भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १९७ हरताल को रख अलग एक-एक प्रहर तक पकावे, इस भाँति चार प्रहर तक दोलायन्त्र में रख कर पकाने से हरताल शुद्ध हो जाता है ॥२२०-२२१॥ अथ हरितालस्य मारणविधिमाह- सदलं तालकं शुद्धं पौनर्नवरसेन तु। खल्वे विमर्दयेदेकं दिनं पश्चाद्विशोधयेत् ।।२२२।। ततः पुनर्नवाक्षारैः स्थाल्यामर्द्धं प्रपूरयेत्। तत्र तद्गोलकं कृत्वा पुनस्तेनैव पूरयेत् ।।२२३।। आकण्ठं पिठरं तस्य पिधानं धारयेन्मुखे। स्थालीं चुल्ल्यां समारोप्य क्रमाद्वह्निं विवर्धयेत् ।।२२४।। दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेत् ।।२२५।। एवं तन्म्रियते तालं मात्रा तस्यैकरक्तिका। अनुपानान्यनेकानि यथायोग्यं प्रयोजयेत् ।।२२६।। हरताल मारने की विधि-शुद्ध किये हुये दलयुक्त तबकिया हरताल को लेकर पुनर्नवा (सफेद) के रस के साथ खल में रख कर एक दिन तक खरल करे पश्चात् गोला बना कर तथा सुखा कर एक हाँड़ी में आधे दूर तक सफेद पुनर्नवा का खार भर कर उसके ऊपर उक्त हरताल के गोले को रख कर ऊपर से पुनः सफेद पुनर्नवा का खार हाँड़ी के गले तक भर रख दे और ऊपर से हाँड़ी का मुख बन्द कर चूल्हे पर रख कर नीचे आग जला दे और आँच धीरे-धीरे तेज करता जाय, इस तरह पाँच दिन तथा पाँच रात तक अखण्ड आँच देने से हरताल मर जाता है। इसकी मात्रा १ रत्ती की होती है तथा अनेक प्रकार के अनुपानों में जहाँ जिसकी योग्यता हो रोगादि के अनुसार उस अनुपान के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये ॥२२२-२२६॥ अथ शोधितमारितहरितालयोर्गुणानाह- हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरेद्विषम्। कण्डूकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।२२७।। शुद्ध किये हुये और मारे हुये हरताल के गुण-उक्त प्रकार का हरताल-कटु तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, उष्ण एवं विष, खुजली, कुष्ठ, मुख सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, बाल तथा व्रण को नष्ट करने वाला होता है ॥२२७॥ अन्यच्च- तालकं हरते रोगान्कुष्ठमृत्युज्वरापहम्। शोधितं कुरुते कान्तिं वीर्यवृद्धिं तथाऽऽयुषम् ।।२२८।। और भी कहा है कि-शोधित हरताल-रोगनाशक, शरीर की कान्ति तथा वीर्य की वृद्धि करने वाला, आयु को बढ़ाने वाला एवं कुष्ठ, अकाल मृत्यु तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२२८॥ अथाशुद्धमनःशिलाया दोषानाह- तालकस्यैव भेदोऽस्ति मनोगुप्तैतदन्तरम्। तालकं त्वतिपीतं स्याद्भवेद्रक्ता मनःशिला ।।२२९।। मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलस्य बन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदञ्च कुर्यात् ।।२३०।। अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप-हरताल के एक भेद को ही मैनसिल कहते हैं। क्योंकि इन दोनों में केवल यही अन्तर है कि हरताल का रङ्ग अत्यन्त पीला होता है और मैनसिल का रङ्ग लाल होता है। अशुद्ध मैनसिल के दोष- बिना शोधा हुआ मैनसिल सेवन करने से मनुष्य को मन्द बलवाला कर देती है और दुर्बलता, क्रिमि, मल का विबन्ध, मूत्र का अवरोध तथा शर्करा युक्त मूत्रकृच्छ्र करने वाली होती है ॥२२९-२३०॥ अथ मनःशिलायाः शोधनविधिमाह- पचेत्त्र्यहमजामूत्रे दोलायन्त्रे मनःशिलाम्। भावयेत्सप्तधा पित्तैरजायाः सा विशुद्ध्यति ।।२३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA