भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१७ ‘नेत्रं मन्थगुणे वस्त्र तरुमूले विलोचने । नेत्रबन्धे च नाड्याञ्च नेत्रो नेतरि भेद्यवद्’ इति ।।८७।। यहाँ ‘नेत्र’ पद का ‘नाड़ी अर्थात् नली’ यह अर्थ समझना चाहिये । क्योंकि ‘विश्वप्रकाश कोश’ में यह कहा हुआ है कि—नेत्र शब्द दूध या दही मथने की मथानी की डोरी, वस्त्र, वृक्ष का मूल भाग, आँख, नेत्र का बन्ध तथा नाड़ी (नल) इन अर्थों में नपुंसकलिंगी होता है । तथा नेता (ले जाने वाला) इस अर्थ में विशेष्य पद के अनुसार तीनों लिङ्ग में होता है ।।८७।। एकवर्षात्तु षड्वर्षाद्यावन्मानं षडङ्गुलम् । ततो द्वादशकं यावन्मानं स्यादष्टसम्मितम् ।।८८।। ततः परं द्वादशभिरङ्गुलैर्नेत्रदीर्घता । मुद्गच्छिद्रं कलायाभं छिद्रं कोलास्थिसन्निभम् ।।८९।। यथा संख्यं भवेन्नेत्रं श्लक्ष्णं गोपुच्छसन्निभम् । गोपुच्छसन्निभं मूले स्थूलं तस्मात् क्रमात् कृशम् ।।९०।। एक वर्ष से लेकर ६ वर्ष तक के बालक को यदि बस्ति देनी हो तो बस्ति की लम्बाई ६ अङ्गुल की होनी चाहिये । ६ वर्ष से लेकर १२ वर्ष तक के लिये ८ अंगुल तथा १२ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले मनुष्य के लिये १२ अंगुल की होनी चाहिये । पूर्वोक्त ६-८-१२ अंगुल की लम्बी तीनों नलियों का छिद्र क्रम से मूँग, मटर तथा बेर की गुठली जाने लायक होना चाहिये । और वे नलियाँ चिकनी तथा गो के छ की समान मूल भाग में अपेक्षाकृत मोटी हुई उत्तरोत्तर क्रम से पतली होनी चाहिये ।।८८-९०।। मुद्गच्छिद्रादिप्रमाणं नेत्रं क्रमेण षड्वर्षाय द्वादशवर्षाय तदूर्ध्ववर्षाय ज्ञेयम् ।।८८-९०।। यहाँ ‘मूँग आदि के जाने लायक जो नलियों के छिद्र का तीन प्रकार का प्रमाण कहा गया है उसे क्रम से ६ वर्ष तथा १२ वर्ष तक एवं उससे ऊपर की अवस्था वालों के लिये समझना चाहिये । अर्थात् ६ वर्ष तक वालों के लिये जो नली हो उसका छिद्र मूँग जाने लायक हो, १२ वर्ष तक वालों के लिये मटर जाने लायक और उससे ऊपर वालों के लिये बेर की गुठली जाने लायक नली का छिद्र हो’ यह समझना चाहिये ।।८८-९०।। आतुराङ्गुष्ठमानेन मूले स्थूलं निधीयते । कनिष्ठिकापरीणाहमग्रे च गुटिकामुखम् ।।९१।। तन्मूले कर्णिके द्वे च कार्ये भागाञ्चतुर्थकात् ।।९२।। योजयेत्तत्र वस्तिञ्च वन्धद्वयविधानतः । मृगाजशूकरगवां महिषस्यापि वा भवेत् ।।९३।। जिसे बस्ति देना हो उस रोगी के अंगूठे की मोटाई बराबर बस्ति की नली के मूल भाग की मुटाई होनी चाहिये और मूल भाग से ऊपर की ओर की मुटाई रोगी के कनिष्ठिका अङ्गुली के बराबर होनी चाहिये तथा वस्तिमुख पर गोली की भाँति गोल आकार बना होना चाहिये । बस्ति की नली के ऊपर की ओर तीन हिस्सा छोड़कर बाकी नीचे चौथे भाग रूप मूल में दो कर्णिका बनानी चाहिये । उसके बाद उन्हीं दोनों कर्णिकाओं में बस्ति (मूत्राशय की कोथली) के दोनों सिराओं को दोहरा गाँठ लगा कर मजबूती से बाँध दे । बस्ति मृग, बकरा, शूअर वा बैल की होनी चाहिये ।।९१-९३।। ❖ परीणाहोऽत्र स्थौल्यम् ।। यहाँ ‘परीणाह’ पद का ‘मुटाई’ अर्थ समझना चाहिये । ❖ कर्णिका=गवादिकर्णवत् । यहाँ ‘कर्णिका बनानी चाहिये’ इसका गाय आदि के कान के समान कर्णिका बनानी चाहिये—यह अर्थ समझना चाहिये । ❖ बस्तिरिति शेषः ।।९१-९३।। यहाँ ‘वस्ति’ पद मूलमें न होने से उसका योग्यतावश ‘ऊपर से अध्याहार किया गया है’ । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA