजनी त्रिफलाऽऽर्द्रकम् । महाबला नागबला मेघनादः पुनर्नवा ।। १५० ।। मेषशृङ्गी चित्रकञ्च नवसारं समं समम् । एतत्समस्तं व्यस्तं वा पूर्वाम्लेनैव पेषयेत् ।। १५१ ।। प्रलिम्पेत् तेन कल्केन वस्त्रमङ्गुलमात्रकम् ।। १५२ ।। तन्मध्ये निक्षेपेत्सूतं बद्ध्वा तत्त्रिदिनं पचेत् । दोलायन्त्रेऽम्लसंयुक्ते जायते स्वेदितो रसः ।। इसके बाद सोंठ, पीपर, मिर्च, सेंधा नमक, राई, हरदी, त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), अदरक, महाबला (सहदेई, नागबला (गंगेरन), चौलाई (शाक), पुनर्नवा, मेढ़ाशृङ्गी, चीता, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर एकत्र अथवा अलग-अलग उक्त धान्याम्लक से पीस कर कल्क सा बना ले और उसी कल्क से एक वस्त्र के ऊपर एक अंगुल

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम्. १८९ मोटा लेप करके उसी के अन्दर पारे को बाँध कर कांजी भरे हुये दोलायन्त्र में लटका कर तीन दिन तक पकावे, ऐसा करने से पारे का स्वेदन होता है ॥१५०-१५३॥ ❖ मेघनादः= 'चौलाई' इति शाकविशेषः । मेषशृङ्गी (मेढ़ाशृङ्गी), तदभावे 'कर्कटशृङ्गी' ग्राह्या । नवसारं=नवसादरम् ।।१५०-१५३।। यहाँ 'मेघनाद' पद का 'चौलाई (शाकविशेष)' तथा 'मेषशृङ्गी' पद का 'मेढ़ाशृङ्गी' अर्थ समझना चाहिये। इसके अभाव में 'काकड़ाशिंगी' लेना चाहिये एवं 'नवसारम्' पद से 'नवसादर' समझना चाहिये ॥१५०-१५३॥ अन्यच्च- मूलकानलसिन्धूत्थत्र्यूषणार्द्रकराजिकाः । रसस्य षोडशांशेन द्रव्यं युञ्ज्यात् पृथक्पृथक् ।। द्रव्येष्वनुक्तमानेषु मतं मानमितं बुधैः । पट्टावृतेषु चैतेषु सूतं प्रक्षिप्य काञ्जिके ।।१५५।। स्वेदयेद्दिनमेकञ्च दोलायन्त्रेण बुद्धिमान् । स्वेदात्तीव्रो भवेत्सूतौ मर्दनाच्च सुनिर्मलः ।। १५६ ।। अन्य प्रकार - मूली, चीता, सेंधा नमक, सोंठ, पीपर, मिर्च, अदरख और राई इनमें से प्रत्येक पदार्थ पारे से सोलहवाँ भाग लेकर कल्क (चटनी) के समान बना डाले, 'जहाँ द्रव्यों का मान (तौल) न लिखा हो वहाँ जितने मान में द्रव्य लेने से कार्य ठीक हो उतना लेना चाहिये' यह परिभाषा सर्वत्र समझनी चाहिये, विशेषतः रसकर्म में तो अवश्य ही । पश्चात् उक्त कल्क का एक वस्त्र के ऊपर लेप करके उसके अन्दर पारा को रख कर और पोटली बना कर एक पात्र में कांजी रख कर उसी में दोला की भाँति उक्त पोटली को लटका कर दोलायन्त्र से एक दिन तक बुद्धिमान वैद्य स्वेदन करे । इस प्रकार स्वेदन कर्म करने से पारा तीव्र हो जाता है तथा आगे लिखी हुई रीति से मर्दन करने से अति निर्मल हो जाता है ।।१५४-१५६।। ❖ मूलकम् 'मुरई, मूली' वा इति लोके । अनलं=चित्रकम् । त्र्यूषणं=त्रिकुट । राजिका (राई) ।।१५४- १५६।। यहाँ 'मूलकम्' पद से 'मुरई या मूली' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वस्तु तथा 'अनल' से चित्रक (चीता)' । 'त्र्यूषणम्' से 'त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च)' और 'राजिका' से 'राई' का ग्रहण करना चाहिये ॥१५४-१५६॥ अथ मर्दनविधिमाह- इष्टिकाचूर्णचूर्णाभ्यामादौ मर्द्यो रसस्ततः । दध्ना गुडेन सिन्धूत्थराजिकागृहधूमकैः ।।१५७।। मर्दन की विधि स्वेदन के पश्चात् ईंट का चूर्ण तथा चूना से प्रथम पारे का खूब मर्दन करे उसके बाद जल से धोकर दही, गुड़, सेंधा नमक, राई और घर का धूआँ इन सबों से अलग-अलग क्रम से मर्दन करे ।।१५७।। अन्यच्च- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १५८ ।। अथवा—घीकुवार, चीता, लाल सरसों, कटेरी इनके क्वाथ से तथा त्रिफला के क्वाथ से तीन दिन तक पारे का खूब मर्दन करने से वह सम्पूर्ण मलों से छूटकर स्वच्छ हो जाता है ॥१५८॥ अथ मूर्च्छनविधिमाह- त्र्यूषणत्रिफलाबन्ध्याकन्दैः क्षुद्राद्वयान्वितैः । चित्रकोर्णानिशाक्षारकन्याऽर्ककनकद्रवैः ।।१५९।। सूतं कृतेन यूषेण वारान्सप्त विमर्दयेत् । इत्थं संमूर्च्छितः सूतस्त्यजेत्सप्तापि कञ्चुकान् ।।१६०।।

९९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूर्च्छन विधि-सोंठ, पीपल, मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, बाँझककोड़े का कन्द, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, चीता, भेड़ की ऊन, हरदी, जवाखार, घीकुवार, आक के पत्तों का रस, धतूरे के पत्तों का रस इन सबों के क्वाथ से सात बार मर्दन करने से पारा मूर्च्छित हो जाता है तथा सात प्रकार के कञ्चुक दोषों से रहित हो जाता है ॥१५९-१६०॥ ❖ बन्ध्याकन्दः=बान्दु खेखसाकन्दः (बाँझ काँकूड)। (छोटीकटाई, बड़ी कटाई)। ऊर्णा (मेषकी ऊन)। निशा=हरिद्रा। क्षारः=यवक्षारः। कन्या=कुमारिका। अर्कः=अर्कपत्ररसः। कनकद्रवः=धत्तूर- पत्ररसः ॥१५९-१६०॥ यहाँ 'बन्ध्याकन्द' से 'बाँझककोड़े का कन्द' । 'क्षुद्राद्वयम्' से 'छोटी तथा बड़ी कटेरी' । 'ऊर्णा' से 'मेष (भेड़) की ऊन' । 'निशा' से 'हरदी' । 'क्षार' से 'जवाखार' । 'कन्या' से 'घीकुवार' । 'अर्क' 'आक' से 'आक के पत्तों का रस' । 'कनकद्रव' से 'धतूरे के पत्तों का रस' समझना चाहिये ॥ अथोर्ध्वपातनविधिमाह- मयूरग्रीवताप्याभ्यां नष्टपिष्टीकृतस्य च। यन्त्रे विद्याधरे कुर्याद्रसेन्द्रस्योर्ध्वपातनम् ॥१६१॥ ऊर्ध्वपातन विधि-नीलाथोथा तथा सोनामाखी इन दोनों के साथ पारे को मिलाकर घीकुवार के रस के साथ तब खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े। पश्चात् उसे डमरूयन्त्र में रख कर भाफ द्वारा पारे को उड़ा ले। इसी को पारे का ऊर्ध्वपातन (ऊपर उड़ाना) कहते हैं ॥१६१॥ ❖ ताप्यम्=सुवर्णमाक्षिकम्। नष्टपिष्टीकृतस्य=कुमारिकाद्रवयोगेन तावन्मर्दनं कर्तव्यं यावत् पारदः पृथङ् न दृश्यत इत्यर्थः । विद्याधरयन्त्रे=डमरूयन्त्रे ॥१६१॥ यहाँ 'ताप्य' पद का 'सोनामाखी' तथा 'नष्टपिष्टीकृतस्य' पद का 'घीकुमार के रस के साथ तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े' एवं 'विद्याधरयन्त्र' पद का 'डमरूयन्त्र' अर्थ समझना चाहिये ॥१६१॥ अथाधःपातनविधिमाह- त्रिफलाशिग्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः । नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥१६२॥ ततो दीप्तैरधः पातमुपलैस्तस्य कारयेत्। यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतो विशुद्ध्यति ॥१६३॥ स्वेदनादिक्रियाभिस्तु शोधितोऽसौ यदा भवेत्। तदा कार्याणि कुरुते प्रयोज्यः सर्वकर्मसु ॥१६४॥ अधःपातन विधि-त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), सहिजना, चीता, सेंधा नमक और राई इन सबों को पारे के साथ घीकुवार के रस में तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न दिखाई पड़े। पश्चात् उन सबों को ऊपर की हाँड़ी में लेप कर भूधरयन्त्र में रख ऊपर से दहकते हुए उपलों को रख कर पारे को नीचे की हाँड़ी में गिरावे। इसी को पारे का अधः पातन कहते हैं। इससे पारा शुद्ध हो जाता है और स्वेदन आदि (स्वेदन, मूर्च्छन, ऊर्ध्वपातन, अधःपातन) क्रियाओं से जब पारा का शोधन हो जाय तब पारे को सब कामों में लेवे। अन्यथा वह अनिष्टकर होता है ॥१६२-१६४॥ अथ मुख्यदोषहरणार्थं शोधनविधिणमाह- गृहकन्या हरति मलं त्रिफलाऽग्निं चित्रको विषं हन्ति। तस्मादेभिर्मिश्रैर्वारान् संमूर्च्छयेत्सप्त ।। पारा के मुख्य दोषों को दूर करने की विधि-घीकुवार-पारा के मलदोष को दूर करता है, त्रिफला- अग्निदोष को तथा चीता-विषदोष को दूर करता है। अतः इन सबों को एकत्र कर इनमें ७ बार पारे को खरल कर मूर्च्छित करे अर्थात् एक बार का डाला रस जब खरल करते-करते सूख जाय तब पुनः रस डालकर खरल करे। इस भाँति ७ बार करे ॥१६५॥

