भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मैनसिल शोधने की विधि-मैनसिल को ३ दिन तक बकरी के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकावे, पश्चात् बकरी के पित्त से सात बार भावना देनेसे मैनसिल शुद्ध हो जाती है ॥२३१॥ अथ शोधितमनःशिलाया गुणानाह- गुर्वी मनःशिला वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।। शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण-शुद्ध मैनसिल-गुरु, वर्ण को उत्तम करने वाली, सारक, उष्ण, लेखन गुण युक्त, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध एवं विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है ॥२३२॥ अथ खर्परस्तुत्थभेदस्तस्य शोधनविधिमाह- नरमूत्रे च गोमूत्रे सप्ताहं रसकं पचेत् । दोलायन्त्रेण शुद्धः स्यात्ततः कार्येषु योजयेत् ।।२३३।। तूतिया का भेद जो खपरिया है उसके शोधन की विधि-खपरिया को मनुष्य के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे फिर गोमूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे । ऐसा करने से वह शुद्ध हो जाती है और इसके बाद कार्य में लेने योग्य होती है ॥२३३॥ अथ शुद्धखर्परस्य गुणानाह- खर्परं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु । लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत् ।। विषाश्मकुष्ठकण्डूनां नाशन परम मतम् ।।२३४।। शुद्ध खपरिया के गुण-शुद्ध खपरिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारी, वमन कराने वाली, लघु, लेखनगुणयुक्त, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली एवं विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को अत्यन्त नष्ट करने वाली होती है ॥२३४॥ अथ सर्वोपरसानां साधारणशोधनविधिमाह- सूर्यावर्त्तो वज्रकन्दः कदली देवदालिका । शिग्रुः कोषातकी बन्ध्या काकमाची च बालकम् ।।२३५।। एषामेकरसेनैव त्रिक्षारैर्लवणैः सह । भावयेदम्लवर्गैश्च दिनमेकं प्रयत्नतः ।।२३६।। ततः पचेच्च तद्द्वावैर्दोलायन्त्रे दिनं सुधीः । एवं शुद्ध्यन्ति ते सर्वे प्रोक्ता उपरसा हि ये ।।२३७।। सम्पूर्ण उपरसों के शोधने की साधारण विधि-हुरहुर, वज्रकन्द (जंगली सूरन), केला, देवदाली (सनैया), सहंजना, तोरई, बाँझककोड़ा, मकोय, सुगन्धबाला इन सबों में से किसी एक का रस, क्षारत्रय१ (जवाखार, सुहागा, सज्जीखार), पाँचो२ नोन तथा अम्लवर्गोक्त (अमलवेत, जम्बीरी नींबू आदि) पदार्थों का रस इन सबों से एक दिन तक भावना दे उसके बाद उपर्युक्त इन्हीं रसों से भरे दोलायन्त्र में उपरसों को रख कर एक दिन तक पकावे । ऐसा करने से जितने उपरस कहे हुए हैं वे सभी शुद्ध हो जाते हैं ॥२३५-२३७॥ अथ विशेषशुद्धिमाह- कङ्कुष्ठं गैरिकं शङ्खः कासीसं टङ्कणं तथा । नीलाञ्जनं शुक्तिभेदाः क्षुल्लकाः सवराटकाः ।।२३८।। जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा । शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ।।२३९।। १. स्वर्जिका च यवक्षारष्टङ्कणक्षार एव च । क्षारत्रयं समाख्यातं त्रिक्षारः स च कथ्यते ।। अर्थ-सज्जीखार, जवाखार, सुहागा ये तीनों मिलकर क्षारत्रय या त्रिक्षार कहलाते हैं। २. सैन्धवं रुचकं चैव विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रेण समायुक्तं ज्ञेयं लवणपञ्चकम् ।। अर्थ-सेंधा नमक, कालानोन, विरिया सञ्चर नोन, औद्भिद (रेहगवा नोन), समुद्रीनोन इन सबों के योग को लवणपञ्चक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA