भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'उपद्रवम्' के स्थान पर 'ओषचोषौ' ऐसा पाठ सुश्रुत में मिलता है ।।११४।। जीर्णान्नमेथ सायाह्ने स्नेहे प्रत्यागते पुनः । लध्वन्नं भोजयेत्कामं दीप्ताग्निस्तु नरो यदि ।।११५।। गुदामार्ग से स्नेह के बाहर निकल आने पर और भोजन किये हुये अन्न के पच जाने पर यदि रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो तो उसे रुचि के अनुसार लघु (जल्दी पच जाने वाला) अन्न भोजन करावे ।।११५।। अनुवासिताय दातव्यभितरेऽह्नि सुखोदकम् । धान्यशुण्ठीकषायं वा स्नेहव्यापत्तिनाशनम् ।। इस भाँति जिसे अनुवासन बस्ति दी गई हो उसे दूसरे दिन गर्म जल अथवा धनिया तथा सोंठ का क्वाथ स्नेहसम्बन्धी व्याधियों (विकारों) को दूर करने के लिये पिलाना चाहिये ।।११६।। ❖ सुखोदकम्=उष्णोदकम् । व्यापत्तिः=व्याधिः ।।११६।। यहाँ 'सुखोदकम्' का 'गर्म जल' तथा 'व्यापत्ति' का 'व्याधि (विकार)' अर्थ समझना चाहिये ।। अनेन विधिना षड्वा सप्त चाष्टौ नवापि वा । विधेया वस्तयस्तेषामन्ते चैव निरूहणम् ।।११७।। दत्तस्तु प्रथमो बस्तिः स्नेहेयद्वस्तिवङ्क्षणौ । सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्द्धस्थमनिलं जयेत् ।।११८।। बलं वर्णञ्च जनयेत्तृतीयस्तु प्रयोजितः । चतुर्थपञ्चमौ दत्तौ स्नेहेयतां रसासृजी ।।११९।। षष्ठो मांसं स्नेहयति सप्तमो मेद एव च । अष्टमो नवमश्चापि मज्जानञ्च यथाक्रमम् ।।१२०।। इस प्रकार (पूर्वोक्त विधि के अनुसार) रोगी को योग्यतानुसार ६, ७, ८ या ९ बार तक अनुवासन बस्ति दे चुकने पर अन्त में निरूहण बस्ति देनी चाहिये । रोगी को उत्तम रीति से प्रथम बार अनुवासन बस्ति देने पर उसके मूत्राशय तथा पेडू का स्नेहन होता है । दूसरी बार की बस्ति (अनुवासन) से मस्तक की वायु का शमन होता है । तीसरी बार की बस्ति से बल तथा वर्ण की उत्पत्ति होती है । चौथी तथा पाँचवीं बार की बस्ति से रस तथा रक्त का, छठीं बार की बस्ति से मांस का, सातवीं बार की वस्ति से मेदा का, आठवीं बार की बस्ति से अस्थियों का एवं नवीं बार की बस्ति से मज्जा का स्नेहन होता है ।।११७-१२०।। ❖ यथाक्रममिति वचनादष्टमोऽस्थि स्नेहेयेत् ।।११७-१२०।। यहाँ 'यथाक्रमम्' पद से 'आठवीं बार की वस्ति से अस्थियों का स्नेहन होता है' यह अर्थ समझना चाहिये ।।११७- १२०।। एवं शुक्रगतानदोषान्द्विगुणः साधु साधयेत् ।।१२१।। इस प्रकार अठ्ठारह दिन तक अट्ठारह बस्ति भलीभाँति से लेने पर शुक्रगत सभी दोष दूर हो जाते हैं ।।१२१।। द्विगुणः=अष्टादशदिवसावधिको बस्तिः ।।१२१।। यहाँ 'द्विगुणः' पद का 'अट्ठारह दिन तक अट्ठारह वस्ति' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२१।। अष्टादशाष्टादशकाह्निनाद्यो ना निषेवते । स कुञ्जरस्यबल्योऽश्वस्य जवतुलोऽमरप्रभः ।।१२२।। जो पुरुष १८ दिन में १८ बस्तियों का सेवन करता है वह हाथी के समान बलवान, घोड़े के समान वेगवान तथा देवता के समान कान्तिमान होता है ।।१२२।। रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्तिं दिने दिने । दद्याद्वैद्यस्तथाऽन्येषामग्न्याबाधभयात् त्र्यहात् । स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमनत्ययः ।।१२३।। जो मनुष्य रूक्ष शरीर वाला और अधिक वातसम्बन्धी दोष से पीड़ित हो उसे नित्य बस्ति देवे । इससे अन्य पुरुषों को तो अग्नि का बाध (मन्दता) होने के भय से तीन-तीन दिन पर अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । रूक्ष शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में अनुवासन बस्ति दीर्घकाल तक भी दी जाय तो कोई हानिकारक नहीं होती ।।१२३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA