भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 1053

१००२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जल्दी ही पक कर तैयार हो जाने वाले धान्यादि एक वर्ष के बाद निर्वीर्य हो जाते हैं और आसव, धातु (सोना आदि) तथा रस (रससिन्दूरादि) जितने ही अधिक पुराने होते जाते हैं, उतने ही अधिक गुणकारी होते हैं ।।२५९।। ❖ ओषध्यः=धान्यादयः । लघुपाकाः=शीघ्रपाकाः । निर्वीर्याः स्युः ।।२५९।। यहाँ 'ओषध्यः' पद का 'धान्यादि' । 'लघुपाकाः' पद का 'शीघ्र पक कर तैयार हो जाने वाले, हीनवीर्य हो जाते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२५९।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।३।। अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् ।।४।। तत्र स्नेहस्य भेदान् विशेषनामानि चाह- स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तो घृतं तैलं वसा तथा ।। मज्जा च तं पिबेन्मर्त्यः किञ्चिदभ्युदिते रवौ ।।१।। स्थावरो जङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेह उच्यते । तिलतैलं स्थावरेषु जङ्गमेषु घृतं वरम् ।। द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा यमकस्त्रिवृतो महान् ।।२।। स्नेह के भेद तथा विशेष नाम-स्नेह चार प्रकार का होता है । (१) घी, (२) तेल, (३) चर्बी और (४) मज्जा । स्नेह को थोड़ा सूर्य उदय हो जाने पर पीना चाहिये । इनकी दो योनियाँ हैं । एक स्थावर, दूसरी जङ्गम अर्थात् तेल स्थावर स्नेह और घी, चर्बी तथा मज्जा ये सब जङ्गम स्नेह कहलाते हैं । इससे स्नेह द्वियोनि कहलाता है । स्थावर स्नेहों में तिल का तेल और जङ्गम स्नेहों में घी उत्तम होता है । दो स्नेहों के मिलने से यमक, तीन के मिलने से त्रिवृत और चार के मिलने से महान् संज्ञक स्नेह होता है ।।१-२।। ❖ अस्यायमर्थः-द्वाभ्यां स्नेहाभ्यां घृततैलाभ्यां यमकाख्यः स्नेहः स्यात् । त्रिभिः-स्नेहैर्घृततैलव- सारूपैस्त्रिवृताख्यः स्यात् । चतुर्भिर्घृततैलवसामज्जभिर्महान्=महास्नेह स्यादित्यर्थः ।।१-२।। यहाँ 'द्वाभ्याम्' इत्यादि पदों का यह अर्थ समझना चाहिये कि-'दो स्नेह अर्थात् घी और तेल के मिलने से 'यमक' नामक स्नेह होता है। तीन स्नेह अर्थात् घी, तेल तथा चर्बी के मिलने से 'त्रिवृत्' अर्थात् 'महास्नेह' कहलाते हैं' १-२।। पिबेत् त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि वा ।।३।। तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन या छः दिन तक स्नेह पीना चाहिये ।।३।। ❖ मृदुमध्यक्रूरकोष्ठापेक्षया त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि चेति ।।३।। यहाँ 'मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ की अपेक्षा से तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन तथा छः दिन पीने को कहा है अर्थात् मृदुकोष्ठ वाला पुरुष तीन दिन तक, मध्य कोष्ठ वाला चार दिन तक इत्यादि क्रम से पीवे' । यदुक्तम्- मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निग्धस्नेहोपसेवया। मध्यकोष्ठश्चतुर्भिंश्च दिवसैः स्निह्यति ध्रुवम् ।।१।। पञ्चभिर्वाऽथ षड्भिर्वा दिनैः क्रूरो विशुद्ध्यति । सप्तरात्रात्परं स्नेहः सात्मीभवति सेवितः ।।२।।