भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९९ विशेष शुद्धि-मुरदासंग, गेरू, शङ्ख, कासीस, सुहागा, काला सुरमा, सितुही के सभी भेद, छोटे शङ्ख, कौड़ी ये सब जम्बीरी नींबू से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकाने के बाद किंचित् गर्म जल से धो लेने पर शुद्ध हो जाते हैं। उसके बाद हर एक योगों में इन सबों का प्रयोग करना वैद्यों के लिये उचित है ।।२३८-२३९।। ❖ एवं शोधितानामुपरसानां पृथग्गुणा गुणग्रन्थे द्रष्टव्याः ।।२३८-२३९।। इस प्रकार शुद्ध किये हुये उपरसों के पृथक् पृथक् गुण जहाँ पर इनके गुण लिखे हुये हैं वहाँ देखना चाहिये ।।२३८-२३९।। अथ रत्नानां शोधनमारणविधिमाह तत्राशुद्धवज्रस्य दोषानाह- अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुत्वं पङ्गुलत्वञ्च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। अशुद्ध (बिना शोधे हुए) हीरे के दोष-