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९१ अथ सर्वदोषहरसंक्षिप्तशोधनविधिमाह- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १६६ ।। कुमार्या च निशाचूर्णेर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढो भवति निश्चितम् ।। १६७ ।। बह्वौषधिकषायेण स्वेदितः स बली भवेत् । सर्पाक्षीचिञ्चिकाबन्ध्याभृङ्गाब्दैः स्वेदितो बली । ततः स पावकद्रावैः स्विन्नः स्यादतिदीप्तिमान् ।। १६८ ।। पारा के सम्पूर्ण दोषों को दूर करने के लिये संक्षिप्त शोधन विधि-घीकुवार, चीता, लाल सरसों और कटेरी के क्वाथ के साथ तीन दिन तक खरल करने से तथा त्रिफला के क्वाथ में भी तीन दिन तक खरल करने से पारा सब मलों से रहित हो जाता है । तत्पश्चात् घीकुवार का रस और हरदी के चूर्ण के साथ एक दिन खरल करने से पारा निश्चय नपुंसक हो जाता है । उसके बाद बहुत सी ओषधियों के क्वाथ से पारे का स्वेदन करने से वह बली हो जाता है जैसे- नागफनी, इमली, बाँझककोड़ा, भाँगरा और नागरमोथा इन सबों के क्वाथ से दोलायन्त्र में रख कर स्वेदन करने से पारा बली हो जाता है । चीता के क्वाथ से पुनः स्वेदन करने से पारा अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ।। १६६-१६८ ।। ❖ सर्पाक्षी (नागफनी), चिञ्चिका (इमली), बन्ध्या (बाँझ ककोड़ा), भृङ्गः=भृङ्गराज, अब्दः=मुस्ता, पावकः=चित्रकम् ।। १६६-१६८ ।। यहाँ 'सर्पाक्षी' से 'नागफनी' । 'चिञ्चिका' से 'इमली' । 'बन्ध्या' से 'बाँझ ककोड़ा' । 'भृङ्ग' से 'भृङ्गराज (भाँगरा)' । 'अब्द' से 'मुस्ता (नागरमोथा) और 'पावक' से 'चीता' का बोध करना चाहिये ।। १६६-१६८ ।। अथ पारदस्य मारणविधिमाह- धूमसारं रसं तोरीं गन्धकं नवसादरम् । यामैकं मर्दयेदम्लैर्भागं कृत्वा समं समम् ।। १६९ ।। काचकूप्यां विनिक्षिप्य ताञ्च मृद्वस्त्रमुद्रया । विलिप्य परितो वक्त्रे मुद्रां दत्त्वा विशोषयेत् ।। १७० ।। अधः सच्छिद्रपिठरीमध्ये कूपीं निवेशयेत् । पिठरीं बालुकापूरैर्भृत्वा चाकूपिकागलम् ।। १७१ ।। निवेश्य चुल्ल्यां तदधो वह्निं कुर्याच्छनैः शनैः । तस्मादत्यधिकं किञ्चित्पावकं ज्वालयेत्क्रमात् ।। १७२ ।। एवं द्वादशभिर्यामैर्म्रियते रस उत्तमः । स्फोटयेत्स्वाङ्गशीतं तमूर्ध्वगं गन्धकं त्यजेत् ।। १७३ ।। अधःस्थञ्च मृतं सूतं गृह्णीयातं तु मात्रया । यथोचितानुपानेन सर्वकर्मसु योजयेत् ।। १७४ ।। पारा के मारने की विधि-घर का धुआँ, पारा, फिटकिरी, गन्धक, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस में एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करे । तत्पश्चात् काँच की कूपी के चारो तरफ कपरोटी (मिट्टी लिपटे वस्त्र द्वारा लपेट) कर और उसे धूप में रख कर सुखा डाले । फिर उसी काँच की कूपी में उपर्युक्त खरल किये द्रव्यों को रख कर कूपी का मुख बन्द करके सुखा लेने के बाद एक मिट्टी के पात्र के तल भाग में छिद्र करके उसी छिद्र के ऊपर उक्त कूपी को रख उसके गले तक उक्त पात्र में बालू भर कर उसे चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे धीरे-धीरे आँच अधिक करता जाय अर्थात् प्रथम मृदु पुनः मध्यम तदनन्तर तीव्र आँच करे । इस तरह १२ प्रहर (३६ घण्टे) तक आँच देने से उत्तम रीति से पारा भर जाता है । पुनः स्वयं शीतल हो जाने पर सावधानी से कूपी को फोड़ कर ऊपर लगे हुये गन्धक को छोड़ कर शेष नीचे स्थित मरे हुये पारे को निकाल ले और उसे मात्रानुसार यथोचित अनुपान से जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ प्रयोग में लेवे ।।१६९-१७४।। अथ पारदमारणेऽपरं विधिमाह- अपामार्गस्य बीजानां मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् । तत्सम्पुटे क्षिपेत्सूतं मलयूदुग्धमिश्रितम् ।। १७५ ।। द्रोणपुष्पीप्रसूनानि विडङ्गमरिमेदकः । एतच्चूर्णमध्यश्चोर्ध्वं दत्त्वा मुद्रा प्रदीयते ।। १७६ ।। तद्गोलं स्थापयेत्सम्यङ् मृन्मूषासम्पुटे पचेत् ।। १७७ ।। एवमेकपुटेनैव सूतकं भस्म जायते । तत्प्रयोज्यं यथास्थाने यथामात्रं यथाविधि ।। १७८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

१९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पारा मारने की दूसरी विधि—प्रथम चिचिड़ा के बीजों को पीस कर उसके दो मूषे (घरिया) बना ले, फिर पारा को कठूमर (कठगूलर) के दूध में खूब खरल करके उसे उक्त मूषा के सम्पुट के अन्दर नीचे गूमा के फूल, बायविडङ्ग अरिमेद (दुर्गन्ध खैर) इन सबों का चूर्ण रख कर उसके ऊपर रख कर पुनः उसी चूर्ण को ऊपर से भी रखकर मूषा का मुख बन्द कर दे। पुनः एक दूसरे मिट्टी के मूषा के अन्दर उक्त मूषा के सम्पुट को रख कर मुख बन्द कर तथा सुखा कर अग्नि की पुट देवे। इस तरह एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है। फिर जब जहाँ आवश्यकता हो वहाँ विधि के अनुसार यथोचित मात्रा में उस भस्म का प्रयोग करे ॥१७५-१७८॥ ❖ मलयूः=काकोडुम्बरिका ।।१७५-१७८।। यहाँ 'मलयू' पद से 'कठूमर' का बोध करना चाहिये ॥१७५-१७८॥ अथ पारदमारणे तृतीयं विधिमाह- काकोडुम्बरिकादुग्धै रसं किञ्चिद्विमर्दयेत् । तद्दुग्धघृष्टहिङ्गोश्च मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ।।१७९।। क्षिप्त्वा तत्संुपुटे सूतं तत्र मुद्रां प्रदापयेत् । धृत्वा तद् गोलकं प्राज्ञो मृन्मूषासम्पुटेऽधिके ।। पचेद् गजपुटेनैव सूतकं याति भस्मताम् ।।१८०।। पारा मारने की तीसरी विधि—प्रथम कठूमर के दूध के साथ पारे को किञ्चित् खरल कर ले पश्चात् उसी के दूध के साथ हींग को पीस कर उसकी दो मूषा बना कर उसी के सम्पुट के अन्दर उक्त पारे को रख कर सन्धि भली-भाँति से बन्द कर दे फिर एक दूसरे मिट्टी के बने मूषे (घरिया) के सम्पुट के अन्दर उक्त मूषा-सम्पुट को रखकर कपड़मिट्टी द्वारा मुख दृढ़ता से बन्द कर तथा सुखाकर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इस भाँति एक ही पुट देने से पारा भस्म हो जाता है ॥१७९-१८०॥ अथ पारदमारणे चतुर्थ विधिमाह- नागवल्लीरसैर्घृष्टः कर्कोटीकन्दगर्भितः । मृन्मूषासम्पुटे पक्वं सूतो यात्येव भस्मताम् ।।१८१।। पारा मारने की चौथी विधि—प्रथम पारे को पान के रस में खरल कर ले पश्चात् उसे बाँझककोड़ा के कन्द के अन्दर रख दे पुनः उक्त कन्द को मिट्टी के मूषा (घरिया) के सम्पुट के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर सुखा दे पश्चात् गजपुट की आँच में पका डाले। इस भाँति एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है ॥१८१॥ अथ रसकर्पूरनिर्माणविधिमाह- तत्र पारदस्य संक्षिप्तं शोधनं कर्त्तव्यम्। शुद्धसूतसमं कुर्यात्प्रत्येकं गैरिकं सुधीः । इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ।।१८२।। वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् । सर्वाण्येतानि संचूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ।।१८३।। एभिश्चूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् । तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालमध्ये परिक्षिपेत् ।।१८४।। तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् । सवस्त्रकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ।।१८५।। संशोष्य मुद्रयेद्भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् । सम्यग्विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ।।१८६।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् । अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्रादहर्निशम् ।।१८७।। शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्ध्वस्थालीगतं रसम् । कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ।।१८८।। तद्देवकुसुमचन्दनकस्तूरीकुङ्कुमैर्युक्तम् । खादन् हरति फिरङ्गं व्याधिं सोपद्रवं सपदि ।।१८९।। बिन्दति वह्नेर्दीप्ति पुष्टिं वीर्य बलं विपुलम् । रमयति रमणीशतकं रसकर्पूरस्य सेवकः सततम् ।।१८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९३ 'रसकर्पूर' बनाने की विधि-रसकर्पूर बनाने के समय प्रथम पारे का संक्षिप्त शोधन विधि के अनुसार शोधन करे तत्पश्चात् शुद्ध पारा के समान भाग में गेरू, ईंटा, खड़ी, फिटकिरी, सेंधा नमक, वमई की मिट्टी, खारीनोन, बर्तन रँगने की मिट्टी (काबिस) इन सबों को पृथक्-पृथक् लेकर सबों का चूर्ण कर कपड़े से छान कर उसके साथ उक्त पारे को एक प्रहार तक खरल करे, पश्चात् उसे एक मिट्टी की हँड़िया के अन्दर रख कर ऊपर से दूसरी हाँड़ी औंधा कर दोनों का मुख कपड़ा या रूई डाल कर कुटी हुई मिट्टी से बन्द कर धूप में सुखा दे पश्चात् पुनः उक्त मिट्टी का लेप कर सुखा डाले इसके बाद फिर मिट्टी का लेप कर और सुखा कर उसे चूल्हे पर चढ़ा दे और चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। जब तक आग पर रखा रहे तब तक दिन-रात बलपूर्वक उसकी रक्षा करता रहे। स्वयं शीतल हो जाने पर धीरे से हाँड़ी का मुख खोल कर ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये अत्यन्त गुणकारी कपूर के समान परम उज्ज्वल पारे को निकाल ले और उसे लौंग, सफेद चन्दन, कस्तूरी तथा केशर के साथ मिला कर यदि खाया जाय तो उपद्रव से युक्त बढ़ा हुआ फिरङ्ग नामक रोग शीघ्र नष्ट हो जाता है और अग्नि प्रदीप्त होता है तथा शरीर की पुष्टि, वीर्य एवं बल की वृद्धि होती है। इस रसकर्पूर का निरन्तर सेवन करने वाला पुरुष १०० स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है ॥१८४-१९०॥ ❖ खटिका [खड़ी]। स्फटिका [फिट्किरी]। सिन्धुजन्म=सैन्धवम्। वल्मीकम्='बमई' इति लोके। क्षारलवणम् [खारीनोन]। भाण्डरञ्जकमृत्तिका [काविस] ॥१८४-१९०॥ यहाँ 'खटिका' का 'खड़ी', 'स्फटिका' का 'फिट्किरी', 'सिन्धुजन्म' का 'सेंधानमक' 'वस्मीक' का लोक- प्रसिद्ध 'बमई की मिट्टी', 'क्षारलवण' का 'खारी नोन' और 'भाण्डरञ्जक मृत्तिका' का 'काविस' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८४-१९०॥ अथ सिन्दूररसविधिमाह- शुद्धसूतस्य गृह्णीयाद्द्विषड्भागचतुष्टयम्। शुद्धगन्धस्य भागैकं तावत्कृत्रिमगन्धकम् ।।१९१।। अथवा पारदस्यार्द्धं शुद्धगन्धकमेव हि। तयोः कज्जलिकं कुर्याद्दिनमेकं विमर्दयेत् ।।१९२।। मृत्तिकां वाससा सार्द्धं कुट्टयेदतियत्नतः। तथा वारत्रयं सम्यक्काचकूपीं प्रलेपयेत् ।।१९३।। मृत्तिकां शोषयित्वा तु कूप्यांकज्जलिकं क्षिपेत्। तां कूपीं बालुकायन्त्रे स्थापयित्वा रसं पचेत् ।।१९४।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम्। गृह्णीयादूर्ध्वसंलग्नं सिन्दूरसदृशं रसम् ।।१९५।। सिन्दूररस बनाने की विधि-सिन्दूररस बनाने के समय वैद्य को चाहिये कि वह शुद्ध पारा ४ भाग, शुद्ध गन्धक १ भाग तथा बनाया हुआ गन्धक १ भाग अथवा शुद्ध पारा आधा भाग तथा शुद्ध गन्धक आधा भाग ले और इनकी कज्जली एकदिन तक खरल करके बना ले। पश्चात् कपड़ा या रूई डाल कर मिट्टी को खूब कूट-कूट कर सान ले और उसको एक बार काँच की शीशी के चारों तरफ सर्वत्र लेप कर सुखा डाले, इस भाँति तीन लेप चढ़ा कर सुखावे। फिर उक्त कज्जली को उक्त शीशी के अन्दर रख दे और शीशी को बालुकायन्त्र के अन्दर रख कर रस (पारा) को पकावे। चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर ऊपर लगे हुये सिन्दूर के सदृश दिखाई पड़ते हुये रस को धीरे से युक्तिपूर्वक निकाल ले। यही सिन्दूररस कहलाता है ॥१९१-१९५॥ इति सिन्दूररसः। अथ मारितमूर्च्छितपारदयोर्गुणानाह- पारदः कृमिकुष्ठघ्नो जयदो दृष्टिकृत्सरः। मृत्युहृच्च महावीर्यो योगवाही ज्वरापहः ।।१९६।। स्मृतौजोरूपदो वृष्यो वृद्धिकृद्धातुवर्द्धनः। षण्ढत्वनाशनः शूरः खेचरः सिद्धिदः परः ।।१९७।। पारदः सकलरोगहा स्मृतः षड्रसो निखिलयोगवाहकः। पञ्चभूतमय एष कीर्त्तितस्तेन तद्गुणगणैर्विराजते ।।१९८।। ६६ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उक्त प्रकार से मारे हुए तथा मूर्च्छित किये हुए पारा के गुण-उक्त प्रकार का पारा-कृमि तथा कुष्ठ नाशक, जय देने वाला (कार्य सिद्ध करने वाला), दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला, सारक, अकाल मृत्यु को दूर करने वाला, महावीर्यशाली, योगवाही (जिसके साथ दिया जाय उसके गुण को बढ़ाने वाला), ज्वरनाशक, स्मृति, ओज तथा रूप को देने वाला, कामी पुरुषों के लिये हितकर, वृद्धिकारक, धातुवर्धक, नपुंसकता को दूर करने वाला, शूरता, आकाश में उड़ने की शक्ति तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों को देने वाला होता है। शुद्ध पारा सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, मधुरादि ६ रसों से युक्त, तथा निखिल योगवाहक (सभी रोगों के सभी ओषधियों के साथ योग कर देने से उसकी शक्ति को बढ़ाने वाला) है एवं पञ्च महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) मय होने से उन सबों के प्रत्येक गुणों से युक्त होता है ।।१९६-१९८।। उक्तञ्च रसामृते- यस्य रोगस्य यो योगस्तेनैव सह योजितः । रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।१९९।। 'रसामृत' में भी कहा हुआ है कि जिस रोग का जो भी योग (औषध) हो, उसके साथ योग कर देने से पारा मनुष्य, हाथी तथा घोड़ा इन सभी के रोगों को दूर करने वाला होता है। अथोपरसानां शोधनविधिमाह- तत्र हिङ्गुलस्य गुणानाह- मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारान्नयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ।।२००।। हिङ्गुल (सिंगरफ) की शोधन विधि-भेड़ का दूर और १अम्लवर्गोक्त अमलवेंत, जम्बीरी नींबू आदि पदार्थों के रस की यत्नपूर्वक ७ बार भावना देने से सिंगरफ निश्चय शुद्ध हो जाता है ।। अथ शोधितहिङ्गुलस्य गुणानाह- तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकण्डूज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।२०१।। शुद्ध किये हुये सिंगरफ के गुण-शुद्ध सिंगरफ-तिक्त, कषाय तथा कटुरसयुक्त, नेत्ररोगनाशक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवं हल्लास (उबकाई), खुजली, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात तथा गरसंज्ञक विष (कृत्रिम विष) को नष्ट करने वाला होता है ।।२०१।। अथ हिङ्गुलात्पारदनिष्कर्षणविधिमाह- निम्बूरसैर्निम्बपत्ररसैर्वा याममात्रकम् । घृष्ट्वा दरदमूर्ध्वन्तु पातयेत्सूतयुक्तिवत् ।।२०२।। तत्रोर्ध्वपिठरीलग्नं गृह्णीयाद्रसमुत्तमम् । शुद्धमेव हि तं सूतं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।२०३।। सिंगरफ से पारा निकालने की विधि-नीबू के रस के अथवा नीम के पत्तों के रस के साथ सिंगरफ को एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में पारे की भांति रख कर उड़ाने से ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये उत्तम पारे को निकाल लेना चाहिये । यह पारा स्वयं शुद्ध होता है अतः इसे हर एक कार्यों में लेना चाहिये ।।२०२-२०३।। १. अम्लवेतसजम्बीरलुङ्गाम्लचणकाम्लकाः । नागरङ्गं तिन्तिडी च चिञ्चापत्रं च निम्बुकम् ।। चाङ्गेरी दाडिमं चैव करमर्दं तथैव च । एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ।। अर्थ-अम्लवेत, जम्बीरी नींबू, बिजौरा नींबू, चनाखार, नारङ्गी (खट्टी), इमली के फल और पत्ते, नींबू, चांगेरी, अनार (खट्टा), करौंदा ये सब अम्लगण (अम्लवर्ण) कहलाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धातवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९५ अथाशुद्धगन्धकस्य दोषानाह- अशुद्धो गन्धकः कुर्यात्कुष्ठं पित्तरुजां भ्रमम्। हन्ति वीर्यं बलं रूपं तस्माच्छुद्धः प्रयुज्यते ॥२०४॥ अशुद्ध गन्धक के दोष-अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तसम्बन्धी रोग तथा भ्रमरोग को उत्पन्न-करने वाला एवं वीर्य, बल, तथा रूप को नष्ट करने वाला होता है। अतः शुद्ध गन्धक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥२०४॥ अथ गन्धकस्य शोधनविधिमाह- लौहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत्। तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः ॥२०५॥ विद्रुतं गन्धक दृष्ट्वा तनुवस्त्रे विनिक्षिपेत्। यथा वस्त्राद्विनिःस्रुत्य दुग्धमध्येऽखिलं पतेत् । एवं स गन्धकः शुद्धः सर्वकर्मोचितो भवेत् ॥२०६॥ गन्धक के शोधने की विधि-लोहे की कढ़ाई में घी डाल कर आग पर रख कर तपावे, जब घी खूब तप जाय तब उसी के बराबर गन्धक का चूर्ण उसमें डाल दे और गन्धक को पिघला हुआ देख कर पतले वस्त्र के ऊपर उसे उड़ेल दे और दूध भरे पात्र में उस पिघले गन्धक को चुवावे, जब वस्त्र से सारा गन्धक छन कर दूध में गिर जाय तब उसे निकाल ले। इस प्रकार गन्धक को शुद्ध करके सम्पूर्ण कार्यों में प्रयोग करे ॥२०५-२०६॥ अथ शुद्धगन्धकस्य गुणानाह- गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्य्योष्णस्तुवरः सरः ।।२०७।। पित्तलः कटुकः पाके कण्डूवीसर्पजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।२०८।। शुद्ध गन्धक के गुण-शुद्ध गन्धक-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन एवं खुजली, वीसर्प, कृमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ॥२०७-२०८॥ अथाशुद्धाभ्रकस्य दोषानाह- पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुर्य्यात् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यसह्यामशुद्धमभ्रं गुरु वह्निहन्त्यात् ।।२०९।। अशुद्ध अभ्रक के दोष-अशुद्ध अभ्रक-मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा देने वाला, कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, हृदय तथा पसलियों में असह्य पीड़ा उत्पन्न करने वाला, गुरु तथा जठराग्नि को नष्ट करने वाला होता है ॥२०९॥ अथाभ्रकस्य शोधनविधिमाह- कृष्णाभ्रकं धमेद्वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत् । भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः । भावयेदष्टयामं तदेवमभ्रं विशुद्ध्यति ।।२१०।। अभ्रक के शोधने की विधि-काले अभ्रक को प्रथम आग में डाल कर खूब तपावे जब लाल हो जाय तब उसे दूध में डाल कर बुझावे, तत्पश्चात् उसके प्रत्येक पत्र (पत्तर) अलग-अलग करके उन सबों को चौलाई तथा अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से आठ पहर तक भावना दे। ऐसा करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥२१०॥ अथाभ्रकस्य मारणविधिमाह- कृत्वा धान्याभ्रकं तथा शोषयित्वाऽथ मर्दयेत् । अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत् ।।२११।। वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारान् पुनः पुनः ।।२१२।। ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः प्रयोज्यं सर्वकर्मसु ।।२१३।। तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे तदभ्रन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ।।२१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अभ्रक के मारने की विधि-प्रथम शुद्ध अभ्रक को लेकर उससे आगे लिखी विधि के अनुसार धान्याभ्रक तैयार कर उसे सुखा कर एक दिन तक आक के दूध के साथ खल में रख खरल करे पश्चात् उसकी चक्के के आकार की गोल टिकिया बना कर उन सबों के ऊपर आक के पत्ते अच्छी तरह से लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। पुनः निकाल कर पूर्वोक्त रीति से आक के दूध के साथ खरल करके टिकिया बना कर आक के पत्ते लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इसी प्रकार जब सात पुट हो जाय तब बरगद की जटा (बरोह) के क्वाथ के साथ खरल करके और टिकिया बना कर पूर्वोक्त रीति की भाँति गजपुट की आग में रख कर पकावे इसी भाँति तीन पुट हो जाने पर अभ्रक निःसन्देह मर जाता है और सभी कार्यों में प्रयोग करने योग्य हो जाता है। उक्त रीति से मारे हुये अभ्रक को समान भाग घी में डाल कर लोहे की कढ़ाई में रख कर पकावे, जब घी जल जाय तब उतार कर उस अभ्रक को हर एक योगों में मिलावे ॥२१४॥ अथ धान्याभ्रकस्य विधिमाह- पादांशशालिसंयुक्तमभ्रं बद्ध्वाऽथ कम्बले। त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेत्करैः ।। २१५ ।। कम्बलाद्गलितं सूक्ष्मं बालुकारहितञ्च यत्। तद् धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमार्मारणसिद्धये ।। २१६ ।। धान्याभ्रक बनाने की विधि-अभ्रक का चतुर्थांश शालि (जड़हन) धान्य मिला कर अभ्रक को कम्बल में बाँध कर जल में तीन दिन तक भींगा रहने दे, पश्चात् उसे निकाल कर हाथों में खूब रगड़े और कम्बल से छन २ कर सूक्ष्म जो बालू से रहित अभ्रक के कण गिरे हों उन्हें एकत्र करले वे ही 'धान्याभ्र' कहलाते हैं तथा अभ्रक के मारण के समय कार्य में आते हैं ॥२१५-२१६॥ अथ मारिताभ्रकस्य गुणानाह- अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनञ्च । हन्यात् त्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठं प्लीहोदरं ग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।। २१७ ।। रोगान् हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते, तारुण्याढयं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान् सिंहतुल्यप्रभावान्, मृत्योर्भीतिं हरति सुतरां सेव्यमानं मृताभ्रम् ।। १८ ।। मारे हुये अभ्रक के गुण-मारा हुआ अभ्रक-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवं त्रिदोष, व्रण मेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गाँठ), विष तथा क्रिमि को नष्ट करने वाला होता है। यह सेवन करने से रोगों को दूर करता है, शरीर को दृढ़ रखता है, वीर्य की वृद्धि करता है और सौ १०० युवती स्त्रियों के साथ रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी और दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है एवं अपमृत्यु के भय को दूर करता है ॥२१७-२१८॥ अथाशुद्धहरितालस्य दोषानाह- अशुद्धं तालमायुर्हत्कफमारुतमेहकृत् । तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ।। २१९ ।। अशुद्ध हरताल के दोष-अशुद्ध हरताल-आयु नाशक, कफ, वायु तथा मेहयोग कारक एवं शरीर में ताप, स्फोट तथा अङ्ग को संकुचित करने वाला होता है। अतः इस का शोधन करना आवश्यक है ॥२१९॥ अथ हरितालस्य शोधनविधिमाह- तालकं कणशः कृत्वा तच्चूर्णं काञ्जिके पचेत् । दोलायन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजद्रवैः ।। २२० ।। तिलतैले पचेद्यामं यामञ्च त्रिफलाजले । एवं यन्त्रे चतुर्यामं पक्वं शुद्ध्यति तालकम् ।। २२१ ।। हरताल शोधने की विधि-तबकिया हरताल का मोटा चूर्ण कर उसे कांजी से भरे दोलायन्त्र में रख १ प्रहर (३ घण्टा) तक पकावे, उसके बाद क्रम से पेठा का रस, तिल का तेल तथा त्रिफला का जल भरे दोलायन्त्र में उक्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १९७ हरताल को रख अलग एक-एक प्रहर तक पकावे, इस भाँति चार प्रहर तक दोलायन्त्र में रख कर पकाने से हरताल शुद्ध हो जाता है ॥२२०-२२१॥ अथ हरितालस्य मारणविधिमाह- सदलं तालकं शुद्धं पौनर्नवरसेन तु। खल्वे विमर्दयेदेकं दिनं पश्चाद्विशोधयेत् ।।२२२।। ततः पुनर्नवाक्षारैः स्थाल्यामर्द्धं प्रपूरयेत्। तत्र तद्गोलकं कृत्वा पुनस्तेनैव पूरयेत् ।।२२३।। आकण्ठं पिठरं तस्य पिधानं धारयेन्मुखे। स्थालीं चुल्ल्यां समारोप्य क्रमाद्वह्निं विवर्धयेत् ।।२२४।। दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेत् ।।२२५।। एवं तन्म्रियते तालं मात्रा तस्यैकरक्तिका। अनुपानान्यनेकानि यथायोग्यं प्रयोजयेत् ।।२२६।। हरताल मारने की विधि-शुद्ध किये हुये दलयुक्त तबकिया हरताल को लेकर पुनर्नवा (सफेद) के रस के साथ खल में रख कर एक दिन तक खरल करे पश्चात् गोला बना कर तथा सुखा कर एक हाँड़ी में आधे दूर तक सफेद पुनर्नवा का खार भर कर उसके ऊपर उक्त हरताल के गोले को रख कर ऊपर से पुनः सफेद पुनर्नवा का खार हाँड़ी के गले तक भर रख दे और ऊपर से हाँड़ी का मुख बन्द कर चूल्हे पर रख कर नीचे आग जला दे और आँच धीरे-धीरे तेज करता जाय, इस तरह पाँच दिन तथा पाँच रात तक अखण्ड आँच देने से हरताल मर जाता है। इसकी मात्रा १ रत्ती की होती है तथा अनेक प्रकार के अनुपानों में जहाँ जिसकी योग्यता हो रोगादि के अनुसार उस अनुपान के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये ॥२२२-२२६॥ अथ शोधितमारितहरितालयोर्गुणानाह- हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरेद्विषम्। कण्डूकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।२२७।। शुद्ध किये हुये और मारे हुये हरताल के गुण-उक्त प्रकार का हरताल-कटु तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, उष्ण एवं विष, खुजली, कुष्ठ, मुख सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, बाल तथा व्रण को नष्ट करने वाला होता है ॥२२७॥ अन्यच्च- तालकं हरते रोगान्कुष्ठमृत्युज्वरापहम्। शोधितं कुरुते कान्तिं वीर्यवृद्धिं तथाऽऽयुषम् ।।२२८।। और भी कहा है कि-शोधित हरताल-रोगनाशक, शरीर की कान्ति तथा वीर्य की वृद्धि करने वाला, आयु को बढ़ाने वाला एवं कुष्ठ, अकाल मृत्यु तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२२८॥ अथाशुद्धमनःशिलाया दोषानाह- तालकस्यैव भेदोऽस्ति मनोगुप्तैतदन्तरम्। तालकं त्वतिपीतं स्याद्भवेद्रक्ता मनःशिला ।।२२९।। मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलस्य बन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदञ्च कुर्यात् ।।२३०।। अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप-हरताल के एक भेद को ही मैनसिल कहते हैं। क्योंकि इन दोनों में केवल यही अन्तर है कि हरताल का रङ्ग अत्यन्त पीला होता है और मैनसिल का रङ्ग लाल होता है। अशुद्ध मैनसिल के दोष- बिना शोधा हुआ मैनसिल सेवन करने से मनुष्य को मन्द बलवाला कर देती है और दुर्बलता, क्रिमि, मल का विबन्ध, मूत्र का अवरोध तथा शर्करा युक्त मूत्रकृच्छ्र करने वाली होती है ॥२२९-२३०॥ अथ मनःशिलायाः शोधनविधिमाह- पचेत्त्र्यहमजामूत्रे दोलायन्त्रे मनःशिलाम्। भावयेत्सप्तधा पित्तैरजायाः सा विशुद्ध्यति ।।२३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मैनसिल शोधने की विधि-मैनसिल को ३ दिन तक बकरी के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकावे, पश्चात् बकरी के पित्त से सात बार भावना देनेसे मैनसिल शुद्ध हो जाती है ॥२३१॥ अथ शोधितमनःशिलाया गुणानाह- गुर्वी मनःशिला वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।। शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण-शुद्ध मैनसिल-गुरु, वर्ण को उत्तम करने वाली, सारक, उष्ण, लेखन गुण युक्त, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध एवं विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है ॥२३२॥ अथ खर्परस्तुत्थभेदस्तस्य शोधनविधिमाह- नरमूत्रे च गोमूत्रे सप्ताहं रसकं पचेत् । दोलायन्त्रेण शुद्धः स्यात्ततः कार्येषु योजयेत् ।।२३३।। तूतिया का भेद जो खपरिया है उसके शोधन की विधि-खपरिया को मनुष्य के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे फिर गोमूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे । ऐसा करने से वह शुद्ध हो जाती है और इसके बाद कार्य में लेने योग्य होती है ॥२३३॥ अथ शुद्धखर्परस्य गुणानाह- खर्परं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु । लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत् ।। विषाश्मकुष्ठकण्डूनां नाशन परम मतम् ।।२३४।। शुद्ध खपरिया के गुण-शुद्ध खपरिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारी, वमन कराने वाली, लघु, लेखनगुणयुक्त, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली एवं विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को अत्यन्त नष्ट करने वाली होती है ॥२३४॥ अथ सर्वोपरसानां साधारणशोधनविधिमाह- सूर्यावर्त्तो वज्रकन्दः कदली देवदालिका । शिग्रुः कोषातकी बन्ध्या काकमाची च बालकम् ।।२३५।। एषामेकरसेनैव त्रिक्षारैर्लवणैः सह । भावयेदम्लवर्गैश्च दिनमेकं प्रयत्नतः ।।२३६।। ततः पचेच्च तद्द्वावैर्दोलायन्त्रे दिनं सुधीः । एवं शुद्ध्यन्ति ते सर्वे प्रोक्ता उपरसा हि ये ।।२३७।। सम्पूर्ण उपरसों के शोधने की साधारण विधि-हुरहुर, वज्रकन्द (जंगली सूरन), केला, देवदाली (सनैया), सहंजना, तोरई, बाँझककोड़ा, मकोय, सुगन्धबाला इन सबों में से किसी एक का रस, क्षारत्रय१ (जवाखार, सुहागा, सज्जीखार), पाँचो२ नोन तथा अम्लवर्गोक्त (अमलवेत, जम्बीरी नींबू आदि) पदार्थों का रस इन सबों से एक दिन तक भावना दे उसके बाद उपर्युक्त इन्हीं रसों से भरे दोलायन्त्र में उपरसों को रख कर एक दिन तक पकावे । ऐसा करने से जितने उपरस कहे हुए हैं वे सभी शुद्ध हो जाते हैं ॥२३५-२३७॥ अथ विशेषशुद्धिमाह- कङ्कुष्ठं गैरिकं शङ्खः कासीसं टङ्कणं तथा । नीलाञ्जनं शुक्तिभेदाः क्षुल्लकाः सवराटकाः ।।२३८।। जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा । शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ।।२३९।। १. स्वर्जिका च यवक्षारष्टङ्कणक्षार एव च । क्षारत्रयं समाख्यातं त्रिक्षारः स च कथ्यते ।। अर्थ-सज्जीखार, जवाखार, सुहागा ये तीनों मिलकर क्षारत्रय या त्रिक्षार कहलाते हैं। २. सैन्धवं रुचकं चैव विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रेण समायुक्तं ज्ञेयं लवणपञ्चकम् ।। अर्थ-सेंधा नमक, कालानोन, विरिया सञ्चर नोन, औद्भिद (रेहगवा नोन), समुद्रीनोन इन सबों के योग को लवणपञ्चक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९९ विशेष शुद्धि-मुरदासंग, गेरू, शङ्ख, कासीस, सुहागा, काला सुरमा, सितुही के सभी भेद, छोटे शङ्ख, कौड़ी ये सब जम्बीरी नींबू से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकाने के बाद किंचित् गर्म जल से धो लेने पर शुद्ध हो जाते हैं। उसके बाद हर एक योगों में इन सबों का प्रयोग करना वैद्यों के लिये उचित है ।।२३८-२३९।। ❖ एवं शोधितानामुपरसानां पृथग्गुणा गुणग्रन्थे द्रष्टव्याः ।।२३८-२३९।। इस प्रकार शुद्ध किये हुये उपरसों के पृथक् पृथक् गुण जहाँ पर इनके गुण लिखे हुये हैं वहाँ देखना चाहिये ।।२३८-२३९।। अथ रत्नानां शोधनमारणविधिमाह तत्राशुद्धवज्रस्य दोषानाह- अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुत्वं पङ्गुलत्वञ्च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। अशुद्ध (बिना शोधे हुए) हीरे के दोष-

१००० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ मारितवज्रस्य गुणानाह- आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। २४७ ।। मारे हुये हीरे के गुण-मरा हुआ हीरा (भस्म)-सेवन करने से आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है और सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है। इसमें कोई संशय नहीं है ।। २४७ ।। अथ शेषरत्नानां शोधनमारणविधिमाह- वज्रवत्सर्वरत्नानि शोधयेन्मारयेत्तथा। शुद्धानां मारितानाञ्च तेषां शृणु गुणानपि ।। २४८ ।। मणयो वीर्यतः शीता मधुरास्तुवरा रसात्। चक्षुष्या लेखनाश्चापि सारका विषहारकाः ।। धारणात्ते तु भङ्गल्या ग्रहदृष्टिहरा अपि ।। २४९ ।। शेष अन्य रत्नों के शोधन तथा मारण की विधि-हीरे के समान ही शेष सभी रत्नों का भी शोधन तथा मारण करना चाहिये। शोधन तथा मारण किये हुये सभी रत्न-शीतवीर्य, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, सारक, विष को हरण करने वाले, धारण करने से मङ्गल को देने वाले और ग्रह के दोषों को दूर करने वाले होते हैं ।। २४८-२४९ ।। ❖ उपरत्नानां शोधनमारणविधिश्चिन्त्यः ।। २४८ - २४९ ।। यहाँ उपरत्नों के शोधन तथा मारण की विधि विचार करके स्थिर कर लेनी चाहिये। अथ विषोपविषाणां शोधनविधिमाह- तत्र वत्सनाभस्य स्वरूपमाह- सिन्धुवारसहक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा। यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।। २५० ।। वत्सनाभ विष के लक्षण-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार में जो बछड़े की नाभि के समान हो एवं जिसके समीप में अन्य वृक्षों की वृद्धि न होती हो उसे वत्सनाभ विष कहते हैं ।। २५० ।। अथ विषस्य शोधनविधिमाह- गोमूत्रे त्रिदिनं स्थाप्यं विषं तेन विशुद्ध्यति। रक्तसर्षपतैलाक्ते तथा धार्यञ्च वाससि ।। २५१ ।। ये गुणा गरले प्रोक्तास्ते स्युर्हीना विशोधनात्। तस्माद्विषं प्रयोगे तु शोधयित्वा प्रयोजयेत् ।। २५२ ।। विष शोधने की विधि-तीन दिन तक विष को गोमूत्र में भिगो कर रखने के बाद उसे लाल सरसों के तेल में भीगे हुये कपड़े के अन्दर रख दे, ऐसा करने से विष शुद्ध हो जाता है। जो प्राण हरण करना आदि दोष विष के कहे हुये हैं वे सब शोधन करने से ही (कम) हो जाते हैं। अतः विष को शोधन करके ओषधियों के काम में लायें ।। २५१-२५२ ।। अथ विषस्य गुणानाह- विषं प्राणहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च। आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् ।। २५३ ।। विष के गुण-विष-प्राणनाशक, व्यवायी, विकाशी, आग्नेय, वात-कफ नाशक, योगवाही तथा मदावह होता है ।। २५३ ।। ❖ व्यवायि=सकलकायगुणव्यापनपूर्वकं पाकगमनशीलम्। विकाशि=ओजः शोषणपूर्वकं सन्धि- बन्धशिथिलीकरणशीलम्। आग्नेयम्=अधिकाग्न्यंशम्। योगवाहि=सङ्गिगुणग्राहकम्। मदावहम्=- तमोगुणप्राधान्येन बुद्धिविध्वंसकम् ।। २५३ ।।

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १००१ यहाँ ‘व्यवायि’ पद कां ‘प्रथम सम्पूर्ण शरीर में अपने गुणों को व्याप्त करके पश्चात् पचने वाला’, ‘विकाशि’ पद का ‘ओज को सुखाता हुआ सन्धि के बन्धनों को शिथिल करने वाला’, ‘आग्नेय’ पद का ‘अग्नि के अधिक अंशों से युक्त’, ‘योगवाहि’ पद का ‘जिसके साथ योग हो उसके गुणों को ग्रहण करने वाला’ और ‘मदावह’ पद का ‘तमोगुण की प्रधानता से बुद्धि को विध्वंस करने वाला’ अर्थ समझना चाहिये ।। २५३ ।। तदेव युक्तियुक्तन्तु प्राणदायि रसायनम्। योगवाहि परं वातश्लेष्मजित्सन्निपातहृत् ।। २५४।। इस प्रकार प्राणनाशक आदि दुर्गुणों से युक्त होता हुआ भी विष यदि युक्तिपूर्वक सेवन किया जाय तो प्राणशक्ति को देने वाला, रसायन, परम योगवाही, वात-कफनाशक एवं सन्निपात को दूर करने वाला होता है ।। २५४।। अथोपविषाणां निरूपणमाह- अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकः। गुञ्जाऽहिफेनो धत्तूरः सप्तोपविषजातयः ।। २५५ ।। उपविषों का निरूपण—आक का दूध, थूहर का दूध, कलिहारी, कनेर, गुञ्ज, अफीम, धतूर ये सात उपविष की जातियां हैं ।। २५५ ।। ❖ एतेषां शोधनं चिन्त्यम्। गुणास्तत्र द्रष्टव्याः ।। २५५ ।। यहाँ इन सबों के शोधन करने की विधि स्वयं विचार लेना चाहिये। जहाँ-जहाँ इनका द्रव्यगुण प्रकरण में उल्लेख है, वहाँ-वहाँ इनके गुण देख लेने चाहिये ।। २५५।। अथ द्रव्याणां गुणवत्तामवधिमाह- गुणहीनं भवेद्वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम्। मासद्वयात्तथा चूर्णं लभते हीनवीर्यताम् ।। २५६ ।। हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरं यदि। हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकास्तथा ।। २५७ ।। द्रव्यों के पूर्ण गुणयुक्त रहने की अवधि—जिस काष्ठौषधि का जैसा आकार है, उसी रूप में यदि वह रखा रह जाय तो १ वर्ष के बाद, यदि चूर्ण रूप में हो तो दो मास के बाद, गोली तथा अवलेह के रूप में हो तो एक वर्ष के बाद और घृत तथा तेल आदि के रूप में हो तो १ वर्ष ४ मास के बाद गुणहीन हो जाता है ।। २५६-२५७।। ❖ घृततैलाद्या इति योगविशेषणम्। चतुर्मासाधिकाः=वत्सरादुपरि चत्वारो मासाअधिकायेषु ते ।। २५६- २५७।। यहाँ ‘घृततैलाद्याः’ यह योग विशेषण है अर्थात् जो ओषधि डालकर घी वा तेल बनाये जाते हैं, उनका ग्रहण करना चाहिये। न कि केवल घी या तेल का तथा ‘चतुर्मासाधिकाः’ इस पद का ‘एक वर्ष से ऊपर ४ मास अधिक हो गये हैं जिसमें अर्थात् एक वर्ष चार मास के बाद’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। २५६-२५७।। अथ ग्रन्थान्तराद् घृततैलयोर्विशेषमाह- घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्। तैलं पक्वमपक्वञ्च चिरस्थायि गुणाधिकम् ।। २५८ ।। ग्रन्थान्तर से घी तथा तेल के विषय में विशेषता—एक वर्ष के बाद पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है और तेल चाहे पकाया या न पकाया हुआ हो जैसे-जैसे अधिक दिन का होता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है ।।२५८।। ❖ तदपि षोडशमासाभ्यन्तरीणं पक्वं तैलं गुणाधिकं बोद्धव्यम् ।। २५८ ।। यहाँ तेल के विषय में इतना और समझ लेना चाहिये कि— १६ मास के अन्दर तक ही पकाया हुआ तैल उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होता है, बाद में नहीं ।। २५८ ।। ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निंवीर्या वत्सरात्परम्। पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः ।। २५९।।

१००२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जल्दी ही पक कर तैयार हो जाने वाले धान्यादि एक वर्ष के बाद निर्वीर्य हो जाते हैं और आसव, धातु (सोना आदि) तथा रस (रससिन्दूरादि) जितने ही अधिक पुराने होते जाते हैं, उतने ही अधिक गुणकारी होते हैं ।।२५९।। ❖ ओषध्यः=धान्यादयः । लघुपाकाः=शीघ्रपाकाः । निर्वीर्याः स्युः ।।२५९।। यहाँ 'ओषध्यः' पद का 'धान्यादि' । 'लघुपाकाः' पद का 'शीघ्र पक कर तैयार हो जाने वाले, हीनवीर्य हो जाते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२५९।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।३।। अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् ।।४।। तत्र स्नेहस्य भेदान् विशेषनामानि चाह- स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तो घृतं तैलं वसा तथा ।। मज्जा च तं पिबेन्मर्त्यः किञ्चिदभ्युदिते रवौ ।।१।। स्थावरो जङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेह उच्यते । तिलतैलं स्थावरेषु जङ्गमेषु घृतं वरम् ।। द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा यमकस्त्रिवृतो महान् ।।२।। स्नेह के भेद तथा विशेष नाम-स्नेह चार प्रकार का होता है । (१) घी, (२) तेल, (३) चर्बी और (४) मज्जा । स्नेह को थोड़ा सूर्य उदय हो जाने पर पीना चाहिये । इनकी दो योनियाँ हैं । एक स्थावर, दूसरी जङ्गम अर्थात् तेल स्थावर स्नेह और घी, चर्बी तथा मज्जा ये सब जङ्गम स्नेह कहलाते हैं । इससे स्नेह द्वियोनि कहलाता है । स्थावर स्नेहों में तिल का तेल और जङ्गम स्नेहों में घी उत्तम होता है । दो स्नेहों के मिलने से यमक, तीन के मिलने से त्रिवृत और चार के मिलने से महान् संज्ञक स्नेह होता है ।।१-२।। ❖ अस्यायमर्थः-द्वाभ्यां स्नेहाभ्यां घृततैलाभ्यां यमकाख्यः स्नेहः स्यात् । त्रिभिः-स्नेहैर्घृततैलव- सारूपैस्त्रिवृताख्यः स्यात् । चतुर्भिर्घृततैलवसामज्जभिर्महान्=महास्नेह स्यादित्यर्थः ।।१-२।। यहाँ 'द्वाभ्याम्' इत्यादि पदों का यह अर्थ समझना चाहिये कि-'दो स्नेह अर्थात् घी और तेल के मिलने से 'यमक' नामक स्नेह होता है। तीन स्नेह अर्थात् घी, तेल तथा चर्बी के मिलने से 'त्रिवृत्' अर्थात् 'महास्नेह' कहलाते हैं' १-२।। पिबेत् त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि वा ।।३।। तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन या छः दिन तक स्नेह पीना चाहिये ।।३।। ❖ मृदुमध्यक्रूरकोष्ठापेक्षया त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि चेति ।।३।। यहाँ 'मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ की अपेक्षा से तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन तथा छः दिन पीने को कहा है अर्थात् मृदुकोष्ठ वाला पुरुष तीन दिन तक, मध्य कोष्ठ वाला चार दिन तक इत्यादि क्रम से पीवे' । यदुक्तम्- मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निग्धस्नेहोपसेवया। मध्यकोष्ठश्चतुर्भिंश्च दिवसैः स्निह्यति ध्रुवम् ।।१।। पञ्चभिर्वाऽथ षड्भिर्वा दिनैः क्रूरो विशुद्ध्यति । सप्तरात्रात्परं स्नेहः सात्मीभवति सेवितः ।।२।।

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००३ क्योंकि कहा भी है कि-तीन रात्रि तक स्नेह का सेवन करने (पीने) से मृदुकोष्ठ वाला पुरुष स्निग्ध होता है। मध्य कोष्ठ वाला पुरुष चार दिन तक स्नेह सेवन करने से निश्चय स्निग्ध होता है और क्रूर कोष्ठवाला पाँच या छ दिन तक स्नेह सेवन करने से शुद्ध होता है। स्नेह का सेवन करते हुए जब सात रात्रि बीत जाती है, तब वह सात्म्य (शरीर के अनुकूल) हो जाता है। मृदुमध्यक्रूरकोष्ठानां सर्वेषां सप्तरात्रात्परं सात्मीभवति। वातानुलोम्यवह्निदीप्तिकोष्ठशुद्धिमृदु- स्निग्धाङ्गलाघवधातुपुष्टिद्विजदार्ढ्यनिर्जरताबलवर्णकारी भवति। न तु भक्तद्वेषग्लान्यादीन् करोति ।।३।। यहाँ यह भी समझना चाहिये कि-मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले सभों को ही सात रात्रि के बाद स्नेहसेवन सात्म्य हो जाता है। इससे वायु का अनुलोमन (अपने स्वाभाविक स्थिति पर रहना), अग्नि प्रदीप्त होना, कोष्ठ की शुद्धि, अङ्ग, स्वर आदि की मृदुता तथा स्निग्धता, अङ्गों की लघुता, धातुओं की पुष्टि, दाँतों की दृढ़ता, वृद्धावस्था से रहित होना, बल की वृद्धि तथा वर्ण की उज्ज्वलता होती है। किन्तु अन्न से द्वेष होना तथा ग्लानि आदि नहीं करता है ॥१-२॥३॥ दोषकालयोवह्निबलान्यालोक्य योजयेत्। हीनाञ्च मध्यमां ज्येष्ठां मात्रां स्नेहस्य बुद्धिमान् ।।४।। अमात्रया तथाऽकाले मिथ्याऽऽहारविहारतः। स्नेहः करोति शोथार्शस्तन्द्रानिद्राविसंज्ञताः ।।५।। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह-दोष (वातादि), काल (वसन्तादि ऋतु तथा प्रातः, मध्याह्न आदि), रोगों की अवस्था, अग्नि तथा बल को देख कर तदनुसार हीन, मध्यम तथा ज्येष्ठ मात्रा स्नेह की दे। बिना मात्रा के तथा असमय में एवं मिथ्या आहार-विहार करने के साथ-साथ स्नेह का सेवन करना मनुष्य को शोष, अर्श, तन्द्रा, निद्रा तथा बेहोशी उत्पन्न करने वाला होता है ॥४-५॥ द्वेया दीप्ताग्नये मात्रा स्नेहस्यैकपलोन्मितः । मध्यमाय त्रिकर्षा स्याज्जघन्याय द्विकार्षिकी ।।६।। दीप्त अग्नि वाले पुरुषों के लिये स्नेह पीने की मात्रा १ पल (चार तोले) की देनी चाहिये। मध्यम अग्नि वालों के लिये ३ कर्ष (३ तोले) की मात्रा और हीन अग्नि वालों के लिये दो कर्ष (२ तोले) की मात्रा स्नेह पीने को देनी चाहिये ॥६॥ ❖ मध्यमाय=मध्यमाग्नये। जघन्याय=हीनाग्नये ।।६।। यहाँ 'मध्यमाय' पद का 'मध्यम अग्नि वालों के लिये' तथा 'जघन्याय' पद का 'हीन अग्नि वालों के लिये' यह अर्थ समझना चाहिये ॥६॥ अथवा स्नेहमात्राः स्युस्तिस्रोऽन्याः सर्वसम्मताः। अहोरात्रेण महती जीर्यत्यह्नि तु मध्यम ।। जीर्यत्यल्पा दिनाद्धेन सा विज्ञेया सुखावहा ।।७।। अथवा सभी वैद्यों को अभिमत इनसे अन्य तीन प्रकार की मात्रायें और होती हैं-एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली जो स्नेहमात्रा होती है वह 'महती', दिन भर में पचने वाली मात्रा 'मध्यमा' और आधे दिन में ही पचने वाली मात्रा 'अल्पा (कनिष्ठा)' कहलाती है और वह (अल्प मात्रा) सुख देने वाली भी होती है ॥७॥ अयमर्थः-याऽहोरात्रेण जीर्यति सा मात्रा महती। एवं मध्यमा कनिष्ठा च ज्ञेया ।।७।। यहाँ यह अर्थ समझना चाहिये कि-जो एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली होती है वह 'महती' नामक मात्रा होती है। इसी भाँति से मध्यमा तथा कनिष्ठा मात्रा को भी समझ लेना चाहिए ॥७॥ अल्पा स्याद्दीपनी वृष्या स्वल्पदोषे प्रपूजिता ।।८।। मध्यमा स्नेहनी ज्ञेया बृंहणी भ्रमहारिणी। ज्येष्ठा कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ।।९।।

१००४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अल्पा (कनिष्ठा) मात्रा अग्निदीपक तथा वीर्यवर्धक होती है और अल्प दोष वाले पुरुषों के लिये उत्तम होती है, ‘मध्यमा’ मात्रा स्नेहन करने वाली, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा भ्रमरोग नाशक होती है एवं ‘ज्येष्ठा’ मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहबाधा तथा मिर्गी को दूर करने वाली होती है ॥८-९॥ सुश्रुतः पुनरेवमाह- या मात्रा प्रथमे यामे गते जीर्यति वासरे। सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥१०॥ या मात्रा वासरस्यार्द्धे व्यतीते परिजीर्यति। सा वृष्या बृंहणी च स्यान्मध्यदोषे प्रपूजिता ॥११॥ या मात्रा चरमे यामे स्थितेऽह्नः परिजीर्यति। सा मात्रा स्नेहनी ज्ञेया बहुदोषेषु पूजिता ॥१२॥ केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम्। देयं बहुकफे वह्निव्योषक्षारसमन्वितम् ॥१३॥ मात्रा के विषय में सुश्रुत का मत-जो स्नेह की मात्रा दिन का एक प्रहर बीत जाने पर ही पच जाने वाली होती है, वह अग्नि को प्रदीप्त करने वाली तथा अल्प दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। जो मात्रा दिन के आधा भाग बीत जाने पर पच जाने वाली होती है वह वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा मध्यम दोष वालों के लिये उत्तम होती है। और जो मात्रा दिन के अन्तिम प्रहर में पचने वाली होती है वह स्नेहन करने वाली तथा अधिक दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। पित्त की अधिकता में केवल घृत-पान करने को देना चाहिये, वात की अधिकता में सेंधा नमक मिला कर घी देना चाहिये और कफ की अधिकता में चीता, सोंठ, पीपर, क्षार (जवाखार आदि) मिला कर घी पीने के लिये देना चाहिये ॥१०-१३॥ अथ सर्पिष्पानार्हजनानाह- रूक्षक्षतविषार्त्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिष्पानं प्रशस्यते ॥१४॥ घी पिलाने योग्य लोग-जो रूक्षता, क्षत (घाव) तथा विष से आर्त हों तथा जो वात और पित्तसम्बन्धी रोग से पीड़ित हों एवं जिनकी मेधा (धारण) शक्ति तथा स्मरण शक्ति हीन हो गई हो, ऐसे लोगों के लिये घी पिलाना उत्तम है ॥१४॥ अथ वसापानार्हजनानाह- कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धकफमेदसः। पिबेयुस्तैलसात्म्याश्च तलं दार्ढार्थिनस्तु ये ॥१५॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः। महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१६॥ तेल पिलाने योग्य लोग-जिनके कोष्ठ में कृमि पड़ गये हों या जो वातपीड़ित हों वा जिनका कफ तथा मेदा बढ़ गया हो अथवा जिन्हें तेल पीना सात्म्य (प्रकृति के अनुकूल) हो या शरीर को दृढ़ रखने की इच्छा हो ऐसे लोगों को तेल पिलाना (पीना) उचित है। वसा (चर्बी) पिलाने योग्य लोग-जो लोग व्यायाम (कसरत आदि) करने से कृश हो गये हों या जिनका वीर्य तथा रक्त सूख रहा हो या जो बड़े रोगी हों या जिनका जठराग्नि या वायु प्रबल हो या प्राण (बल) अधिक हो तो ऐसे लोग वसा पिलाने योग्य होते हैं ॥१५-१६॥ अथ मज्जः सर्पिषोऽपि पानार्हजनानाह- क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्त्ता दीप्तवह्नयः। मज्जानञ्च पिबेयुस्ते सर्पिर्वा सर्वतो हितम् ।। मज्जा तथा घी पिलाने योग्य लोग-जो क्रूर कोष्ठ वाले या क्लेश सहने वाले या वायु रोग से पीड़ित रहने वाले हैं, कि वा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हो ऐसे लोगों को अन्य सभी स्नेहों से अधिक हितकर समझ कर मज्जा या घी पिलाना उचित है ॥१७॥ क्रूराशयाः=क्रूरकोष्ठाः। सर्वतः=सर्वस्मात्स्नेहात् ॥१७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००५ यहाँ 'क्रूराशयाः' पद का 'क्रूर कोष्ठ वाले' तथा 'सर्वतः' पद का 'सभी स्नेहों से अधिक' अर्थ समझना चाहिये ॥१७॥ अथ शीतादिकालवातादिदोषभेदाभ्यां स्नेहपानसमयभेदानाह- शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिके रात्रौ वातश्लेष्माधिके दिवा ॥ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद से स्नेह पीने के समयों में भेद—शीत काल में दिन के समय और ग्रीष्म काल में रात्रि के समय स्नेह पिलाना (पीना) उचित है। वात-पित्त की अधिकता रहने पर रात्रि में तथा वात-कफ की अधिकता रहने पर दिन में स्नेह पिलाना उचित है ॥१८॥ अथ नस्यादिषु तैलघृतयोः प्रयोगे नियममाह- नस्याभ्यञ्जनगण्डूषमूर्ध्वकर्णाक्षितर्पणे । तैलं घृतं वा युञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ॥१९॥ नस्य (नास) आदि लेने में तैल तथा घृत का प्रयोग—नस्य (नास) लेना, शरीर में मालिस करना

१००६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ स्नेहाजीर्णशङ्कायां कर्तव्यकर्मण्याह- स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः। तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा ।।२५।। स्नेह के न पचने की आशङ्का होने पर कर्त्तव्य कर्म-यदि किसी मनुष्य को स्नेह के न पचने की आशङ्का हो तो वह गर्म जल पीवे, इससे शुद्ध उद्गार (डकार) होता है तथा अन्न खाने की रुचि उत्पन्न होती है ।।२५।। अथ स्नेहपानजतृष्णायाः प्रशमोपायमाह- स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः। तदाऽस्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य पाययेत्। शीतलं पायसं तेन तृष्णा तस्य प्रशाम्यति ।।२६।। स्नेह पीने से उत्पन्न हुई प्यास की शान्ति का उपाय-स्नेह पीने से पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की जब जठराग्नि अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाती है तब उसे अधिक प्यास लगती है, ऐसी अवस्था में उसे शीतल खीर खिलानी चाहिये जिससे कि प्यास शान्त हो जाय ।।२६।। अथ स्नेहपानायोग्यजनानाह- अजीर्णी वर्जयेत्स्नेहमुदरी तरुणज्वरी। दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छालो मेहपीडितः ।।२७।। दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः। अकालप्रसवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।।२८।। स्नेह पीने के अयोग्य लोग-जिन लोगों को अजीर्ण अथवा उदरसम्बन्धी रोग हो या जो नवीन ज्वर के रोगी हों या दुर्बल हों कि वा जिन्हें अरुचि हो वा जो मोटे हों कि वा मूर्च्छा या मेहरोग से पीड़ित हों अथवा जिन्हें बरित या विरेचन दिया गया हो वा वमन कराया गया हो या प्यास लगी हो अथवा जो परिश्रम से थक गये हों और जिस स्त्री को असमय में प्रसव हुआ हो ऐसे लोगों को स्नेह पिलाना या पीना उचित नहीं है। दुर्दिन अर्थात् जिस दिन आकाश मेघों से घिरा हो उस दिन भी स्नेहपान कराना अनुचित होता हैं ।।२७-२८।। अथ स्नेहपानयोग्यजनानाह- स्वेद्यासंशोध्यमद्यास्त्रीव्यायामासक्तचित्तकाः ।।२९।। वृद्धबालकृशा रूक्षाः क्षीणास्त्राः क्षीणरेतसः। वातार्त्तास्तिमिरार्त्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम् ।। स्नेहपान के योग्य लोग-जिन्हें स्वेद देना हो या जिनका विरेचनादि द्वारा शोधन करना हों अथवा जो मद्य (शराब), स्त्री, व्यायाम (कसरत आदि) में आसक्त चित्तवाले हों कि वा वृद्ध, बालक, दुर्बल या रूक्ष शरीर वाले हों अथवा जिनका रक्त या वीर्य क्षीण हो गया हों और जो वातरोग या तिमिररोग से पीड़ित हों ऐसे लोगों को स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना उत्तम होता है ।।२९-३०।। अथ सम्यक्स्निग्धस्य लक्षणान्याह- वातानुलोम्यं दीप्ताग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम्। मृदुस्निग्धाङ्गताऽग्लानिः स्नेहद्वेषोऽथ लाघवम् ।।३०।। विमलेन्द्रियता सम्यक्स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।।३१।। स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुये लोगों के लक्षण-वायु का अनुलोमन होना (अधोवायु आदि का यथोक्त रीति से होना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, चिकनाई लिये मल का अलग-अलग निकलना, शरीर का कोमल तथा स्निग्ध होना, ग्लानि न मालूम पड़ना, स्नेह पीने से द्वेष होना, शरीर में हल्कापन, इन्द्रियों में निर्मलता ये सब लक्षण स्नेहपान से भलीभाँति स्निग्ध होने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं और रूक्षता रहने पर इससे विपरीत लक्षण रहते हैं ।।३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १००७ अथातिस्निग्धस्य लक्षणान्याह- भक्तद्वेषो मुखस्रवो गुदे दाहः प्रवाहिका। तन्द्राऽतीसारपाण्डुत्वं भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।। अधिक मात्रा में स्निग्ध हुए लोगों के लक्षण-अन्न से द्वेष होना, मुख से स्राव होना (लार गिरना), गुदा में दाह, प्रवाहिका (मल का पतला होकर बहना), तन्द्रा तथा अतीसार का होना एवं शरीर का पीला पड़ जाना ये सब लक्षण अधिक मात्रा में स्निग्ध हो जाने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं ॥३२॥ अथ रूक्षातिस्निग्धयोर्जनयोः कर्त्तव्यकर्माण्याह- रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम्। श्यामाकचणकाद्यैश्च तक्रपिण्याकसक्तुभिः ।।३३।। रूक्ष तथा अत्यन्त स्निग्ध हुए लोगों के लिये कर्तव्य कर्म-जो लोग रूक्ष हों उन्हें स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना चाहिये और जो अधिक स्निग्ध हो गये हों तो उन्हें साँवा, चना आदि तथा तक्र (चतुर्थांश जलयुक्त छाछ), खली और सत्तू आदि खिला कर रूक्ष बनाना चाहिये ॥३३॥ अथ स्नेहसेवनस्य गुणानाह- दीप्ताग्निः शुद्धकोष्ठश्च पुष्टधातुर्दृढेन्द्रियः। निर्जरो बलवर्णाढ्यः स्नेह सेवी भवेन्नरः ॥३४॥ स्नेह सेवन करने के गुण-स्नेह का सेवन करने वाले मनुष्य की अग्नि प्रदीप्त होती है, कोष्ठ शुद्ध रहता है तथा धातु पुष्ट होता है, इन्द्रियाँ दृढ़ होती हैं एवं वह वृद्धावस्था से रहित तथा बल से युक्त होता है। उसके शरीर की कान्ति उत्तम होती है ॥३४॥ अथ स्नेहसेवने त्याज्यकर्माण्याह- स्नेहे व्यायामसंशीतवेगाघातप्रजागरान्। दिवास्वप्नमभिष्यन्दि रूक्षान्नञ्च विवर्जयेत् ॥३५॥ स्नेह का सेवन करने के समय त्याग करने योग्य कार्य-स्नेह सेवन करने के समय मनुष्य को उचित है कि व्यायाम (कसरत आदि) करना, अधिक शीत में रहना, मल-मूत्रादि के वेगों का रोकना, रात में अधिक जागना, दिन में सोना, अभिष्यन्दी (दही आदि) पदार्थ तथा रूक्ष अन्न का खाना इन सब कार्यों को छोड़ दे ॥३५॥ इति श्रीमिश्रलकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे चतुर्थं स्नेहपानविधिप्रकरणं समाप्तम् ॥४॥ अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् ॥५॥ अथ पञ्चकर्मनामान्याह- प्रथमं वमनं पश्चाद्विरेकश्चानुवासनम्। एतानि पञ्चकर्माणि निरूहो नावनं तथा ॥१॥ पञ्चकर्म के नाम-(१) वमन, (२) विरेचन, (३) अनुवासन, (४) निरूह, (५) नावन ये पाँच कर्म हैं और पञ्चकर्म से इन्हीं पाँचों का बोध होता है ॥१॥ अथ वमनम् । तत्रादौ वमनार्हसमयजनानाह- शरत्काले वसन्ते च प्रावृट्काले च देहिनाम्। वमनं रेचनं चैव कारयेत्कुशलो भिषक् ॥२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA