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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१००२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जल्दी ही पक कर तैयार हो जाने वाले धान्यादि एक वर्ष के बाद निर्वीर्य हो जाते हैं और आसव, धातु (सोना आदि) तथा रस (रससिन्दूरादि) जितने ही अधिक पुराने होते जाते हैं, उतने ही अधिक गुणकारी होते हैं ।।२५९।। ❖ ओषध्यः=धान्यादयः । लघुपाकाः=शीघ्रपाकाः । निर्वीर्याः स्युः ।।२५९।। यहाँ 'ओषध्यः' पद का 'धान्यादि' । 'लघुपाकाः' पद का 'शीघ्र पक कर तैयार हो जाने वाले, हीनवीर्य हो जाते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२५९।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।३।। अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् ।।४।। तत्र स्नेहस्य भेदान् विशेषनामानि चाह- स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तो घृतं तैलं वसा तथा ।। मज्जा च तं पिबेन्मर्त्यः किञ्चिदभ्युदिते रवौ ।।१।। स्थावरो जङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेह उच्यते । तिलतैलं स्थावरेषु जङ्गमेषु घृतं वरम् ।। द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा यमकस्त्रिवृतो महान् ।।२।। स्नेह के भेद तथा विशेष नाम-स्नेह चार प्रकार का होता है । (१) घी, (२) तेल, (३) चर्बी और (४) मज्जा । स्नेह को थोड़ा सूर्य उदय हो जाने पर पीना चाहिये । इनकी दो योनियाँ हैं । एक स्थावर, दूसरी जङ्गम अर्थात् तेल स्थावर स्नेह और घी, चर्बी तथा मज्जा ये सब जङ्गम स्नेह कहलाते हैं । इससे स्नेह द्वियोनि कहलाता है । स्थावर स्नेहों में तिल का तेल और जङ्गम स्नेहों में घी उत्तम होता है । दो स्नेहों के मिलने से यमक, तीन के मिलने से त्रिवृत और चार के मिलने से महान् संज्ञक स्नेह होता है ।।१-२।। ❖ अस्यायमर्थः-द्वाभ्यां स्नेहाभ्यां घृततैलाभ्यां यमकाख्यः स्नेहः स्यात् । त्रिभिः-स्नेहैर्घृततैलव- सारूपैस्त्रिवृताख्यः स्यात् । चतुर्भिर्घृततैलवसामज्जभिर्महान्=महास्नेह स्यादित्यर्थः ।।१-२।। यहाँ 'द्वाभ्याम्' इत्यादि पदों का यह अर्थ समझना चाहिये कि-'दो स्नेह अर्थात् घी और तेल के मिलने से 'यमक' नामक स्नेह होता है। तीन स्नेह अर्थात् घी, तेल तथा चर्बी के मिलने से 'त्रिवृत्' अर्थात् 'महास्नेह' कहलाते हैं' १-२।। पिबेत् त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि वा ।।३।। तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन या छः दिन तक स्नेह पीना चाहिये ।।३।। ❖ मृदुमध्यक्रूरकोष्ठापेक्षया त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि चेति ।।३।। यहाँ 'मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ की अपेक्षा से तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन तथा छः दिन पीने को कहा है अर्थात् मृदुकोष्ठ वाला पुरुष तीन दिन तक, मध्य कोष्ठ वाला चार दिन तक इत्यादि क्रम से पीवे' । यदुक्तम्- मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निग्धस्नेहोपसेवया। मध्यकोष्ठश्चतुर्भिंश्च दिवसैः स्निह्यति ध्रुवम् ।।१।। पञ्चभिर्वाऽथ षड्भिर्वा दिनैः क्रूरो विशुद्ध्यति । सप्तरात्रात्परं स्नेहः सात्मीभवति सेवितः ।।२।।

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००३ क्योंकि कहा भी है कि-तीन रात्रि तक स्नेह का सेवन करने (पीने) से मृदुकोष्ठ वाला पुरुष स्निग्ध होता है। मध्य कोष्ठ वाला पुरुष चार दिन तक स्नेह सेवन करने से निश्चय स्निग्ध होता है और क्रूर कोष्ठवाला पाँच या छ दिन तक स्नेह सेवन करने से शुद्ध होता है। स्नेह का सेवन करते हुए जब सात रात्रि बीत जाती है, तब वह सात्म्य (शरीर के अनुकूल) हो जाता है। मृदुमध्यक्रूरकोष्ठानां सर्वेषां सप्तरात्रात्परं सात्मीभवति। वातानुलोम्यवह्निदीप्तिकोष्ठशुद्धिमृदु- स्निग्धाङ्गलाघवधातुपुष्टिद्विजदार्ढ्यनिर्जरताबलवर्णकारी भवति। न तु भक्तद्वेषग्लान्यादीन् करोति ।।३।। यहाँ यह भी समझना चाहिये कि-मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले सभों को ही सात रात्रि के बाद स्नेहसेवन सात्म्य हो जाता है। इससे वायु का अनुलोमन (अपने स्वाभाविक स्थिति पर रहना), अग्नि प्रदीप्त होना, कोष्ठ की शुद्धि, अङ्ग, स्वर आदि की मृदुता तथा स्निग्धता, अङ्गों की लघुता, धातुओं की पुष्टि, दाँतों की दृढ़ता, वृद्धावस्था से रहित होना, बल की वृद्धि तथा वर्ण की उज्ज्वलता होती है। किन्तु अन्न से द्वेष होना तथा ग्लानि आदि नहीं करता है ॥१-२॥३॥ दोषकालयोवह्निबलान्यालोक्य योजयेत्। हीनाञ्च मध्यमां ज्येष्ठां मात्रां स्नेहस्य बुद्धिमान् ।।४।। अमात्रया तथाऽकाले मिथ्याऽऽहारविहारतः। स्नेहः करोति शोथार्शस्तन्द्रानिद्राविसंज्ञताः ।।५।। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह-दोष (वातादि), काल (वसन्तादि ऋतु तथा प्रातः, मध्याह्न आदि), रोगों की अवस्था, अग्नि तथा बल को देख कर तदनुसार हीन, मध्यम तथा ज्येष्ठ मात्रा स्नेह की दे। बिना मात्रा के तथा असमय में एवं मिथ्या आहार-विहार करने के साथ-साथ स्नेह का सेवन करना मनुष्य को शोष, अर्श, तन्द्रा, निद्रा तथा बेहोशी उत्पन्न करने वाला होता है ॥४-५॥ द्वेया दीप्ताग्नये मात्रा स्नेहस्यैकपलोन्मितः । मध्यमाय त्रिकर्षा स्याज्जघन्याय द्विकार्षिकी ।।६।। दीप्त अग्नि वाले पुरुषों के लिये स्नेह पीने की मात्रा १ पल (चार तोले) की देनी चाहिये। मध्यम अग्नि वालों के लिये ३ कर्ष (३ तोले) की मात्रा और हीन अग्नि वालों के लिये दो कर्ष (२ तोले) की मात्रा स्नेह पीने को देनी चाहिये ॥६॥ ❖ मध्यमाय=मध्यमाग्नये। जघन्याय=हीनाग्नये ।।६।। यहाँ 'मध्यमाय' पद का 'मध्यम अग्नि वालों के लिये' तथा 'जघन्याय' पद का 'हीन अग्नि वालों के लिये' यह अर्थ समझना चाहिये ॥६॥ अथवा स्नेहमात्राः स्युस्तिस्रोऽन्याः सर्वसम्मताः। अहोरात्रेण महती जीर्यत्यह्नि तु मध्यम ।। जीर्यत्यल्पा दिनाद्धेन सा विज्ञेया सुखावहा ।।७।। अथवा सभी वैद्यों को अभिमत इनसे अन्य तीन प्रकार की मात्रायें और होती हैं-एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली जो स्नेहमात्रा होती है वह 'महती', दिन भर में पचने वाली मात्रा 'मध्यमा' और आधे दिन में ही पचने वाली मात्रा 'अल्पा (कनिष्ठा)' कहलाती है और वह (अल्प मात्रा) सुख देने वाली भी होती है ॥७॥ अयमर्थः-याऽहोरात्रेण जीर्यति सा मात्रा महती। एवं मध्यमा कनिष्ठा च ज्ञेया ।।७।। यहाँ यह अर्थ समझना चाहिये कि-जो एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली होती है वह 'महती' नामक मात्रा होती है। इसी भाँति से मध्यमा तथा कनिष्ठा मात्रा को भी समझ लेना चाहिए ॥७॥ अल्पा स्याद्दीपनी वृष्या स्वल्पदोषे प्रपूजिता ।।८।। मध्यमा स्नेहनी ज्ञेया बृंहणी भ्रमहारिणी। ज्येष्ठा कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ।।९।।

१००४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अल्पा (कनिष्ठा) मात्रा अग्निदीपक तथा वीर्यवर्धक होती है और अल्प दोष वाले पुरुषों के लिये उत्तम होती है, ‘मध्यमा’ मात्रा स्नेहन करने वाली, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा भ्रमरोग नाशक होती है एवं ‘ज्येष्ठा’ मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहबाधा तथा मिर्गी को दूर करने वाली होती है ॥८-९॥ सुश्रुतः पुनरेवमाह- या मात्रा प्रथमे यामे गते जीर्यति वासरे। सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥१०॥ या मात्रा वासरस्यार्द्धे व्यतीते परिजीर्यति। सा वृष्या बृंहणी च स्यान्मध्यदोषे प्रपूजिता ॥११॥ या मात्रा चरमे यामे स्थितेऽह्नः परिजीर्यति। सा मात्रा स्नेहनी ज्ञेया बहुदोषेषु पूजिता ॥१२॥ केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम्। देयं बहुकफे वह्निव्योषक्षारसमन्वितम् ॥१३॥ मात्रा के विषय में सुश्रुत का मत-जो स्नेह की मात्रा दिन का एक प्रहर बीत जाने पर ही पच जाने वाली होती है, वह अग्नि को प्रदीप्त करने वाली तथा अल्प दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। जो मात्रा दिन के आधा भाग बीत जाने पर पच जाने वाली होती है वह वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा मध्यम दोष वालों के लिये उत्तम होती है। और जो मात्रा दिन के अन्तिम प्रहर में पचने वाली होती है वह स्नेहन करने वाली तथा अधिक दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। पित्त की अधिकता में केवल घृत-पान करने को देना चाहिये, वात की अधिकता में सेंधा नमक मिला कर घी देना चाहिये और कफ की अधिकता में चीता, सोंठ, पीपर, क्षार (जवाखार आदि) मिला कर घी पीने के लिये देना चाहिये ॥१०-१३॥ अथ सर्पिष्पानार्हजनानाह- रूक्षक्षतविषार्त्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिष्पानं प्रशस्यते ॥१४॥ घी पिलाने योग्य लोग-जो रूक्षता, क्षत (घाव) तथा विष से आर्त हों तथा जो वात और पित्तसम्बन्धी रोग से पीड़ित हों एवं जिनकी मेधा (धारण) शक्ति तथा स्मरण शक्ति हीन हो गई हो, ऐसे लोगों के लिये घी पिलाना उत्तम है ॥१४॥ अथ वसापानार्हजनानाह- कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धकफमेदसः। पिबेयुस्तैलसात्म्याश्च तलं दार्ढार्थिनस्तु ये ॥१५॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः। महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१६॥ तेल पिलाने योग्य लोग-जिनके कोष्ठ में कृमि पड़ गये हों या जो वातपीड़ित हों वा जिनका कफ तथा मेदा बढ़ गया हो अथवा जिन्हें तेल पीना सात्म्य (प्रकृति के अनुकूल) हो या शरीर को दृढ़ रखने की इच्छा हो ऐसे लोगों को तेल पिलाना (पीना) उचित है। वसा (चर्बी) पिलाने योग्य लोग-जो लोग व्यायाम (कसरत आदि) करने से कृश हो गये हों या जिनका वीर्य तथा रक्त सूख रहा हो या जो बड़े रोगी हों या जिनका जठराग्नि या वायु प्रबल हो या प्राण (बल) अधिक हो तो ऐसे लोग वसा पिलाने योग्य होते हैं ॥१५-१६॥ अथ मज्जः सर्पिषोऽपि पानार्हजनानाह- क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्त्ता दीप्तवह्नयः। मज्जानञ्च पिबेयुस्ते सर्पिर्वा सर्वतो हितम् ।। मज्जा तथा घी पिलाने योग्य लोग-जो क्रूर कोष्ठ वाले या क्लेश सहने वाले या वायु रोग से पीड़ित रहने वाले हैं, कि वा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हो ऐसे लोगों को अन्य सभी स्नेहों से अधिक हितकर समझ कर मज्जा या घी पिलाना उचित है ॥१७॥ क्रूराशयाः=क्रूरकोष्ठाः। सर्वतः=सर्वस्मात्स्नेहात् ॥१७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००५ यहाँ 'क्रूराशयाः' पद का 'क्रूर कोष्ठ वाले' तथा 'सर्वतः' पद का 'सभी स्नेहों से अधिक' अर्थ समझना चाहिये ॥१७॥ अथ शीतादिकालवातादिदोषभेदाभ्यां स्नेहपानसमयभेदानाह- शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिके रात्रौ वातश्लेष्माधिके दिवा ॥ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद से स्नेह पीने के समयों में भेद—शीत काल में दिन के समय और ग्रीष्म काल में रात्रि के समय स्नेह पिलाना (पीना) उचित है। वात-पित्त की अधिकता रहने पर रात्रि में तथा वात-कफ की अधिकता रहने पर दिन में स्नेह पिलाना उचित है ॥१८॥ अथ नस्यादिषु तैलघृतयोः प्रयोगे नियममाह- नस्याभ्यञ्जनगण्डूषमूर्ध्वकर्णाक्षितर्पणे । तैलं घृतं वा युञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ॥१९॥ नस्य (नास) आदि लेने में तैल तथा घृत का प्रयोग—नस्य (नास) लेना, शरीर में मालिस करना

१००६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ स्नेहाजीर्णशङ्कायां कर्तव्यकर्मण्याह- स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः। तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा ।।२५।। स्नेह के न पचने की आशङ्का होने पर कर्त्तव्य कर्म-यदि किसी मनुष्य को स्नेह के न पचने की आशङ्का हो तो वह गर्म जल पीवे, इससे शुद्ध उद्गार (डकार) होता है तथा अन्न खाने की रुचि उत्पन्न होती है ।।२५।। अथ स्नेहपानजतृष्णायाः प्रशमोपायमाह- स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः। तदाऽस्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य पाययेत्। शीतलं पायसं तेन तृष्णा तस्य प्रशाम्यति ।।२६।। स्नेह पीने से उत्पन्न हुई प्यास की शान्ति का उपाय-स्नेह पीने से पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की जब जठराग्नि अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाती है तब उसे अधिक प्यास लगती है, ऐसी अवस्था में उसे शीतल खीर खिलानी चाहिये जिससे कि प्यास शान्त हो जाय ।।२६।। अथ स्नेहपानायोग्यजनानाह- अजीर्णी वर्जयेत्स्नेहमुदरी तरुणज्वरी। दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छालो मेहपीडितः ।।२७।। दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः। अकालप्रसवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।।२८।। स्नेह पीने के अयोग्य लोग-जिन लोगों को अजीर्ण अथवा उदरसम्बन्धी रोग हो या जो नवीन ज्वर के रोगी हों या दुर्बल हों कि वा जिन्हें अरुचि हो वा जो मोटे हों कि वा मूर्च्छा या मेहरोग से पीड़ित हों अथवा जिन्हें बरित या विरेचन दिया गया हो वा वमन कराया गया हो या प्यास लगी हो अथवा जो परिश्रम से थक गये हों और जिस स्त्री को असमय में प्रसव हुआ हो ऐसे लोगों को स्नेह पिलाना या पीना उचित नहीं है। दुर्दिन अर्थात् जिस दिन आकाश मेघों से घिरा हो उस दिन भी स्नेहपान कराना अनुचित होता हैं ।।२७-२८।। अथ स्नेहपानयोग्यजनानाह- स्वेद्यासंशोध्यमद्यास्त्रीव्यायामासक्तचित्तकाः ।।२९।। वृद्धबालकृशा रूक्षाः क्षीणास्त्राः क्षीणरेतसः। वातार्त्तास्तिमिरार्त्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम् ।। स्नेहपान के योग्य लोग-जिन्हें स्वेद देना हो या जिनका विरेचनादि द्वारा शोधन करना हों अथवा जो मद्य (शराब), स्त्री, व्यायाम (कसरत आदि) में आसक्त चित्तवाले हों कि वा वृद्ध, बालक, दुर्बल या रूक्ष शरीर वाले हों अथवा जिनका रक्त या वीर्य क्षीण हो गया हों और जो वातरोग या तिमिररोग से पीड़ित हों ऐसे लोगों को स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना उत्तम होता है ।।२९-३०।। अथ सम्यक्स्निग्धस्य लक्षणान्याह- वातानुलोम्यं दीप्ताग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम्। मृदुस्निग्धाङ्गताऽग्लानिः स्नेहद्वेषोऽथ लाघवम् ।।३०।। विमलेन्द्रियता सम्यक्स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।।३१।। स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुये लोगों के लक्षण-वायु का अनुलोमन होना (अधोवायु आदि का यथोक्त रीति से होना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, चिकनाई लिये मल का अलग-अलग निकलना, शरीर का कोमल तथा स्निग्ध होना, ग्लानि न मालूम पड़ना, स्नेह पीने से द्वेष होना, शरीर में हल्कापन, इन्द्रियों में निर्मलता ये सब लक्षण स्नेहपान से भलीभाँति स्निग्ध होने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं और रूक्षता रहने पर इससे विपरीत लक्षण रहते हैं ।।३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १००७ अथातिस्निग्धस्य लक्षणान्याह- भक्तद्वेषो मुखस्रवो गुदे दाहः प्रवाहिका। तन्द्राऽतीसारपाण्डुत्वं भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।। अधिक मात्रा में स्निग्ध हुए लोगों के लक्षण-अन्न से द्वेष होना, मुख से स्राव होना (लार गिरना), गुदा में दाह, प्रवाहिका (मल का पतला होकर बहना), तन्द्रा तथा अतीसार का होना एवं शरीर का पीला पड़ जाना ये सब लक्षण अधिक मात्रा में स्निग्ध हो जाने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं ॥३२॥ अथ रूक्षातिस्निग्धयोर्जनयोः कर्त्तव्यकर्माण्याह- रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम्। श्यामाकचणकाद्यैश्च तक्रपिण्याकसक्तुभिः ।।३३।। रूक्ष तथा अत्यन्त स्निग्ध हुए लोगों के लिये कर्तव्य कर्म-जो लोग रूक्ष हों उन्हें स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना चाहिये और जो अधिक स्निग्ध हो गये हों तो उन्हें साँवा, चना आदि तथा तक्र (चतुर्थांश जलयुक्त छाछ), खली और सत्तू आदि खिला कर रूक्ष बनाना चाहिये ॥३३॥ अथ स्नेहसेवनस्य गुणानाह- दीप्ताग्निः शुद्धकोष्ठश्च पुष्टधातुर्दृढेन्द्रियः। निर्जरो बलवर्णाढ्यः स्नेह सेवी भवेन्नरः ॥३४॥ स्नेह सेवन करने के गुण-स्नेह का सेवन करने वाले मनुष्य की अग्नि प्रदीप्त होती है, कोष्ठ शुद्ध रहता है तथा धातु पुष्ट होता है, इन्द्रियाँ दृढ़ होती हैं एवं वह वृद्धावस्था से रहित तथा बल से युक्त होता है। उसके शरीर की कान्ति उत्तम होती है ॥३४॥ अथ स्नेहसेवने त्याज्यकर्माण्याह- स्नेहे व्यायामसंशीतवेगाघातप्रजागरान्। दिवास्वप्नमभिष्यन्दि रूक्षान्नञ्च विवर्जयेत् ॥३५॥ स्नेह का सेवन करने के समय त्याग करने योग्य कार्य-स्नेह सेवन करने के समय मनुष्य को उचित है कि व्यायाम (कसरत आदि) करना, अधिक शीत में रहना, मल-मूत्रादि के वेगों का रोकना, रात में अधिक जागना, दिन में सोना, अभिष्यन्दी (दही आदि) पदार्थ तथा रूक्ष अन्न का खाना इन सब कार्यों को छोड़ दे ॥३५॥ इति श्रीमिश्रलकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे चतुर्थं स्नेहपानविधिप्रकरणं समाप्तम् ॥४॥ अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् ॥५॥ अथ पञ्चकर्मनामान्याह- प्रथमं वमनं पश्चाद्विरेकश्चानुवासनम्। एतानि पञ्चकर्माणि निरूहो नावनं तथा ॥१॥ पञ्चकर्म के नाम-(१) वमन, (२) विरेचन, (३) अनुवासन, (४) निरूह, (५) नावन ये पाँच कर्म हैं और पञ्चकर्म से इन्हीं पाँचों का बोध होता है ॥१॥ अथ वमनम् । तत्रादौ वमनार्हसमयजनानाह- शरत्काले वसन्ते च प्रावृट्काले च देहिनाम्। वमनं रेचनं चैव कारयेत्कुशलो भिषक् ॥२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१००८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बलवन्तं कफव्याप्तं हल्लासादिनिपीडितम् । तथा वमनसात्म्यञ्च धीरचित्तञ्च वामयेत् ।। ३ ।। विषदोषे स्तन्यरोगे मन्देऽग्नौ श्लीपदेऽर्बुदे । हृद्रोगे कुष्ठवीसर्पमेहाजीर्णभ्रमेषु च ।। ४ ।। विदारिकाऽपचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु । अपस्मारे ज्वरोन्मादे तथा रक्तातिसारिषु ।। ५ ।। नासाताल्वोष्ठपाकेषु कर्णस्रावेऽधिजिह्वके । गलशुण्ड्यामतीसारे पित्तश्लेष्मगदे तथा ।। मेदोगदेऽरुचौ चैव वमनं कारयेद्भिषक ।। ६ ।। वमन कर्म में प्रथम वमन के योग्य समय और रोगियों का निर्देश-चतुर वैद्य को चाहिये कि वह शरत् (क्वार, कार्तिक) ऋतु, वसन्त (चैत, वैशाख) ऋतु तथा वर्षा (सावन, भादो) ऋतु इन समयों में मनुष्यों को वमन करावे तथा रेचन (जुलाव) दे । जो मनुष्य बलवान हो या कफ से व्याप्त हो वा हल्लास (उबकाई) आदि रोग से पीड़ित हो तथा धीर चित्त बाला हो और जिसे वमन कराना प्रकृति के अनुकूल पड़ता हो उसे वमन करावे । विषदोष (विषसम्बन्धी दोष), स्तन्य रोग (दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग) तथा अग्नि मन्द होने पर एवं श्लीपद (फीलपाँव), अर्बुद, हृद्रोग, कुष्ठ, वीसर्प, मेदरोग, अजीर्ण, भ्रम, विदारिका, अपची, खाँसी, श्वास (दमा), पीनस, वृद्धि (अण्डकोश वृद्धि), मिर्गी, ज्वर, उन्माद, रक्तातिसार इन रोगों में नासिका (नाक) तालु तथा ओष्ठ के पकने पर, कर्णस्राव (कान बहना), अधिजिह्वक, गलशुण्डी, अतीसार, पित्त तथा कफ सम्बन्धी रोग, मेदरोग और अरुचि इन सब रोगों में रोगी को वमन करावे ।।२-६।। ❖ स्तन्यरोगे=दुष्टदुग्धजनिते बालस्य रोगे ।। २-६।। यहाँ 'स्तन्यरोग' पद का 'दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२-६।। अथ वमनानर्हजनानाह- न वामनीयस्तिमरी न गुल्मी नोदरी कृशः । नातिवृद्धो गर्भिणी च न स्थूलो न क्षतातुरः ।। मदात्त बालको रूक्षः क्षुधितश्च निरूहितः । उदावर्त्तूर्ध्वरक्ती च दुश्छर्द्यः केवलानिली ।। पाण्डुरोगी कृमिव्याप्तः पवनात्स्वरघातवान् ।। ९ ।। एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाग्या ये विषपीडिताः । कफव्याप्ताश्च ते वाभ्या मधुकक्वाथपानतः ।। वमन कराने के अयोग्य लोगों का निर्देश-जो लोग तिमिर, गुल्म तथा उदर रोग वाले हों या कृश (दुर्बल) शरीर तथा अत्यन्त वृद्ध हों एवं गर्भिणी स्त्री, स्थूल शरीर वाले, क्षत (घाव) से व्याकुल, मद से पीड़ित, बालक, रूक्ष शरीरवाले या भूखे हों और जिन्हें निरूहण बस्ति दी गई हो या जो उदावर्त्त रोग वाले हों या जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो या जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों अथवा जो केवल वातरोग से पीड़ित हों या पाण्डुरोगी हों वा जिनके उदर में क्रिमि पड़ गये हों तथा वायु से जिनका स्वरभङ्ग हो गया हो ऐसे लोगों को वमन कराना उचित नहीं है । किन्तु ऐसे लोग भी यदि अजीर्ण होने से या विष से पीड़ित हों अथवा कफ से व्याप्त हों अर्थात् कफ की अधिकता हो तो मुलेठी का क्वाथ पिलाने के द्वारा वमन कराने के योग्य होते हैं ।। ❖ ऊर्ध्वरक्ती=यस्य नासाक्षिकर्णारस्यमार्गै रक्तं प्रवर्त्तते सः । भक्त रूक्षकर्कशद्रव्यो-'दुश्छर्द्यः' । मधुकस्थाने मधूकेति द्वितीयः पाठः ।।७-१०।। यहाँ 'ऊर्ध्वरक्ती' पद का 'जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो' 'दुश्छर्द्यः' पद का 'जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों' यह अर्थ तथा 'मधुक' पद के स्थान में मधूक (महुआ) यह दूसरा पाठ है यह भी समझना चाहिये ।।७-१०।।

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १००९ अथ वमनविधिमाह- सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुञ्च वामयेत्। पाययित्वा यवागूं वा क्षीरतक्रदधीनि च ।।११।। असात्म्यैः श्लेष्मलैर्भोज्यैर्दोषानुत्क्लेश्य देहिनाम्। स्निग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक्प्रवर्त्तते ।।१२।। वमनेषु च सर्वेषु सैन्धवं मधु वा हितम्। बीभत्सं वमनं दद्याद्विपरीतं विरेचनम् ।।१३।। वमन कराने की विधि-जो लोग सुकुमार, कृश, बालक, वृद्ध या भीरु (वमन से डरने वाले) हों, उन्हें यवागू या दूध तक्र (छाछ) अथवा दही पिलाकर वमन कराना चाहिये। प्राणियों को यदि प्रथम असात्म्य (प्रकृति के अननुकूल) तथा कफकारक भोज्य पदार्थ खिलाने के द्वारा दोषों को बाहर निकालने के लिये उन्मुख करके स्नेहन करा चूकने पर वमन कराया जाय तो वमन अच्छी तरह से होता है, संपूर्ण वमन कराने वाली औषधियों में सेंधा नमक तथा मधु हितकर होता है। वमन कराने वाली जो ओषधियाँ दी जायँ वे अरुचिकर होनी चाहिये किन्तु विरेचन कराने वाली इसके विपरीत (रुचिकर) होनी चाहिये ।।११-१३।। ❖ बीभत्सम्=अरुच्यम् । विपरीतं=रुच्यम् ।।११-१३।। यहाँ 'बीभत्स' पद का 'अरुचिकर' । 'विपरीत' पद का 'रुचिकर' अर्थ समझना चाहिये ।।११-१३।। क्वाथद्रव्यस्य कुडवं श्रपयित्वा जलाढके। अर्द्धभागावशिष्टञ्च वमनेष्ववचारयेत् ।।१४।। क्वाथपाने नवप्रस्था ज्येष्ठा मात्रा प्रकीर्तिता। मध्यमा षण्मिता प्रोक्ता त्रिप्रस्था च कनीयसी ।।१५।। वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। अर्द्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनीषिणः ।।१६।। जिस वामक द्रव्य का काथ बनाना हो उसे १ कुडल (१६ भर) लेकर एक आढक (३ सेर ३ छ. १) भर) जल में क्वाथ बनाकर आधा (१ से ९ छ. ३) भर) शेष रह जाने पर वमन कराने के लिये देना चाहिये। वमन के लिये क्वाथ पिलाने में ९ प्रस्थ (२ सेर १४ छ. ४) भर) की मात्रा 'ज्येष्ठा' (बड़ी) कहलाती है। ६ प्रस्थ (१ सेर १५ छ. १) भर) की 'मध्यमा' (औसत) तथा ३ प्रस्थ (१५ छ. ३) भर) की 'कनिष्ठा' (छोटी) मात्रा कहलाती है और वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण (रक्त निकलवाने) में पण्डित लोग एक प्रस्थ को ६।। पलों के बराबर मानते हैं ।।१४-१६।। अर्द्धत्रयोदशपलं=सार्द्धषट्कम् ।।१४-१६।। यहाँ 'अर्द्धत्रयोदशपलम्' पदका ६।। साढ़े छ पल' अर्थ समझना चाहिये ।।१४-१६।। कल्कचूर्णावलेहानां त्रिपलं मात्रयोत्तमम्। मध्यमं द्विपलं विद्यात्कनीयस्तु पलं भवेत् ।।१७।। वमने चाष्टवेगाः स्युः पित्तान्ता उत्तममास्तु ते। षड् वेगा मध्यमा वेगाश्चत्वारस्त्वपरे मताः ।।१८।। कफं कटुकतीक्ष्णोष्णैः पित्तं स्वादुहिमैर्जयेत्। सुस्वादुलवणाम्लोष्णैः संसृष्टं वायुना कफम् ।।१९।। कृष्णां राठफल सिन्धुं कफे कोष्णजलैः पिबेत्। पटोलवासानिम्बांश्च पित्ते शीतजलैः पिबेत् ।।२०।। कल्क, चूर्ण तथा अवलेह की मात्रा तीन पल (१२) भर) की उत्तम, दो पल (८) भर) की मध्यम एवं एक पल (४) भर) की कनिष्ठ होती है। वमन में ८ वेग हो तथा अन्त में पित्त निकलने लगे तो उत्तम वमन का वेग, ६ वेग होने से मध्यम तथा ४ वेग होने से कनिष्ठ समझना चाहिये। वमन कराने वाले को कटु, तीक्ष्ण तथा उष्ण द्रव्यों से कफ का दोष शान्त करना चाहिये। स्वादिष्ट तथा शीतल द्रव्यों से पित्त का और अत्यन्त स्वादिष्ट, लवण तथा अम्लरसयुक्त उष्ण द्रव्यों द्वारा वायुयुक्त कफ का दोष दूर करना चाहिये। कफ में पीपल, मयनफल, सेंधा चूर्ण को कुछ गर्म जल के साथ और पित्त में परवल, अडूसा तथा नीम के चूर्ण को शीतल खल के साथ पीवे अर्थात् इनके द्वारा वमन करावे ।।१७-२०।। ❖ राठफलम्=मदनफलम् ।।१७-२०।। ६७ भांव.I

१०१० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'राठफल' पद का 'मयन फल' अर्थ समझना चाहिये ॥१७-२०॥ सश्लेष्मवातपीडायां सक्षीरं मदनं पिबेत् । अजीर्णे कोष्णपानीयं सिन्धुं पीत्वा वमेत्सुधीः ॥२१॥ कफयुक्त-वातसम्बन्धी पीड़ा में मयनफल के चूर्ण के साथ दूध पिलाकर तथा अजीर्ण होने पर किंचित् गर्म जल में सेंधा नमक छोड़कर उसे पिलाकर वमन करावे ॥२१॥ ❖ मदनं=मयनफलम् ॥२१॥ यहाँ 'मदन' पद का 'मैनफल' अर्थ समझना चाहिये ॥२१॥ वमनं पाययित्वा तु जानुमात्रासने स्थितम् । कण्ठमेरण्डनालेन स्पृशन्तं वामयेद्भिषक् ॥२२॥ प्रसेको हृद्ग्रहः कोठः कण्डूर्दुश्छर्दिते भवेत् । अतिवान्ते भवेत्तृष्णा हिक्कोद्गारो विसंज्ञिता ॥२३॥ जिह्वानिःसरणं चाक्ष्णोर्व्यावृत्तिर्हनुसंहतिः । रक्तच्छर्दिः ष्ठीवनञ्च कण्ठपीडा च जाय

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०११ व्यावृत्तेऽक्षिण घृताम्यक्तेपीडनञ्च शनैः शनैः । हनुमोक्षे स्मृतः स्वेदो नस्यञ्च श्लेष्मवातहृत् ।। २७ ।। रक्तपित्तविधानेन रक्तष्ठीवमुपाचरेत् । धात्रीरसाञ्जनोशीरलाजाचन्दनवारिभिः ।। २८ ।। मन्थं कृत्वा पाययेच्च सघृतं क्षौद्रशर्करम् । शाम्यन्त्यनेन तृष्णाऽऽढ्या रोगाश्छर्दिसमुद्भवाः ।। २९ ।। हृत्कण्ठशिरसां शुद्धिर्दीप्ताग्नित्वञ्च लाघवम् । कफपित्तविनाशश्च सम्यग्वान्तस्य लक्षणम् ।। ३० ।। ततोऽपराह्ने दीप्ताग्निं मुद्गषष्टिकशालिभिः । हृद्यैश्च जाङ्गलरसैः कृत्वा यूषञ्च भोजयेत् ।। ३१ ।। तन्द्रा निद्राऽऽस्यदौर्गन्ध्यं कण्डूश्च ग्रहणी विषम् । सुवान्तस्य न पीडायै भवन्त्येते कदाचन ।। ३२ ।। अजीर्णं शीतपानीयं व्यायामं मैथुनं तथा । स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।। ३३ ।। यदि आँख की पुतलियाँ ऊपर की ओर चढ़ गई हों तो आँखों में घी लगाकर धीरे-धीरे भीतर को दबाना चाहिये । यदि दोनों जबड़े एक में न मिलते हों अर्थात् मुख फैल गया हो तो स्वेदन कराना चाहिये तथा कफ और वातनाशक ओषधियों का नास देना चाहिये अर्थात् नाक में डालना चाहिये । यदि थूक के साथ रक्त दिखाई पड़ता हो तो रक्तपित्त वाले रोगी की जैसी चिकित्त्स्र की जाती है वैसी करनी चाहिये । आमला, रसवत, खस ओर धान का लावा इन सबों को सफेद चन्दन मिश्रित जल के साथ खूब मथ कर उस में घी, शक्कर तथा शहद डाल कर पिलाया जाय तो इससे अति वमन होने से उत्पन्न हुये पूर्वोक्त प्यास आदि रोग (उपद्रव) शान्त हो जाते हैं। उत्तम रीति से वमन होने पर—हृदय, गला तथा सिर की शुद्धि (हल्का तथा साफ होना), अग्नि का प्रदीप्त होना, शरीर हल्का मालूम पड़ना और कफ तथा पित्त का दोष नष्ट हो जाना ये जब लक्षण उत्पन्न होते हैं। उसके बाद (उत्तम रीति से वमन हो जाने के बाद) अपराह्न (२ बजे के बाद) में प्रदीप्त अग्नि वाले पुरुष को मूँग की दाल, साठी या अगहनी धान का चावल तथा हृदय के लिये हितकर (रुचकारी) जङ्गली जीवों का मांस का रस (सुरुवा) इन सबों का जूस बनाकर भोजन के लिये देना चाहिये । जिसे भलीभाँति वमन हुआ है उसके लिये तन्द्रा, मुख से दुर्गन्ध निकलना, खुजली, संग्रहणी और विष ये सब कभी पीड़ा देने वाले नहीं होते । बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वमन करने पर एक दिन तक अजीर्ण भोजन, शीतल जल, व्यायाम (कसरत आदि), मैथुन (स्त्रीसङ्ग) तेल की मालिश और क्रोध इन सबों को छोड़ दे ।।२७-३३।। इति वमनाधिकारः अथ विरेचनम् तत्रादौ विरेचनार्हसमयजनानाह- स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय दद्यात्सम्यग्विरेचनम् । अवान्तस्य त्वधःस्रस्तो ग्रहणीं छादयेत्कफः ।।३४।। मन्दाग्निं गौरवं कुर्याज्जनयेद्वा प्रवाहिकाम् । अथ वा पाचनैरामं बलासं परिपाचयेत् ।।३५।। ऋतौ वसन्ते शरदि देहशुद्धौ विरेचयेत् । अन्यदाऽऽत्ययिके कार्ये शोधनं शीलयेद् बुधः ।।३६।। विरेचन के योग्य समय तथा व्यक्ति का निर्देश—प्रथम मनुष्य को स्नेहपान तथा स्वेदन करा कर वमन करा चुकने पर उत्तम रीति से विरेचन दे क्योंकि बिना वमन कराये ही विरेचन देने पर उस मनुष्य का कफ नीचे खिसक कर ग्रहणी को ढक लेता है और उससे मन्दाग्नि तथा शरीर में गुरुता उत्पन्न हो जाती है अथवा प्रवाहिका रोग हो जाता है । यदि वमन न कराया हो तो प्रथम अपरिपक्व कफ का पाचन ओषधियों के द्वारा करावे । वसन्त तथा शरद् ऋतु में ही देहस्थित दोषों की शुद्धि के लिये विरेचन लेना उचित है । यदि प्राण सङ्कट में हो अर्थात् शोधन करना उस समय अत्यावश्यक हो तो बुद्धिमान मनुष्य वसन्तादि से अन्य ऋतुओं में भी विरेचनादि द्वारा देहशोधन कर ले ।।३४-३६।। ❖ आत्ययिके=प्राणसंकटे ।। ३४- ३६ ।। यहाँ 'आत्ययिके' पद का 'प्राण-सङ्कट में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४-३६।। पित्ते विरेचनं युञ्ज्यादामोद्भूते गदे तथा । उदरे च तथाऽऽध्माने कोष्ठशुद्धौ विशेषतः ।।३७।। दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । शोधनैः शोधिता ये तु न तेषां पुनरुद्भवः ।।३८।।

१०१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बालो वृद्धो भृशं स्निग्धः क्षतक्षीणे भयान्वितः। श्रान्तस्तृषाऽऽर्त्तः स्थूलश्च गर्भिणी च नवज्वरी ।।३९।। नवप्रसूता नारी च मन्दाग्निश्च मदात्ययी। शल्यार्दितश्च रूक्षश्च न विरेच्या विजानता ।।४०।। जीर्णज्वरी गरव्याप्तो वातरोगी भगन्दरी। अर्शः पाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः ।।४१।। योनिरोगप्रमेहार्त्ता गुल्मप्लीहव्रणार्दिताः। विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्ठसंयुताः ।।४२।। कर्णनासाशिरोवक्त्रगुदमेढ्रामयान्विताः। प्लीहशोथाक्षिरोगार्त्ताः कृभिक्षारानिलार्दिताः ।।४३।। शूलिनो मूत्राघातात्र्त्ता विरेकाहाँ नरा मताः ।।४४।। पित्त की अधिकता, आमसम्बन्धी रोग, उदररोग तथा आध्मान (अफारा) होने पर एवं विशेषतः कोष्ठ की शुद्धि के लिये विरेचन अवश्य लेना चाहिये। केवल लङ्घन तथा पाचनद्वारा ही शान्त किये गये वातादि दोष सम्भव है कि किसी समय पुनः कुपित हो जायें, किन्तु जो शोधन (विरेचनादि) द्वारा किये गये हैं उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् पुनः वे प्रकुपित नहीं होते हैं। बालक, वृद्ध, स्नेहपानद्वारा अत्यन्त स्निग्ध हुये, क्षत (घाव) से क्षीण, भय से युक्त, परिश्रम करने से थके हुये, प्यास से दुःखी, स्थूल शरीर वाले, गर्भिणी स्त्री, नवीन ज्वर वाले रोगी, तत्काल प्रसव जिसे हुआ हो ऐसी स्त्री, मन्दाग्निवाले, मदात्यय रोग युक्त, शल्य (बाण आदि) लगने से पीड़ित तथा रूक्ष शरीर वाले जो हों उन्हें बुद्धिमान वैद्य कभी विरेचन न देवे। पुराने ज्वर वाले, विष से व्याप्त शरीर वाले, वातरोगी, भगन्दर, अर्श, पाण्डु, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), हृद्रोग तथा अरुचि से पीड़ित, योनिसम्बन्धी रोग से पीड़ित स्त्री, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा तथा व्रण से पीड़ित, विद्रधि, वमन, विस्फोट, हैजा तथा कुष्ठ से युक्त, कान, नाक, सिर, मुख, गुदा तथा शिश्न (मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी रोग वाले, प्लीहाजन्य शोथ तथा नेत्रसम्बन्धी रोग से युक्त, कृमि, क्षार तथा वायु से पीड़ित, शूल रोग वाले तथा मूत्राघात से दुःखी जो हों वें विरेचन देने के योग्य माने गये हैं ।।३७-४४।। अथ मृदुमध्यमक्रूरकोष्ठँस्तद्योग्यमात्राद्रव्यादीनि चाह- बहुपित्तो मृदुः कोष्ठो बहुश्लेष्मा च मध्यमः। बहुवातः क्रूरकोष्ठो दुर्विरेच्यः स कथ्यते ।।४५।। मृद्वी मात्रा मृदौ कोष्ठे मध्यकोष्ठे च मध्यमा। क्रूरे तीक्ष्णा मता द्रव्यैर्मृदुमध्यमतीक्ष्णकैः ।।४६।। मृदुर्द्राक्षापयश्चञ्चुतैलैरिप विरिच्यते। मध्यमस्त्रिवृतातिक्राराजवृक्षैर्विंरिच्यते। क्रूरः स्नुक्पयसा हेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः ।।४७।। मृदु, मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ वाले मनुष्यों तथा उनके योग्य मात्रा एवं द्रव्यों का वर्णन-अधिक पित्त वालों का कोष्ठ मृदु, अधिक कफ वालों का मध्यम तथा अधिक वात वालों का क्रूर होता है और इनका विरेचन बड़ी कठिनता से होता है। अतएव यह दुर्विरेच्य कहलाते हैं। मृदु कोष्ठ होने पर रोगी के लिये विरेचन द्रव्यों की मात्रा मृदु, मध्यम कोष्ठ होने पर मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ होने पर तीक्ष्ण मात्रा देनी उचित है। मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले रोगियों को क्रम से मृदु, मध्यम तथा तीक्ष्ण वीर्य वाले द्रव्यों से विरेचन कराना उचित है। मृदु कोष्ठ वालों को दाख, दूध तथा एरण्ड के तेल के द्वारा, मध्यम कोष्ठ वालों को निशोथ, कुटकी तथा धनबहेरा (अमलतास) के द्वारा और क्रूर कोष्ठ वालों को थूहर का दूध, चोक तथा बड़ी दन्ती के फल (जमालगोटा) के द्वारा विरेचन कराना उचित होता है ।।४५-४७।। ❖ चञ्चुतैलम्=एरण्डतैलम् । राजवृक्षः=धनबहेरा । हेमक्षीरी(चोक) । दन्तीफलं=बृहद्दन्तीफलम्, जयपालेति प्रसिद्धम् ।।४५-४७।। यहाँ 'चञ्चुतैल' से 'एरण्ड का तैल', 'राजवृक्ष' से 'धनबहेरा' (अमलतास), 'हेमक्षीरी' से 'चोक' तथा 'दन्तीफल' से 'बड़ी दन्ती का फल लोकप्रसिद्ध जमालगोटा' का बोध करना चाहिये ।।४५-४७।। मात्रोत्तमा विरेकस्य त्रिंशद्वेगैः कफान्तिका। वेगैर्विंशतिभिर्मध्या हीनोक्ता दशवेगिका ।।४८।। द्विपलं श्रेष्ठमाख्यातं मध्यमं च पलं भवेत्। पलार्द्धं च कषायाणां कनीयस्तु विरेचनम् ।।४९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१३ कल्कमोदकचूर्णानां कर्षो मध्वाज्यलेहतः । कर्षद्वयं पलं वाऽपि वयोरोगाद्यपेक्षया ॥५०॥ पित्तोत्तरे त्रिवृच्चूर्णं द्राक्षाक्वाथादिभिः पिबेत् । त्रिफलाक्वाथगोमूत्रैः पिबेद् व्योषं कफार्दितः ॥५१॥ त्रिवृत्सैन्धवशुण्ठीनां चूर्णमम्लैः पिबेन्नरः । वातार्दितो विरेकाय जाङ्गलानां रसेन वा ॥५२॥ विरेचन की जब उत्तम मात्रा होती है तब विरेचन का वेग ३० बार होता है तथा अन्त में कफ निकलने लगता है। मध्यम मात्रा में विरेचन का वेग २० बार और हीन मात्रा में विरेचन का वेग १० बार होता है। जब क्वाथ द्वारा विरेचन कराया जाता है तब उसकी २ पल (८ भर) की मात्रा श्रेष्ठ, १ पल (४ भर) की मात्रा मध्यम तथा आधे पल (२ भर) की मात्रा कनिष्ठ कहलाती है। रोगी की अवस्था तथा रोग के अनुसार विचार कर मधु तथा गौ के घी के साथ मिला कर कल्क, मोदक या चूर्ण के द्वारा विरेचन कराने में इनकी मात्रा १ कर्ष (१ भर), २ कर्ष (२ भर) या १ पल (४ भर) की देनी चाहिये। जब पित्त की अधिकता हो तब दाख के क्वाथ आदि के साथ निसोध का चूर्ण विरेचन के लिये खिलाना चाहिये। जब कफ की अधिकता हो तब विरेचन के लिये रोगी को त्रिफला का क्वाथ तथा गोमूत्र के साथ त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च) का चूर्ण खिलाना चाहिये। वात से पीड़ित रोगी को अम्ल पदार्थों के रस के साथ अथवा जांगल जीवों के मांसरस के साथ निसोध, सेंधा नमक तथा सोंठ का चूर्ण खिला कर विरेचन कराना चाहिये ॥४८-५२॥ एरण्डतैलं त्रिफलाक्वाथेन द्विगुणेन वा । युक्तं पीतं पयोभिर्वा न चिरेण विरिच्यते ॥५३॥ यदि एरण्ड का तेल दुगुने त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेरा) के क्वाथ के साथ अथवा दूध के साथ मिला कर पिलाया जाय तो विरेचन देर में नहीं होता है ॥५३॥ ❖ शीघ्रमेव विरिच्यत इत्यर्थः ॥५३॥ यहाँ 'विरेचन देर में नहीं होता' इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'शीघ्र ही विरेचन होता है' ॥५३॥ अथर्तुभेदेन विरेकद्रव्यभेदानाह- त्रिवृता कौटजं बीजं पिप्पली विश्वभेषजम् । समृद्वीकारसं क्षौद्रं वर्षाकाले विरेचनम् ॥५४॥ त्रिवृद्दुरालभामुस्तशर्करोदीच्यचन्दनम् । द्राक्षाऽम्बुना सयष्ट्याह्वं शीतलक्ष्णं घनात्यये ॥५५॥ ऋतु भेद से विरेचन द्रव्यों में भेद-वर्षाऋतु में दाख का रस तथा शहद के साथ निसोध, इन्द्रजौ, पीपर तथा सोंठ का चूर्ण खिला कर विरेचन कराना चाहिये। शरद् ऋतु में दाख के क्वाथ को शीतल करके उसके साथ निसोध, धमासा, नागरमोथा, साफ शक्कर, सुगन्धवाला तथा मुलेठी का चूर्ण खिला कर विरोचन कराना चाहिये ॥५४-५५॥ ❖ उदीच्यं=वाला । घनात्यये=शरदि ॥५४-५५॥ यहाँ 'उदीच्यम्' पद का 'सुगन्धवाला' तथा 'घनात्यये' पद का 'शरद् ऋतु में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥५४- ५५॥ त्रिवृता चित्रकं पाठामजाजीं सरलं वचाम् । हेमक्षीरीं हेमन्ते तु चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत् ॥५६॥ पिप्पलीं नागरं सिन्धुं श्यामां त्रिवृतया सह । लिह्यात्क्षौद्रेण शिशिरे वसन्ते च विरेचनम् ।। त्रिवृता शर्करा तुल्या ग्रीष्मकाले विरेचनम् ॥५८।। हेमन्त ऋतु में गर्म जल के साथ निसोध, चीता, पाढ़, जीरा, धूप, बालवच तथा चोक का चूर्ण खिला कर, शिशिर तथा वसन्त ऋतु में शहद के साथ पीपर, सोंठ, सेंधानमक, सारिवा और निसोध का चूर्ण चटा कर और ग्रीष्म ऋतु में केवल निसोध के चूर्ण में सम भाग साफ शक्कर खिलाकर विरेचन कराना चाहिये ॥५६-५८॥ ❖ श्यामा (सारिवा) ॥५६-५८॥ यहाँ 'श्यामा' पद का 'सारिवा' अर्थ समझना चाहिये ॥५६-५८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाभयादिमोदकः- अभया मरिचं शुण्ठीविडङ्गामलकानि च। पिप्पलो पिप्पलीमूलं त्वक्पत्रं मुस्तमेव च ।।५९।। एतानि समभागानि दन्ती तु त्रिगुणा भवेत्। त्रिवृताऽष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ।।६०।। मधुना मोदकान्कृत्वा कर्षमात्रान्प्रमागतः। एकैकं भक्षयेत् प्रातः शीतञ्चानु पिबेज्जलम् ।।६१।। तावद्विरिच्यते जन्तुर्यावदुष्णं न सेवते। पानाहार विहारेषु भवेन्नियन्त्रणः सदा ।।६२।। विषमज्वरमन्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामिकुष्ठगुल्मार्शोगलगण्डोदरभ्रमान् ।।६३।। विदाहप्लीहमेहांश्च यक्ष्माणं नयनामयान्। वातरोगांस्तथाऽऽध्मानं मूत्रकृच्छादि चाश्मरीम् ।।६४।। पृष्ठपार्श्वोरुजघनजङ्घोदररुजं जयेत्। स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।।६५।। सततं शीलनादेव पलितानि प्रणाशयेत्। अभयामोदका होते रसायनवराः स्मृताः ।।६६।। अभयादिमोदक-बड़ी हर्रें, मरिच, सोंठ, वायविडङ्ग, आमला, पीपर, पिपरामूल, तज, तेजपात और नागरमोथा इन सबों का चूर्ण सम भाग एकत्र कर उसमें ३ गुना दन्ती के जड़ का चूर्ण, ८ गुना निसोध का चूर्ण और ६ गुना साफ शक्कर मिला कर शहद के साथ १ कर्ष (१ भर) के बराबर-बराबर लड्डू बनाकर रख ले, उसमें से एक-एक लड्डू प्रतिदिन प्रातः काल खाकर ऊपर से शीतल जल पी ले, इससे तब तक विरेचन होता रहेगा जब तक गर्म जल का गर्म अन्न न खावे। इसके सेवन करने के समय सदा खाने, पीने तथा चलने-फिरने आदि में किसी तरह का नियम नहीं करना पड़ता है। सेवन करने से यह निष्मज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डु, कास, भगन्दर, बवासीर, कुष्ठ, गुल्म, गलगण्ड, उदररोग, भ्रमरोग, विदाह, प्लीहा, मेह्रोग, यक्ष्मा, नेत्र तथा वातसम्बन्धी रोग, अफरा, मूत्रकृच्छादि मूत्रसम्बन्धी रोग, पथरी एवं पीठ, पंसुली, ऊरु, जङ्घा तथा उदर की पीड़ा को दूर करता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वह जिस दिन इसका सेवन करे उस दिन तेल की मालिश और क्रोध करना छोड़ दे। इसका निरन्तर सेवन करने से पलित (अकाल में वाल पक जाना) रोग नष्ट हो जाता है। अतएव यह अभयामोदक रसायनों में उत्तम रसायन माना गया है ।।५९-६६।। अथ विरेकोत्तरकर्माणयाह- पीत्वा विरेचनं शीतजलैः संसिच्य चक्षुषी। सुगन्धि किञ्चिदाघ्राय ताम्बूलं शीलयेद् बुधः ।।६७।। निर्वातस्थो न वेगांश्च धारयेन्न शयीत च। शीताम्बु न स्पृशेत्क्वापि कोष्र्णानीरं पिबेन्मुहुः ।।६८।। बलासौषधपित्तानि वायुर्वान्ते यथा व्रजेत्। रेकात्तथा मलं पित्तं भेषजञ्च कफो व्रजेत् ।।६९।। विरेचन लेने के बाद कर्त्तव्य कर्म-विरेचन ओषधि पीने के बाद दोनों आँखों में शीतल जल का छींटा देकर और कोई सुगन्धित पदार्थ इत्र आदि थोड़ा सूंघ कर पान खाना चाहिये और वायुरहित स्थान में बैठना चाहिये। शौच का वेग रोकना, सोना तथा शीतल जल का स्पर्श कभी भी नहीं करना चाहिये बल्कि किञ्चित् गर्म जल बारम्बार पीना चाहिये। वमन करने पर जिस तरह से कफ, औषध, पित्त तथा वायु मुख की राह से निकलता है, उसी तरह से विरेचन ❖ लेने पर गुदा की राह से मल, पित्त, औषध तथा कफ निकलता है ।।६७-६९।। अथ दुर्वरिक्तातिविरिक्तयोर्लक्षणानि भेषजं चाह- दुर्वरिक्तस्य नाभेस्तु स्तबन्द्यता कुक्षिशूलरुक्। पुरीषवातसङ्गश्च कण्डूमण्डलगौरवम् ।।७०।। विदाहोऽरुचिराध्मानं भ्रमश्छर्दिश्च जायते। तं पुनः पाचनैः स्नेहैः पक्त्वा स्निग्धं तु रेचयेत् ।। तेनास्योपद्रवा यान्ति दीप्ताग्निर्लघुता भवेत् ।।७१।। विरेकस्यातियोगेन मूर्च्छा भ्रंशो गुदस्य च। शूलं कफात्तियोगः स्यान्मांसाधावनसन्निभम् ।।७२।। मेदोनिभं जलाभासं रक्तञ्चापि विरिच्यते। तस्य शीताम्बुभिः सिक्त्वा शरीरं तण्डुलाम्बुधि ।।७३।। मधुमिश्रैस्तथा शीतैः कारयेद्वमनं मृदु। सहकारत्वचः कल्को दध्ना सौवीरकेण वा ।।७४।। पिष्ट्वा नाभिप्रलेपेन हन्त्यतीसारमुल्वणम्। सौवीरं तु यवैरामैः पक्वौर्वा निस्तुषीकृतैः ।।७५।।

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१५ जिसे भलीभाँति विरेचन नहीं हुआ या अधिक विरेचन हुआ है उसके क्रम से लक्षण तथा औषध— जिसे भली- भाँति विरेचन नहीं हुआ है उसकी नाभि का स्तब्ध होना, कोख में शूल तथा पीड़ा होना, मल तथा अधोवायु का रुक जाना, देह में खुजली होना तथा चकत्ते पड़ जाना, गुरुता (शरीर भारी मालूम पड़ना), दाह, अरुचि, अफारा, भ्रम तथा वमन का होना ये सब लक्षण होते हैं। उपचार—ऐसे लक्षण वाले को पाचन ओषधि द्वारा प्रथम आम का पाचन करके पश्चात् स्नेहपान द्वारा स्निग्ध करके पुनः विरेचन औषध देकर रेचन करावे, ऐसा करने से पूर्वोक्त सब उपद्रव शान्त हो जाते हैं एवं अग्नि प्रदीप्त होती है तथा शरीर में लघुता उत्पन्न होती है। जिसे आवश्यकता से अधिक विरेचन हुआ है उसके मूर्च्छा, गुदभ्रंश (काँच का निकल आना), शूल, कफ का अधिक निकलना और मांस के धोवन के समान या भेद के समान अथवा जल के समान गुदा से रक्त का निकलना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। उपचार—उक्त लक्षणयुक्त मनुष्य को उस समय उसके शरीर को शीतल जल से सींचकर शीतल चावल के धोवन में शहद मिलाकर पिलाने के द्वारा मृदु (थोड़ा) वमन करावे और आम के पेड़ की छाल को दही अथवा सौवीर के साथ चटनी के समान पीस कर नाभि पर लेप करावे, इससे उग्र अतीसार भी नष्ट हो जाता है और कच्चे तथा पक्के भूसी रहित जौ के द्वारा सौवीर बनता है ॥७०-७५॥ ❖ सौवीरं=सन्धानवम् ।।७०-७५।। यहाँ 'सौवीर बनता है' इसका अर्थ 'सन्धान करने से सौवीर बनता है' यह समझना चाहिये ॥७०-७५॥ अजाक्षीरं रसञ्चापि वैष्किरं हारिणं तथा। शालिभिः षष्टिकैस्तुल्यैर्मसूरैर्वापि भोजयेत् ।।७६।। शालि (जड़हन) या साठी धान के चावल के साथ उसके बराबर बकरी का दूध, विष्किर पक्षियों के या हरिण के मांस का रस अथवा मसूर के जूस के साथ भोजन के लिये देना चाहिये ॥७६॥ ❖ वर्त्तकालावविकिरकपिञ्जलकतित्तिराः । चकोरक्रकराद्याश्च विष्किराः समुदाहृताः । कपिञ्जल इति ख्यातो लोके कपिशतित्तिरः ।। क्रकरः 'कराट' इति लोके । हरिणस्ताम्रवर्णः स्याद् मृगः ।।७६।। यहाँ 'विष्किर पक्षियों' से बटेर, लवा, तीतर, कपिञ्जले, (कबरा-काला मिश्रित पीले वर्ण का) तीतर, चकोर, क्रकर (लोकप्रसिद्ध कराट) इन सबों का बोध करना चाहिये और 'हरिण' से 'तामे के समान वर्ण वाले मृग' को समझना चाहिये ॥७६॥ शीतैः संग्राहिभिर्द्रव्यैः कुर्यात्संग्रहणं भिषक् । लाघवे मनसस्तुष्टावनुलोमं गतेऽनिले ।।७७।। सुविरिक्तं नरं ज्ञात्वा पाचनं पाययेन्निशि । इन्द्रियाणां बलं बुद्धेः प्रसादो वह्निदीप्तता ।।७८।। धातुस्थैर्यं वयःस्थैर्यं भवेद्वेचनसेवनात् । प्रवातसेवां शीताम्बुस्नेहाभ्यङ्गमजीर्णताम् ।।७९।। व्यायामं मैथुनञ्चैव न सेवेत विरेचितः । शालिषष्टिकमुद्गाद्यैर्युवागू भोजयेत्कृताम् ।।८०।। वैद्य को चाहिये कि वह अधिक दस्त आने पर रोकने वाली शीतल ओषधियों से दस्त बन्द करे और जब रोगी के शरीर में लघुता मालूम पड़ने लगे तथा मन में प्रसन्नता एवं वायु का अनुलोमन अर्थात् अधोवायु यथावत् रीति से होने लगे तब उसका विरेचन बहुत अच्छी रीति से हुआ है यह समझ कर उसे रात्रि में पाचन ओषधि देवे। उचित विरेचन लेने से मनुष्य की इन्द्रियों में बल आता है, बुद्धि स्वच्छ होती है, अग्नि प्रदीप्त होती है, धातुओं की तथा आयु की स्थिरता है। विरेचन लेने वाला मनुष्य—अधिक वायु में रहना, शीतल जल, तेल की मालिश, अजीर्ण पैदा करने वाला भोजन, व्यायाम (कसरत आदि), मैथुन (स्त्री-सहवास) नकरे न करे और शालि (जड़हन) या साठी धान का चावल, मूँग आदि की दाल से बनाई गई युवागु का सेवन करे ॥७७-८०॥

१०१६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जाङ्गलविष्किराणां वा रसैः शाल्योदनं हितम् ।।८१।। अथवा जंघालसंज्ञक जीवों का तथा विष्किरसंज्ञक पक्षियों के मांलरस (सुरुवा) के साथ शालि (जड़हन) धान का चावल खाय क्योंकि यह हितकारी होता है ।।८१।। ❖ हरिणैणकुरङ्गैर्वावातायुमृगमात्रकाः। राजीवः पृषतश्चैव जाङ्गालाः शरभादयः ।।८१।। यहाँ ‘जङ्गाल’ पद से ‘हरिण, काला हरिण, कुरङ्ग हरिण, रोज हरिण, वातायु, राजीव तथा चित्तल हरिण आदि मृग जाति के जीव मात्र तथा शरभ आदि पशुओं’ का बोध करना चाहिये ॥ इति विरेकाधिकारः । अथानुवासनम् । तत्रादावनुवासननिरूहयोर्भेदमाह- वस्तिर्द्विधाऽनुवासाख्यो निरूहश्च ततः परम्। यः स्नेहो दीयते स स्यादनुवासननामकः ।। कषायक्षीरतैलैर्यो निरूहः स निगद्यते । बस्तिभिर्दीयते यस्मात्तस्माद्वस्तिरिति स्मृतः ।।८३।। अनुवासन तथा निरूह के भेद-बस्ति दो प्रकार की होती है (१) अनुवासन और (२) निरूह । अनुवासन- जहां केवल स्नेह पदार्थ की बस्ति दी जाती है उसे ‘अनुवासन’ कहते हैं। निरूह-जहाँ क्वाथ, दूध तथा तेल मिलाकर बस्ति दी जाती है उसे ‘निरूह’ कहते हैं । अनुवासन तथा निरूह में तैलादि का प्रयोग ‘बस्ति’ के द्वारा किया जाता है अतएव ये दोनों बस्ति कहलाते हैं ।।८२-८३।। ❖ वस्तिभिः=मृगादीनां मूत्राशयैः ।।८२-८३।। यहाँ ‘वस्ति’ पद से ‘मृग आदि के मूत्राशय’ का बोध करना चाहिये, क्योंकि-मूत्राशय का नामान्तर ‘वस्ति’ है ।।८२-८३।। अथ स्नेहवस्तिविधिमाह- तत्रानुवासनाख्यो हि वस्तिर्यः सोऽत्र कथ्यते । अनुवासनभेदश्च मात्रावस्तिरुदीरितः ।।८४।। पलद्वयं तस्य मात्रा तस्मादर्द्धाऽपि वा भवेत् । अनुवास्यस्तु रूक्षः स्यात्तीक्ष्णाग्निः केवलानिलो ।।८५।। नानुवास्यस्तु कुष्ठी स्यान्मेही स्थूलस्तथोदरी । नास्थाप्यानानुवास्याश्च जीर्णोन्मादतृडर्दिताः ।। शोथमूर्च्छाऽरुचिभयश्वासकासक्षयातुराः ।।८६।। स्नेहबस्ति (अनुवासन) की विधि-ऊपर कही हुई बत्तियों में जो अनुवासन नामक बस्ति है उसी के विषय में कहते हैं । अनुवासन बस्ति का ही भेद ‘मात्राबस्ति’ है। मात्राबस्ति में स्नेह की मात्रा दो पल (८ तोले) या इसकी आधी एक पल (४ तोले) की होती है। जो मनुष्य रूक्ष शरीर वाला तथा तीक्ष्ण अग्नि वाला हो एवं केवल वातरोगी हो वह अनुवासनबस्ति देने योग्य होता है । जो कुष्ठ तथा मेह्रोग से पीड़ित हो या स्थूल शरीर वाला अथवा उदर रोग से युक्त हो वह अनुवासन बस्ति के योग्य नहीं होता । जो जीर्ण शरीर वाला तथा उन्माद, तृषा, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, भय, श्वास (दमा) या क्षय रोग से पीड़ित हों वे निरूहबस्ति तथा अनुवासन बस्ति दोनों ही के योग्य नहीं होते हैं ।।८४-८६।। नेत्रं कार्यं सुवर्णादिधातुभिर्वृक्षवेणुभिः । नलैर्दन्तैर्विषाणाग्रैर्मणिभिर्वा विधीयते ।।८७।। बस्ति देने की नली-सोने आदि धातुओं की या वृक्ष, बाँस, नरसल, हाथी आदि जीवों का दाँत, सींग का अग्रभाग तथा मणि इन सबों में से किसी एक की बना लेनी चाहिये ।।८७।। ❖ नेत्रं=नाडी । तथा चोक्तं विश्वप्रकाशे- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१७ ‘नेत्रं मन्थगुणे वस्त्र तरुमूले विलोचने । नेत्रबन्धे च नाड्याञ्च नेत्रो नेतरि भेद्यवद्’ इति ।।८७।। यहाँ ‘नेत्र’ पद का ‘नाड़ी अर्थात् नली’ यह अर्थ समझना चाहिये । क्योंकि ‘विश्वप्रकाश कोश’ में यह कहा हुआ है कि—नेत्र शब्द दूध या दही मथने की मथानी की डोरी, वस्त्र, वृक्ष का मूल भाग, आँख, नेत्र का बन्ध तथा नाड़ी (नल) इन अर्थों में नपुंसकलिंगी होता है । तथा नेता (ले जाने वाला) इस अर्थ में विशेष्य पद के अनुसार तीनों लिङ्ग में होता है ।।८७।। एकवर्षात्तु षड्वर्षाद्यावन्मानं षडङ्गुलम् । ततो द्वादशकं यावन्मानं स्यादष्टसम्मितम् ।।८८।। ततः परं द्वादशभिरङ्गुलैर्नेत्रदीर्घता । मुद्गच्छिद्रं कलायाभं छिद्रं कोलास्थिसन्निभम् ।।८९।। यथा संख्यं भवेन्नेत्रं श्लक्ष्णं गोपुच्छसन्निभम् । गोपुच्छसन्निभं मूले स्थूलं तस्मात् क्रमात् कृशम् ।।९०।। एक वर्ष से लेकर ६ वर्ष तक के बालक को यदि बस्ति देनी हो तो बस्ति की लम्बाई ६ अङ्गुल की होनी चाहिये । ६ वर्ष से लेकर १२ वर्ष तक के लिये ८ अंगुल तथा १२ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले मनुष्य के लिये १२ अंगुल की होनी चाहिये । पूर्वोक्त ६-८-१२ अंगुल की लम्बी तीनों नलियों का छिद्र क्रम से मूँग, मटर तथा बेर की गुठली जाने लायक होना चाहिये । और वे नलियाँ चिकनी तथा गो के छ की समान मूल भाग में अपेक्षाकृत मोटी हुई उत्तरोत्तर क्रम से पतली होनी चाहिये ।।८८-९०।। मुद्गच्छिद्रादिप्रमाणं नेत्रं क्रमेण षड्वर्षाय द्वादशवर्षाय तदूर्ध्ववर्षाय ज्ञेयम् ।।८८-९०।। यहाँ ‘मूँग आदि के जाने लायक जो नलियों के छिद्र का तीन प्रकार का प्रमाण कहा गया है उसे क्रम से ६ वर्ष तथा १२ वर्ष तक एवं उससे ऊपर की अवस्था वालों के लिये समझना चाहिये । अर्थात् ६ वर्ष तक वालों के लिये जो नली हो उसका छिद्र मूँग जाने लायक हो, १२ वर्ष तक वालों के लिये मटर जाने लायक और उससे ऊपर वालों के लिये बेर की गुठली जाने लायक नली का छिद्र हो’ यह समझना चाहिये ।।८८-९०।। आतुराङ्गुष्ठमानेन मूले स्थूलं निधीयते । कनिष्ठिकापरीणाहमग्रे च गुटिकामुखम् ।।९१।। तन्मूले कर्णिके द्वे च कार्ये भागाञ्चतुर्थकात् ।।९२।। योजयेत्तत्र वस्तिञ्च वन्धद्वयविधानतः । मृगाजशूकरगवां महिषस्यापि वा भवेत् ।।९३।। जिसे बस्ति देना हो उस रोगी के अंगूठे की मोटाई बराबर बस्ति की नली के मूल भाग की मुटाई होनी चाहिये और मूल भाग से ऊपर की ओर की मुटाई रोगी के कनिष्ठिका अङ्गुली के बराबर होनी चाहिये तथा वस्तिमुख पर गोली की भाँति गोल आकार बना होना चाहिये । बस्ति की नली के ऊपर की ओर तीन हिस्सा छोड़कर बाकी नीचे चौथे भाग रूप मूल में दो कर्णिका बनानी चाहिये । उसके बाद उन्हीं दोनों कर्णिकाओं में बस्ति (मूत्राशय की कोथली) के दोनों सिराओं को दोहरा गाँठ लगा कर मजबूती से बाँध दे । बस्ति मृग, बकरा, शूअर वा बैल की होनी चाहिये ।।९१-९३।। ❖ परीणाहोऽत्र स्थौल्यम् ।। यहाँ ‘परीणाह’ पद का ‘मुटाई’ अर्थ समझना चाहिये । ❖ कर्णिका=गवादिकर्णवत् । यहाँ ‘कर्णिका बनानी चाहिये’ इसका गाय आदि के कान के समान कर्णिका बनानी चाहिये—यह अर्थ समझना चाहिये । ❖ बस्तिरिति शेषः ।।९१-९३।। यहाँ ‘वस्ति’ पद मूलमें न होने से उसका योग्यतावश ‘ऊपर से अध्याहार किया गया है’ । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०१८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूत्रकोषस्य बस्तिस्तु तदलाभे तु चर्मणः । कषायरक्तः स मृदुर्बस्तिः स्निग्धो दृढो हितः ॥९४॥ व्रणवस्तेस्तु नेत्रं स्याच्छ्लक्ष्णमष्टाङ्गुलोन्मितम् । मुद्गच्छिद्रं गृध्रपक्षनलिकापरिणाहि च ॥९५॥ शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः । कुरुते परिवृद्धिश्च बस्तिः सम्यगुपासितः ॥९६॥ दिवा शीते वसन्ते च स्नेहबस्तिः प्रदीयते । ग्रीष्मवर्षाशरत्काले रात्रौ स्यादनुवासनम् ॥९७॥ बस्ति उक्त जीवों के मूत्राशय की होनी चाहिये यदि मूत्राशय की न हो तो चमड़े की बना लेनी चाहिये । बस्ति कषाय (कसैले) रङ्ग से रङ्गी हुई, कोमल, चिक्कन तथा दृढ़ हो तो हितकर होती है । व्रण (घाव) में यदि बस्ति देनी हो तो उसकी नली चिकनी, आठ अङ्गुल लम्बी, मूँग जाने लायक छिद्रवाली तथा गिद्ध के पंख की नली के समान होनी चाहिये । यदि बस्ति भलीभाँति दी जाय तो उससे शरीर, वर्ण (शरीर का रङ्ग) बल, आरोग्य तथा आयु की वृद्धि होती है । शीत तथा वसन्त ऋतु में दिन के समय स्नेह की बस्ति उत्तम होती है । ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद् ऋतु में रात्रि के समय बस्ति देनी चाहिए ॥९४-९७॥ न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् । मदंमूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः ॥९८॥ रोगी को अतिस्निग्ध (अत्यन्त स्नेहयुक्त) पदार्थ भोजन कराकर अनुवासन (स्नेह-बस्ति) नहीं देना चाहिये । क्योंकि भोजन तथा बस्ति दोनों ही में स्नेह का प्रयोग करने से रोगी को मद तथा मूर्च्छा उत्पन्न होती है ॥९८॥ ❖ द्विधा=भोजने बस्तौ च ॥९८॥ यहाँ 'द्विधा' पद का 'भोजन तथा बस्ति दोनों ही में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९८॥ रूक्षभुक्तवतोऽत्यन्तं बलं वर्णञ्च हापयेत् । युक्तस्नेहमतो जन्तुं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥९९॥ अत्यन्त रूखा अन्न जिसने भोजन किया है उसे यदि बस्ति दी जाय तो उससे भी बल तथा वर्ण की हानि होती है । अतः रोगी को यथोचित स्नेह (घी) युक्त भोज्य पदार्थ भोजन कराकर अनुवासन (स्नेहबस्ति) देना चाहिये ॥९९॥ ❖ युक्तस्नेहं=यथोचितस्नेहं भोज्यं भोजयित्वेत्यर्थः ॥९९॥ यहाँ 'युक्तस्नेह' पद का 'यथोचित स्नेह (घी) युक्त भोज्य पदार्थ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९९॥ हीनमात्रावुभौबस्ती नातिकार्यकरौ स्मृतौ । अतिमात्रौ तथाऽऽनाहक्लमातीसारकारकौ ॥१००॥ अनुवासन तथा निरूह नामक ये दोनों बस्ति यदि हीन मात्रा में दी जायँ तो वे अत्यन्त उपकारक नहीं होती हैं और यदि अधिक मात्रा में दी जायँ तो अफारा, क्लान्ति तथा अतीसार उत्पन्न करने वाली होती हैं ॥१००॥ ❖ उभौ बस्ती=अनुवासननिरूहाख्यौ ॥१००॥ यहाँ 'उभौ बस्ती' का 'अनुवासन तथा निरूह नामक ये दोनों बस्ति' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ उत्तमा स्यात्पलैः षड्भिर्मध्यमा स्यात्पलैस्त्रिभिः । पलाध्यर्द्धेन हीना स्यादुक्ता मात्राऽनुवासने ।। शताह्वासैन्धवाभ्याञ्च देयं स्नेहे च चूर्णकम् । भुक्तान्नायानुवात्याय बस्तिर्देयोऽनुवासनः ॥१०३॥ (स्नेहबस्ति) देने में ६ पल (२४ तो.) की मात्रा उत्तम, ३ पल (१२ तो.) की मध्यम और १॥ पल (६ तो.) की मात्रा हीन कही हुई है । बस्ति देने के लिये जो स्नेह हो उसमें सौंफ तथा सेन्धा नमक का चूर्ण डालना चाहिये और उस (चूर्ण) की मात्रा ६ माशे की उत्तम, ४ माशे की मध्यम तथा २ माशे को हीन समझी जाती है । जिसे अनुवासन (स्नेहबस्ति) देना हो उसे विरेचन लिये हुये जब सात रात्रि व्यतीत हो जाय तथा जब उसे बल आ जाय तब भोजन कराने के बाद अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥१०१-१०३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०९९ तथाऽनुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुस्वेदितं शनैः । भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचङ्क्रमणं ततः । उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं योजयेत्स्नेहबस्तिना ।।१०४।। अनुवासन बस्ति देने योग्य रोगी को प्रथम भलीभाँति तेल की मालिश करके धीरे-धीरे गर्म जल से स्नान करा चुकने पर भोजन कराकर शास्त्रानुसार धीरे-धीरे टहला कर, मल, मूत्र तथा वायु का त्याग कराकर अन्त में स्नेहबस्ति देनी चाहिये ॥१०४॥ ❖ उष्णाम्बुस्वेदितम्=उष्णाम्बुना स्नपितम् ।।१०४।। यहाँ 'उष्णाम्बुस्वेदितम्' पद का 'गर्म जल से स्नान करा चुकने पर' यह भावार्थ समझना चाहिये ॥१०४॥ सुप्तस्य वामपार्श्वेन वामजङ्घाप्रसारिणः । कुञ्चितापरजङ्घस्य नेत्रं स्निग्धे गुदे न्यसेत् ।।१०५।। बद्धं बस्तिमुखं सूत्रैर्वामहस्तेन धारयेत् । पोडयेद्दक्षिनेनैव मध्यवेगेन धीरधीः ।।१०६।। जृम्भाकासक्षयार्दीश्च वस्तिकाले न कारयेत् । त्रिंशन्मात्रामितः कालः प्रोक्तो बस्तेस्तु पीडने ।।१०७।। ततः प्रणिहिते स्नेह- उत्तानो वाक्शतं भवेत् । प्रसारितः सर्वगात्रैर्यथावीर्यं प्रसर्पति ।।१०८।। स्वजानुनः करावर्त्तं कुर्याच्छोटिकया पुनः । एषा मात्रा भवेदेका सर्वत्रैवैष निश्चयः ।।१०९।। निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्या छोटिकाऽथ वा । गुर्वक्षरोच्चारणं वा स्यान्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।।११०।। बायें करवट से सोये हुए तथा बाईं जंघा पसारे हुये एवं दाहिनी जंघा सिकोड़े हुये रोगी की एरण्डादि तैल से चिकनी की हुई गुदा के अन्दर बस्ति की नली को रख और उसके बाद डोरे से बँधे हुये बस्ति के मुखको बायें हाथ से पकड़ ले और दाहिने हाथ से मध्यम वेग से दाब दे । बस्ति देने के समय रोगी को जम्भाई लेना, खाँसना तथा छींकना ये सब कार्य करने के लिये मना कर दे । बस्ति को दबाये रहने का समय ३० मात्रा तक कहा हुआ है । उसके बाद उक्तरीति से बस्ति स्नेह ले चुकने पर १ से १०० तक गिनती गिनने के समय तक रोगी को हाथ-पैर फैलवा कर उत्तान लेटा रहने दे ऐसा करने से उसके शरीर में स्नेहादि का यथोचित प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है । अपने घुटने के ऊपर एकबार हाथ फिराकर चुटकी बजाने में जितना समय लगता है उसे १ मात्रा का काल कहते हैं । अथवा जितना समय पुरुषों के पलक बन्द कर खोलने में लगता है या चुटकी बजाने में किंवा गुरु अक्षर (आ आदि) के उच्चारण करने में लगता है उतने समय के सदृश काल को विद्वान् लोग 'मात्रा' कहते हैं ॥१०५-११०॥ ❖ यथावीर्यं स्नेहादि ।।१०५-११०।। यहाँ 'यथावीर्यम्' पद का 'स्नेहादि यथावीर्य' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१०५-११०॥ ताडयेत्तलयोरेनं त्राँस्त्रीन्वाराञ्छनैः शनैः । स्फिजोश्चैव तथा श्रोणीं शय्याञ्चैवोत्क्षिपेत्ततः ।।१११।। स्फिजोश्चैनं स्वपाणिभ्यां पूर्ववत्ताडयेद् बुधः ।।११२।। शय्याञ्च पादतस्तस्य त्रीन्वारानुत्क्षिपेत्ततः । जाते विधाने तु ततः कुर्यान्निद्रां यथासुखम् ।।११३।। इसके बाद रोगी के दोनों पैर के तलुओं में तीन-तीन बार धीरे-धीरे हाथ से ठोके और इसी भाँति दोनों कूह्लों पर भी तीन-तीन बार ठोके । उसके बाद पैताने के तरफ से शय्या को तथा कटि (कमर) को तीन बार उचकावे, पुनः दोनों कूल्हों पर पूर्व की भाँति अपने हाथों से तीन बार ठोके और पैताने से तरफ की शय्या को तीन बार उचकावे । इस प्रकार उक्त विधि से कर चुकने पर रोगी को सुखपूर्वक सोने के लिये कह दे ॥१११-११३॥ सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यस्य तु । उपद्रवं विना शीघ्रं स सम्यगनुवासितः ।।११४।। जिस रोगी के अधोवायु तथा मल के साथ बिना उपद्रव के बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह (तेल) यदि गुदा के मार्ग से बाहर निकल आवे तो उसे 'उत्तम रीति से अनुवासनबस्ति दी गई' ऐसा समझना चाहिये ॥११४॥ ❖ उपद्रवस्याने 'ओषचोषावि'ति सुश्रुते पाठः ।।११४।।

१०२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'उपद्रवम्' के स्थान पर 'ओषचोषौ' ऐसा पाठ सुश्रुत में मिलता है ।।११४।। जीर्णान्नमेथ सायाह्ने स्नेहे प्रत्यागते पुनः । लध्वन्नं भोजयेत्कामं दीप्ताग्निस्तु नरो यदि ।।११५।। गुदामार्ग से स्नेह के बाहर निकल आने पर और भोजन किये हुये अन्न के पच जाने पर यदि रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो तो उसे रुचि के अनुसार लघु (जल्दी पच जाने वाला) अन्न भोजन करावे ।।११५।। अनुवासिताय दातव्यभितरेऽह्नि सुखोदकम् । धान्यशुण्ठीकषायं वा स्नेहव्यापत्तिनाशनम् ।। इस भाँति जिसे अनुवासन बस्ति दी गई हो उसे दूसरे दिन गर्म जल अथवा धनिया तथा सोंठ का क्वाथ स्नेहसम्बन्धी व्याधियों (विकारों) को दूर करने के लिये पिलाना चाहिये ।।११६।। ❖ सुखोदकम्=उष्णोदकम् । व्यापत्तिः=व्याधिः ।।११६।। यहाँ 'सुखोदकम्' का 'गर्म जल' तथा 'व्यापत्ति' का 'व्याधि (विकार)' अर्थ समझना चाहिये ।। अनेन विधिना षड्वा सप्त चाष्टौ नवापि वा । विधेया वस्तयस्तेषामन्ते चैव निरूहणम् ।।११७।। दत्तस्तु प्रथमो बस्तिः स्नेहेयद्वस्तिवङ्क्षणौ । सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्द्धस्थमनिलं जयेत् ।।११८।। बलं वर्णञ्च जनयेत्तृतीयस्तु प्रयोजितः । चतुर्थपञ्चमौ दत्तौ स्नेहेयतां रसासृजी ।।११९।। षष्ठो मांसं स्नेहयति सप्तमो मेद एव च । अष्टमो नवमश्चापि मज्जानञ्च यथाक्रमम् ।।१२०।। इस प्रकार (पूर्वोक्त विधि के अनुसार) रोगी को योग्यतानुसार ६, ७, ८ या ९ बार तक अनुवासन बस्ति दे चुकने पर अन्त में निरूहण बस्ति देनी चाहिये । रोगी को उत्तम रीति से प्रथम बार अनुवासन बस्ति देने पर उसके मूत्राशय तथा पेडू का स्नेहन होता है । दूसरी बार की बस्ति (अनुवासन) से मस्तक की वायु का शमन होता है । तीसरी बार की बस्ति से बल तथा वर्ण की उत्पत्ति होती है । चौथी तथा पाँचवीं बार की बस्ति से रस तथा रक्त का, छठीं बार की बस्ति से मांस का, सातवीं बार की वस्ति से मेदा का, आठवीं बार की बस्ति से अस्थियों का एवं नवीं बार की बस्ति से मज्जा का स्नेहन होता है ।।११७-१२०।। ❖ यथाक्रममिति वचनादष्टमोऽस्थि स्नेहेयेत् ।।११७-१२०।। यहाँ 'यथाक्रमम्' पद से 'आठवीं बार की वस्ति से अस्थियों का स्नेहन होता है' यह अर्थ समझना चाहिये ।।११७- १२०।। एवं शुक्रगतानदोषान्द्विगुणः साधु साधयेत् ।।१२१।। इस प्रकार अठ्ठारह दिन तक अट्ठारह बस्ति भलीभाँति से लेने पर शुक्रगत सभी दोष दूर हो जाते हैं ।।१२१।। द्विगुणः=अष्टादशदिवसावधिको बस्तिः ।।१२१।। यहाँ 'द्विगुणः' पद का 'अट्ठारह दिन तक अट्ठारह वस्ति' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२१।। अष्टादशाष्टादशकाह्निनाद्यो ना निषेवते । स कुञ्जरस्यबल्योऽश्वस्य जवतुलोऽमरप्रभः ।।१२२।। जो पुरुष १८ दिन में १८ बस्तियों का सेवन करता है वह हाथी के समान बलवान, घोड़े के समान वेगवान तथा देवता के समान कान्तिमान होता है ।।१२२।। रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्तिं दिने दिने । दद्याद्वैद्यस्तथाऽन्येषामग्न्याबाधभयात् त्र्यहात् । स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमनत्ययः ।।१२३।। जो मनुष्य रूक्ष शरीर वाला और अधिक वातसम्बन्धी दोष से पीड़ित हो उसे नित्य बस्ति देवे । इससे अन्य पुरुषों को तो अग्नि का बाध (मन्दता) होने के भय से तीन-तीन दिन पर अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । रूक्ष शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में अनुवासन बस्ति दीर्घकाल तक भी दी जाय तो कोई हानिकारक नहीं होती ।।१२३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२१ ❖ अनन्तययः=अबाधः ।।१२३।। यहाँ 'अनत्यय' पद का 'अबाध' अर्थात् कोई हानिकारक नहीं होती है—यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२३।। तथा निरूहः स्निग्धानामलपंमात्रः प्रशस्यते । अथ वा यस्य तत्कालं स्नेहो निर्याति केवलः । तस्याप्यल्पतरो देयो न हि स्निग्धेऽवतिष्ठते. ।।१२४।। स्निग्ध शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में निरूहबस्ति देना उचित होता है। अथवा जिस रोगी को स्नेह बस्ति देने पर तत्काल ही केवल स्नेह (तेल) गुदा के मार्ग से बाहर निकल आता हो उसके लिये अत्यन्त थोड़ी मात्रा स्नेह की बस्ति देने में लेनी चाहिये। क्योंकि स्निग्ध शरीर में बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह नहीं ठहरता ।।१२४।। ❖ अवतिष्ठते दत्तः स्नेह इति शेषः ।।१२४।। यहाँ 'बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह' यह ऊपर से समझ लिया जाता है ।।१२४।। अशुद्धस्य मलोन्मिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः । तदाऽङ्गसदनाध्माने शूलं श्वासश्च जायते ।।१२५।। पक्वाशये गुरुत्वञ्च तत्र दद्यान्निरूहणम् । तीक्ष्णं तीक्ष्णौषधैर्युक्तं फलवर्त्तिमथापि वा ।।१२६।। यथाऽनुलोमनो वायुर्मलः स्नेहश्च जायते । तथा विरेचनं दद्यात्तीक्ष्णं नस्यञ्च शस्यते ।।१२७।। यस्य नोपद्रवं कुर्यात्स्नेहवस्तिरनिःसृतः । सर्वोऽल्पो व्यावृत्तो रौक्ष्यादुपेक्ष्यः स विजानता ।।१२८।। अनायातं त्वहोरात्रे स्नेहं संशोधनैर्हरेत् । स्नेहबस्तावनायाते नान्यः स्नेहो विधीयते ।।१२९।। जिसकी अच्छी तरह से शुद्धि नहीं हुई है ऐसे मनुष्य का मल से मिला हुआ स्नेह जब पुनः बाहर नहीं निकलता तब उसके अङ्गों में शिथिलता आ जाती है तथा अफारा, शूल और श्वास उत्पन्न हो जाता है और पक्वाशय में गुरुता होती है। ऐसी अवस्था होने पर तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण निरूह बस्ति देनी चाहिये । अथवा वस्त्रादि में औषध लपेट कर उसकी बत्ती बनाकर गुदा में देनी चाहिये जिससे कि वायु का अनुलोमन होकर मल के सहित स्नेह बाहर निकल आवे। उक्त अवस्था में विरेचन एवं नस्य भी देना उत्तम होता है। स्नेहबस्ति देने पर यदि वह बाहर न निकलने से कोई उपद्रव न करे तो यह समझना चाहिये कि उसके शरीर में रूक्षता होने से सम्पूर्ण अथवा थोड़ा स्नेह शरीर ने सोख लिया है अतः चतुर वैद्य उसकी उपेक्षा कर दे। अर्थात् उस स्नेह को बाहर निकालने का यत्न न करे । यदि एक दिन एक रात्रि व्यतीत हो जाने पर भी स्नेह बाहर न निकले तो उसे संशोधन के उपाय द्वारा बाहर निकाले । न कि उसे निकालने के लिये पुनः दुबारा स्नेह बस्ति का प्रयोग करे ।।१२५-१२९।। गुडूच्येरण्डपूतीकभार्ङ्गीवृषकरौहिषम् । शतावरीसहचरौ काकनासां पलोन्मिताम् ।।१३०।। यवमाषातसीकोलकुलत्थान्प्रसृतोन्मितान् । चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा द्रोणशेषेण तेन च ।।१३१।। पचेत्तैलाढकं सर्वैर्जीवनीयैः पलोन्मितैः । अनुवासनमेतद्धि सर्ववातविकारनुत् ।।१३२।। सभी प्रकार के वातसम्बन्धी विकारों को दूर करने वाली अनुवासन बस्ति—गिलोय, एरण्ड, (रेंड़ी), करञ्ज, भारङ्गी, अडूसा, रोहिस घास, शतावर, कटसरैया, काकनासा, इन सबों को एक-एक पल (चार-चार तोले) लेकर और जौ, उड़द, अलसी, बेर की गुठली, कुलथी इन सबों को दो-दो पल लेकर ४ द्रोण जल में पकावे जब एकं द्रोण जल शेष रह जाय तब उतार ले पुनः इस क्वाथ में जीवनीयं१ गण की ओषधियाँ एक-एक लेकर उनका कल्क पीस कर डाल दे और एक आढक (६४ पल) तेल के साथ पकावे जब केवल स्नेह भाग शेष रह जाय तब उतार ले। इस स्नेह से अनुवासन बस्ति देने से सभी प्रकार के वातरोगों का नाश होता है ।।१३०-१३२।। १. जीवनीयगणे यथा चरके—जीवकर्षभकौ, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती, मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्तीति । अर्थ—जीवक, ऋषभक, भेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलेठी ये १० ओषधियां जीवनीय होती हैं अतः ये जीवनीयगण की कहलाती हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA