भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1052, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १००१ यहाँ ‘व्यवायि’ पद कां ‘प्रथम सम्पूर्ण शरीर में अपने गुणों को व्याप्त करके पश्चात् पचने वाला’, ‘विकाशि’ पद का ‘ओज को सुखाता हुआ सन्धि के बन्धनों को शिथिल करने वाला’, ‘आग्नेय’ पद का ‘अग्नि के अधिक अंशों से युक्त’, ‘योगवाहि’ पद का ‘जिसके साथ योग हो उसके गुणों को ग्रहण करने वाला’ और ‘मदावह’ पद का ‘तमोगुण की प्रधानता से बुद्धि को विध्वंस करने वाला’ अर्थ समझना चाहिये ।। २५३ ।। तदेव युक्तियुक्तन्तु प्राणदायि रसायनम्। योगवाहि परं वातश्लेष्मजित्सन्निपातहृत् ।। २५४।। इस प्रकार प्राणनाशक आदि दुर्गुणों से युक्त होता हुआ भी विष यदि युक्तिपूर्वक सेवन किया जाय तो प्राणशक्ति को देने वाला, रसायन, परम योगवाही, वात-कफनाशक एवं सन्निपात को दूर करने वाला होता है ।। २५४।। अथोपविषाणां निरूपणमाह- अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकः। गुञ्जाऽहिफेनो धत्तूरः सप्तोपविषजातयः ।। २५५ ।। उपविषों का निरूपण—आक का दूध, थूहर का दूध, कलिहारी, कनेर, गुञ्ज, अफीम, धतूर ये सात उपविष की जातियां हैं ।। २५५ ।। ❖ एतेषां शोधनं चिन्त्यम्। गुणास्तत्र द्रष्टव्याः ।। २५५ ।। यहाँ इन सबों के शोधन करने की विधि स्वयं विचार लेना चाहिये। जहाँ-जहाँ इनका द्रव्यगुण प्रकरण में उल्लेख है, वहाँ-वहाँ इनके गुण देख लेने चाहिये ।। २५५।। अथ द्रव्याणां गुणवत्तामवधिमाह- गुणहीनं भवेद्वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम्। मासद्वयात्तथा चूर्णं लभते हीनवीर्यताम् ।। २५६ ।। हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरं यदि। हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकास्तथा ।। २५७ ।। द्रव्यों के पूर्ण गुणयुक्त रहने की अवधि—जिस काष्ठौषधि का जैसा आकार है, उसी रूप में यदि वह रखा रह जाय तो १ वर्ष के बाद, यदि चूर्ण रूप में हो तो दो मास के बाद, गोली तथा अवलेह के रूप में हो तो एक वर्ष के बाद और घृत तथा तेल आदि के रूप में हो तो १ वर्ष ४ मास के बाद गुणहीन हो जाता है ।। २५६-२५७।। ❖ घृततैलाद्या इति योगविशेषणम्। चतुर्मासाधिकाः=वत्सरादुपरि चत्वारो मासाअधिकायेषु ते ।। २५६- २५७।। यहाँ ‘घृततैलाद्याः’ यह योग विशेषण है अर्थात् जो ओषधि डालकर घी वा तेल बनाये जाते हैं, उनका ग्रहण करना चाहिये। न कि केवल घी या तेल का तथा ‘चतुर्मासाधिकाः’ इस पद का ‘एक वर्ष से ऊपर ४ मास अधिक हो गये हैं जिसमें अर्थात् एक वर्ष चार मास के बाद’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। २५६-२५७।। अथ ग्रन्थान्तराद् घृततैलयोर्विशेषमाह- घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्। तैलं पक्वमपक्वञ्च चिरस्थायि गुणाधिकम् ।। २५८ ।। ग्रन्थान्तर से घी तथा तेल के विषय में विशेषता—एक वर्ष के बाद पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है और तेल चाहे पकाया या न पकाया हुआ हो जैसे-जैसे अधिक दिन का होता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है ।।२५८।। ❖ तदपि षोडशमासाभ्यन्तरीणं पक्वं तैलं गुणाधिकं बोद्धव्यम् ।। २५८ ।। यहाँ तेल के विषय में इतना और समझ लेना चाहिये कि— १६ मास के अन्दर तक ही पकाया हुआ तैल उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होता है, बाद में नहीं ।। २५८ ।। ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निंवीर्या वत्सरात्परम्। पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः ।। २५९।।