भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०१८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूत्रकोषस्य बस्तिस्तु तदलाभे तु चर्मणः । कषायरक्तः स मृदुर्बस्तिः स्निग्धो दृढो हितः ॥९४॥ व्रणवस्तेस्तु नेत्रं स्याच्छ्लक्ष्णमष्टाङ्गुलोन्मितम् । मुद्गच्छिद्रं गृध्रपक्षनलिकापरिणाहि च ॥९५॥ शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः । कुरुते परिवृद्धिश्च बस्तिः सम्यगुपासितः ॥९६॥ दिवा शीते वसन्ते च स्नेहबस्तिः प्रदीयते । ग्रीष्मवर्षाशरत्काले रात्रौ स्यादनुवासनम् ॥९७॥ बस्ति उक्त जीवों के मूत्राशय की होनी चाहिये यदि मूत्राशय की न हो तो चमड़े की बना लेनी चाहिये । बस्ति कषाय (कसैले) रङ्ग से रङ्गी हुई, कोमल, चिक्कन तथा दृढ़ हो तो हितकर होती है । व्रण (घाव) में यदि बस्ति देनी हो तो उसकी नली चिकनी, आठ अङ्गुल लम्बी, मूँग जाने लायक छिद्रवाली तथा गिद्ध के पंख की नली के समान होनी चाहिये । यदि बस्ति भलीभाँति दी जाय तो उससे शरीर, वर्ण (शरीर का रङ्ग) बल, आरोग्य तथा आयु की वृद्धि होती है । शीत तथा वसन्त ऋतु में दिन के समय स्नेह की बस्ति उत्तम होती है । ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद् ऋतु में रात्रि के समय बस्ति देनी चाहिए ॥९४-९७॥ न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् । मदंमूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः ॥९८॥ रोगी को अतिस्निग्ध (अत्यन्त स्नेहयुक्त) पदार्थ भोजन कराकर अनुवासन (स्नेह-बस्ति) नहीं देना चाहिये । क्योंकि भोजन तथा बस्ति दोनों ही में स्नेह का प्रयोग करने से रोगी को मद तथा मूर्च्छा उत्पन्न होती है ॥९८॥ ❖ द्विधा=भोजने बस्तौ च ॥९८॥ यहाँ 'द्विधा' पद का 'भोजन तथा बस्ति दोनों ही में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९८॥ रूक्षभुक्तवतोऽत्यन्तं बलं वर्णञ्च हापयेत् । युक्तस्नेहमतो जन्तुं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥९९॥ अत्यन्त रूखा अन्न जिसने भोजन किया है उसे यदि बस्ति दी जाय तो उससे भी बल तथा वर्ण की हानि होती है । अतः रोगी को यथोचित स्नेह (घी) युक्त भोज्य पदार्थ भोजन कराकर अनुवासन (स्नेहबस्ति) देना चाहिये ॥९९॥ ❖ युक्तस्नेहं=यथोचितस्नेहं भोज्यं भोजयित्वेत्यर्थः ॥९९॥ यहाँ 'युक्तस्नेह' पद का 'यथोचित स्नेह (घी) युक्त भोज्य पदार्थ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९९॥ हीनमात्रावुभौबस्ती नातिकार्यकरौ स्मृतौ । अतिमात्रौ तथाऽऽनाहक्लमातीसारकारकौ ॥१००॥ अनुवासन तथा निरूह नामक ये दोनों बस्ति यदि हीन मात्रा में दी जायँ तो वे अत्यन्त उपकारक नहीं होती हैं और यदि अधिक मात्रा में दी जायँ तो अफारा, क्लान्ति तथा अतीसार उत्पन्न करने वाली होती हैं ॥१००॥ ❖ उभौ बस्ती=अनुवासननिरूहाख्यौ ॥१००॥ यहाँ 'उभौ बस्ती' का 'अनुवासन तथा निरूह नामक ये दोनों बस्ति' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ उत्तमा स्यात्पलैः षड्भिर्मध्यमा स्यात्पलैस्त्रिभिः । पलाध्यर्द्धेन हीना स्यादुक्ता मात्राऽनुवासने ।। शताह्वासैन्धवाभ्याञ्च देयं स्नेहे च चूर्णकम् । भुक्तान्नायानुवात्याय बस्तिर्देयोऽनुवासनः ॥१०३॥ (स्नेहबस्ति) देने में ६ पल (२४ तो.) की मात्रा उत्तम, ३ पल (१२ तो.) की मध्यम और १॥ पल (६ तो.) की मात्रा हीन कही हुई है । बस्ति देने के लिये जो स्नेह हो उसमें सौंफ तथा सेन्धा नमक का चूर्ण डालना चाहिये और उस (चूर्ण) की मात्रा ६ माशे की उत्तम, ४ माशे की मध्यम तथा २ माशे को हीन समझी जाती है । जिसे अनुवासन (स्नेहबस्ति) देना हो उसे विरेचन लिये हुये जब सात रात्रि व्यतीत हो जाय तथा जब उसे बल आ जाय तब भोजन कराने के बाद अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥१०१-१०३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA