भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1070, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०९९ तथाऽनुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुस्वेदितं शनैः । भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचङ्क्रमणं ततः । उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं योजयेत्स्नेहबस्तिना ।।१०४।। अनुवासन बस्ति देने योग्य रोगी को प्रथम भलीभाँति तेल की मालिश करके धीरे-धीरे गर्म जल से स्नान करा चुकने पर भोजन कराकर शास्त्रानुसार धीरे-धीरे टहला कर, मल, मूत्र तथा वायु का त्याग कराकर अन्त में स्नेहबस्ति देनी चाहिये ॥१०४॥ ❖ उष्णाम्बुस्वेदितम्=उष्णाम्बुना स्नपितम् ।।१०४।। यहाँ 'उष्णाम्बुस्वेदितम्' पद का 'गर्म जल से स्नान करा चुकने पर' यह भावार्थ समझना चाहिये ॥१०४॥ सुप्तस्य वामपार्श्वेन वामजङ्घाप्रसारिणः । कुञ्चितापरजङ्घस्य नेत्रं स्निग्धे गुदे न्यसेत् ।।१०५।। बद्धं बस्तिमुखं सूत्रैर्वामहस्तेन धारयेत् । पोडयेद्दक्षिनेनैव मध्यवेगेन धीरधीः ।।१०६।। जृम्भाकासक्षयार्दीश्च वस्तिकाले न कारयेत् । त्रिंशन्मात्रामितः कालः प्रोक्तो बस्तेस्तु पीडने ।।१०७।। ततः प्रणिहिते स्नेह- उत्तानो वाक्शतं भवेत् । प्रसारितः सर्वगात्रैर्यथावीर्यं प्रसर्पति ।।१०८।। स्वजानुनः करावर्त्तं कुर्याच्छोटिकया पुनः । एषा मात्रा भवेदेका सर्वत्रैवैष निश्चयः ।।१०९।। निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्या छोटिकाऽथ वा । गुर्वक्षरोच्चारणं वा स्यान्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।।११०।। बायें करवट से सोये हुए तथा बाईं जंघा पसारे हुये एवं दाहिनी जंघा सिकोड़े हुये रोगी की एरण्डादि तैल से चिकनी की हुई गुदा के अन्दर बस्ति की नली को रख और उसके बाद डोरे से बँधे हुये बस्ति के मुखको बायें हाथ से पकड़ ले और दाहिने हाथ से मध्यम वेग से दाब दे । बस्ति देने के समय रोगी को जम्भाई लेना, खाँसना तथा छींकना ये सब कार्य करने के लिये मना कर दे । बस्ति को दबाये रहने का समय ३० मात्रा तक कहा हुआ है । उसके बाद उक्तरीति से बस्ति स्नेह ले चुकने पर १ से १०० तक गिनती गिनने के समय तक रोगी को हाथ-पैर फैलवा कर उत्तान लेटा रहने दे ऐसा करने से उसके शरीर में स्नेहादि का यथोचित प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है । अपने घुटने के ऊपर एकबार हाथ फिराकर चुटकी बजाने में जितना समय लगता है उसे १ मात्रा का काल कहते हैं । अथवा जितना समय पुरुषों के पलक बन्द कर खोलने में लगता है या चुटकी बजाने में किंवा गुरु अक्षर (आ आदि) के उच्चारण करने में लगता है उतने समय के सदृश काल को विद्वान् लोग 'मात्रा' कहते हैं ॥१०५-११०॥ ❖ यथावीर्यं स्नेहादि ।।१०५-११०।। यहाँ 'यथावीर्यम्' पद का 'स्नेहादि यथावीर्य' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१०५-११०॥ ताडयेत्तलयोरेनं त्राँस्त्रीन्वाराञ्छनैः शनैः । स्फिजोश्चैव तथा श्रोणीं शय्याञ्चैवोत्क्षिपेत्ततः ।।१११।। स्फिजोश्चैनं स्वपाणिभ्यां पूर्ववत्ताडयेद् बुधः ।।११२।। शय्याञ्च पादतस्तस्य त्रीन्वारानुत्क्षिपेत्ततः । जाते विधाने तु ततः कुर्यान्निद्रां यथासुखम् ।।११३।। इसके बाद रोगी के दोनों पैर के तलुओं में तीन-तीन बार धीरे-धीरे हाथ से ठोके और इसी भाँति दोनों कूह्लों पर भी तीन-तीन बार ठोके । उसके बाद पैताने के तरफ से शय्या को तथा कटि (कमर) को तीन बार उचकावे, पुनः दोनों कूल्हों पर पूर्व की भाँति अपने हाथों से तीन बार ठोके और पैताने से तरफ की शय्या को तीन बार उचकावे । इस प्रकार उक्त विधि से कर चुकने पर रोगी को सुखपूर्वक सोने के लिये कह दे ॥१११-११३॥ सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यस्य तु । उपद्रवं विना शीघ्रं स सम्यगनुवासितः ।।११४।। जिस रोगी के अधोवायु तथा मल के साथ बिना उपद्रव के बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह (तेल) यदि गुदा के मार्ग से बाहर निकल आवे तो उसे 'उत्तम रीति से अनुवासनबस्ति दी गई' ऐसा समझना चाहिये ॥११४॥ ❖ उपद्रवस्याने 'ओषचोषावि'ति सुश्रुते पाठः ।।११४।।