भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1051, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1051

१००० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ मारितवज्रस्य गुणानाह- आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। २४७ ।। मारे हुये हीरे के गुण-मरा हुआ हीरा (भस्म)-सेवन करने से आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है और सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है। इसमें कोई संशय नहीं है ।। २४७ ।। अथ शेषरत्नानां शोधनमारणविधिमाह- वज्रवत्सर्वरत्नानि शोधयेन्मारयेत्तथा। शुद्धानां मारितानाञ्च तेषां शृणु गुणानपि ।। २४८ ।। मणयो वीर्यतः शीता मधुरास्तुवरा रसात्। चक्षुष्या लेखनाश्चापि सारका विषहारकाः ।। धारणात्ते तु भङ्गल्या ग्रहदृष्टिहरा अपि ।। २४९ ।। शेष अन्य रत्नों के शोधन तथा मारण की विधि-हीरे के समान ही शेष सभी रत्नों का भी शोधन तथा मारण करना चाहिये। शोधन तथा मारण किये हुये सभी रत्न-शीतवीर्य, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, सारक, विष को हरण करने वाले, धारण करने से मङ्गल को देने वाले और ग्रह के दोषों को दूर करने वाले होते हैं ।। २४८-२४९ ।। ❖ उपरत्नानां शोधनमारणविधिश्चिन्त्यः ।। २४८ - २४९ ।। यहाँ उपरत्नों के शोधन तथा मारण की विधि विचार करके स्थिर कर लेनी चाहिये। अथ विषोपविषाणां शोधनविधिमाह- तत्र वत्सनाभस्य स्वरूपमाह- सिन्धुवारसहक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा। यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।। २५० ।। वत्सनाभ विष के लक्षण-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार में जो बछड़े की नाभि के समान हो एवं जिसके समीप में अन्य वृक्षों की वृद्धि न होती हो उसे वत्सनाभ विष कहते हैं ।। २५० ।। अथ विषस्य शोधनविधिमाह- गोमूत्रे त्रिदिनं स्थाप्यं विषं तेन विशुद्ध्यति। रक्तसर्षपतैलाक्ते तथा धार्यञ्च वाससि ।। २५१ ।। ये गुणा गरले प्रोक्तास्ते स्युर्हीना विशोधनात्। तस्माद्विषं प्रयोगे तु शोधयित्वा प्रयोजयेत् ।। २५२ ।। विष शोधने की विधि-तीन दिन तक विष को गोमूत्र में भिगो कर रखने के बाद उसे लाल सरसों के तेल में भीगे हुये कपड़े के अन्दर रख दे, ऐसा करने से विष शुद्ध हो जाता है। जो प्राण हरण करना आदि दोष विष के कहे हुये हैं वे सब शोधन करने से ही (कम) हो जाते हैं। अतः विष को शोधन करके ओषधियों के काम में लायें ।। २५१-२५२ ।। अथ विषस्य गुणानाह- विषं प्राणहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च। आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् ।। २५३ ।। विष के गुण-विष-प्राणनाशक, व्यवायी, विकाशी, आग्नेय, वात-कफ नाशक, योगवाही तथा मदावह होता है ।। २५३ ।। ❖ व्यवायि=सकलकायगुणव्यापनपूर्वकं पाकगमनशीलम्। विकाशि=ओजः शोषणपूर्वकं सन्धि- बन्धशिथिलीकरणशीलम्। आग्नेयम्=अधिकाग्न्यंशम्। योगवाहि=सङ्गिगुणग्राहकम्। मदावहम्=- तमोगुणप्राधान्येन बुद्धिविध्वंसकम् ।। २५३ ।।