भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
१०२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'उपद्रवम्' के स्थान पर 'ओषचोषौ' ऐसा पाठ सुश्रुत में मिलता है ।।११४।। जीर्णान्नमेथ सायाह्ने स्नेहे प्रत्यागते पुनः । लध्वन्नं भोजयेत्कामं दीप्ताग्निस्तु नरो यदि ।।११५।। गुदामार्ग से स्नेह के बाहर निकल आने पर और भोजन किये हुये अन्न के पच जाने पर यदि रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो तो उसे रुचि के अनुसार लघु (जल्दी पच जाने वाला) अन्न भोजन करावे ।।११५।। अनुवासिताय दातव्यभितरेऽह्नि सुखोदकम् । धान्यशुण्ठीकषायं वा स्नेहव्यापत्तिनाशनम् ।। इस भाँति जिसे अनुवासन बस्ति दी गई हो उसे दूसरे दिन गर्म जल अथवा धनिया तथा सोंठ का क्वाथ स्नेहसम्बन्धी व्याधियों (विकारों) को दूर करने के लिये पिलाना चाहिये ।।११६।। ❖ सुखोदकम्=उष्णोदकम् । व्यापत्तिः=व्याधिः ।।११६।। यहाँ 'सुखोदकम्' का 'गर्म जल' तथा 'व्यापत्ति' का 'व्याधि (विकार)' अर्थ समझना चाहिये ।। अनेन विधिना षड्वा सप्त चाष्टौ नवापि वा । विधेया वस्तयस्तेषामन्ते चैव निरूहणम् ।।११७।। दत्तस्तु प्रथमो बस्तिः स्नेहेयद्वस्तिवङ्क्षणौ । सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्द्धस्थमनिलं जयेत् ।।११८।। बलं वर्णञ्च जनयेत्तृतीयस्तु प्रयोजितः । चतुर्थपञ्चमौ दत्तौ स्नेहेयतां रसासृजी ।।११९।। षष्ठो मांसं स्नेहयति सप्तमो मेद एव च । अष्टमो नवमश्चापि मज्जानञ्च यथाक्रमम् ।।१२०।। इस प्रकार (पूर्वोक्त विधि के अनुसार) रोगी को योग्यतानुसार ६, ७, ८ या ९ बार तक अनुवासन बस्ति दे चुकने पर अन्त में निरूहण बस्ति देनी चाहिये । रोगी को उत्तम रीति से प्रथम बार अनुवासन बस्ति देने पर उसके मूत्राशय तथा पेडू का स्नेहन होता है । दूसरी बार की बस्ति (अनुवासन) से मस्तक की वायु का शमन होता है । तीसरी बार की बस्ति से बल तथा वर्ण की उत्पत्ति होती है । चौथी तथा पाँचवीं बार की बस्ति से रस तथा रक्त का, छठीं बार की बस्ति से मांस का, सातवीं बार की वस्ति से मेदा का, आठवीं बार की बस्ति से अस्थियों का एवं नवीं बार की बस्ति से मज्जा का स्नेहन होता है ।।११७-१२०।। ❖ यथाक्रममिति वचनादष्टमोऽस्थि स्नेहेयेत् ।।११७-१२०।। यहाँ 'यथाक्रमम्' पद से 'आठवीं बार की वस्ति से अस्थियों का स्नेहन होता है' यह अर्थ समझना चाहिये ।।११७- १२०।। एवं शुक्रगतानदोषान्द्विगुणः साधु साधयेत् ।।१२१।। इस प्रकार अठ्ठारह दिन तक अट्ठारह बस्ति भलीभाँति से लेने पर शुक्रगत सभी दोष दूर हो जाते हैं ।।१२१।। द्विगुणः=अष्टादशदिवसावधिको बस्तिः ।।१२१।। यहाँ 'द्विगुणः' पद का 'अट्ठारह दिन तक अट्ठारह वस्ति' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२१।। अष्टादशाष्टादशकाह्निनाद्यो ना निषेवते । स कुञ्जरस्यबल्योऽश्वस्य जवतुलोऽमरप्रभः ।।१२२।। जो पुरुष १८ दिन में १८ बस्तियों का सेवन करता है वह हाथी के समान बलवान, घोड़े के समान वेगवान तथा देवता के समान कान्तिमान होता है ।।१२२।। रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्तिं दिने दिने । दद्याद्वैद्यस्तथाऽन्येषामग्न्याबाधभयात् त्र्यहात् । स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमनत्ययः ।।१२३।। जो मनुष्य रूक्ष शरीर वाला और अधिक वातसम्बन्धी दोष से पीड़ित हो उसे नित्य बस्ति देवे । इससे अन्य पुरुषों को तो अग्नि का बाध (मन्दता) होने के भय से तीन-तीन दिन पर अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । रूक्ष शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में अनुवासन बस्ति दीर्घकाल तक भी दी जाय तो कोई हानिकारक नहीं होती ।।१२३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२१ ❖ अनन्तययः=अबाधः ।।१२३।। यहाँ 'अनत्यय' पद का 'अबाध' अर्थात् कोई हानिकारक नहीं होती है—यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२३।। तथा निरूहः स्निग्धानामलपंमात्रः प्रशस्यते । अथ वा यस्य तत्कालं स्नेहो निर्याति केवलः । तस्याप्यल्पतरो देयो न हि स्निग्धेऽवतिष्ठते. ।।१२४।। स्निग्ध शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में निरूहबस्ति देना उचित होता है। अथवा जिस रोगी को स्नेह बस्ति देने पर तत्काल ही केवल स्नेह (तेल) गुदा के मार्ग से बाहर निकल आता हो उसके लिये अत्यन्त थोड़ी मात्रा स्नेह की बस्ति देने में लेनी चाहिये। क्योंकि स्निग्ध शरीर में बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह नहीं ठहरता ।।१२४।। ❖ अवतिष्ठते दत्तः स्नेह इति शेषः ।।१२४।। यहाँ 'बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह' यह ऊपर से समझ लिया जाता है ।।१२४।। अशुद्धस्य मलोन्मिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः । तदाऽङ्गसदनाध्माने शूलं श्वासश्च जायते ।।१२५।। पक्वाशये गुरुत्वञ्च तत्र दद्यान्निरूहणम् । तीक्ष्णं तीक्ष्णौषधैर्युक्तं फलवर्त्तिमथापि वा ।।१२६।। यथाऽनुलोमनो वायुर्मलः स्नेहश्च जायते । तथा विरेचनं दद्यात्तीक्ष्णं नस्यञ्च शस्यते ।।१२७।। यस्य नोपद्रवं कुर्यात्स्नेहवस्तिरनिःसृतः । सर्वोऽल्पो व्यावृत्तो रौक्ष्यादुपेक्ष्यः स विजानता ।।१२८।। अनायातं त्वहोरात्रे स्नेहं संशोधनैर्हरेत् । स्नेहबस्तावनायाते नान्यः स्नेहो विधीयते ।।१२९।। जिसकी अच्छी तरह से शुद्धि नहीं हुई है ऐसे मनुष्य का मल से मिला हुआ स्नेह जब पुनः बाहर नहीं निकलता तब उसके अङ्गों में शिथिलता आ जाती है तथा अफारा, शूल और श्वास उत्पन्न हो जाता है और पक्वाशय में गुरुता होती है। ऐसी अवस्था होने पर तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण निरूह बस्ति देनी चाहिये । अथवा वस्त्रादि में औषध लपेट कर उसकी बत्ती बनाकर गुदा में देनी चाहिये जिससे कि वायु का अनुलोमन होकर मल के सहित स्नेह बाहर निकल आवे। उक्त अवस्था में विरेचन एवं नस्य भी देना उत्तम होता है। स्नेहबस्ति देने पर यदि वह बाहर न निकलने से कोई उपद्रव न करे तो यह समझना चाहिये कि उसके शरीर में रूक्षता होने से सम्पूर्ण अथवा थोड़ा स्नेह शरीर ने सोख लिया है अतः चतुर वैद्य उसकी उपेक्षा कर दे। अर्थात् उस स्नेह को बाहर निकालने का यत्न न करे । यदि एक दिन एक रात्रि व्यतीत हो जाने पर भी स्नेह बाहर न निकले तो उसे संशोधन के उपाय द्वारा बाहर निकाले । न कि उसे निकालने के लिये पुनः दुबारा स्नेह बस्ति का प्रयोग करे ।।१२५-१२९।। गुडूच्येरण्डपूतीकभार्ङ्गीवृषकरौहिषम् । शतावरीसहचरौ काकनासां पलोन्मिताम् ।।१३०।। यवमाषातसीकोलकुलत्थान्प्रसृतोन्मितान् । चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा द्रोणशेषेण तेन च ।।१३१।। पचेत्तैलाढकं सर्वैर्जीवनीयैः पलोन्मितैः । अनुवासनमेतद्धि सर्ववातविकारनुत् ।।१३२।। सभी प्रकार के वातसम्बन्धी विकारों को दूर करने वाली अनुवासन बस्ति—गिलोय, एरण्ड, (रेंड़ी), करञ्ज, भारङ्गी, अडूसा, रोहिस घास, शतावर, कटसरैया, काकनासा, इन सबों को एक-एक पल (चार-चार तोले) लेकर और जौ, उड़द, अलसी, बेर की गुठली, कुलथी इन सबों को दो-दो पल लेकर ४ द्रोण जल में पकावे जब एकं द्रोण जल शेष रह जाय तब उतार ले पुनः इस क्वाथ में जीवनीयं१ गण की ओषधियाँ एक-एक लेकर उनका कल्क पीस कर डाल दे और एक आढक (६४ पल) तेल के साथ पकावे जब केवल स्नेह भाग शेष रह जाय तब उतार ले। इस स्नेह से अनुवासन बस्ति देने से सभी प्रकार के वातरोगों का नाश होता है ।।१३०-१३२।। १. जीवनीयगणे यथा चरके—जीवकर्षभकौ, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती, मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्तीति । अर्थ—जीवक, ऋषभक, भेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलेठी ये १० ओषधियां जीवनीय होती हैं अतः ये जीवनीयगण की कहलाती हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ पूतीकः=करञ्जः । रौहिषम्=ईषत्सुगन्ध्यतृणविशेषः । काकनासा (कौआठोडी) प्रसृतम्=पल- द्वयम् ।।१३०-१३२।। यहाँ 'पूतीक' से 'करञ्ज' । 'रौहिष' से 'किञ्चित् सुगन्ध युक्त तृण विशेष (रोहिसघास)' । 'काकनासा' से 'कौआ ठोडी' । 'प्रसृत' से 'दो पल' का ग्रहण करना चाहिये ।।१३०-१३२।। षट्सप्ततिव्यापदस्तु जायन्ते बस्तिकर्मणः । दूषितात् समुदायेन तांश्चिकित्स्यास्तु सुश्रुतात् ।। बस्तिकर्म का ठीक-ठीक उपयोग यदि न हो तो दूषित हो जाने से उससे छिहत्तर रोग उत्पन्न होते हैं, अतः समुचित नली आदि सामग्री से सुश्रुतोक्त रीति के अनुसार उन रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये ।।१३३।। ❖ समुदायेन=समुचितनेत्रादिसामग्रया ।।१३३।। यहाँ 'समुदायेन' पद का-समुचित नली आदि सामग्री से-यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३३।। पानाहारविहाराश्च परिहाराश्च कृत्स्नशः । स्नेहपानसमाः कार्या नात्र कार्या विचारणा ।। स्नेहपान विधि में जैसा जो कुछ पान (पीना), आहार (खाना), बिहार (रहन-सहन) तथा परिहार (परहेज) कहा हुआ है ठीक वैसा ही सब कुछ स्नेहबस्ति में भी करना चाहिये, इस विषय में कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं ।।१३४।। अथ निरूहः । अथ निरूहबस्तिविधिमाह- निरूहबस्तिर्बहुधा भिद्यते कारणान्तरैः । तरेव तस्य नामानि कृतानि मुनिपुङ्गवैः ।।१३५।। निरूह बस्ति की विधि-समवायि कारण के भेद से (पृथक्-पृथक् ओषधियों द्वारा कराने से) निरूह बस्ति के अनेक भेद होते हैं । इसीलिये ऋषियों ने उन बस्तियों के अलग-अलग नामकरण किये हैं ।।१३५।। ❖ कारणान्तरैः=समवायिकारणभेदैः ।।१३५।। यहाँ 'कारणान्तरैः' पद का समवायिकारण के भेद से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३५।। निरूहस्यापरं नाम प्रोक्तमास्थापनं बुधैः । स्वस्थाने स्थापनाद्दोषाधातूनां स्थापनं मतम् ।।१३६।। निरूहस्य प्रमाणं तु प्रस्थं पादोत्तरं परम् । मध्यमं प्रस्थमुद्दिष्टं हीनञ्च कुडवास्त्रयः ।।१३७।। विद्वानों ने निरूह बस्ति का दूसरा नाम आस्थापन बस्ति कहा है क्योंकि आस्थापन से दोषों तथा धातुओं का अपने- अपने स्थान में स्थापन होता है । निरूह बस्ति की मात्रा का प्रमाण सवाप्रस्थ (१ सेर) का श्रेष्ठ होता है । एक प्रस्थ (१२ छ. ४ भर) की मात्रा मध्यम तथा तीन कुडव (९ छ. ३ भर) की मात्रा निकृष्ट समझनी चाहिये ।।१३६-१३७।। ❖ पर=श्रेष्ठम् ।।१३६-१३७।। यहाँ 'पर' का 'श्रेष्ठ' अर्थ समझना चाहिये ।।१३६-१३७।। अतिस्निग्धोऽक्लिष्टदोषः क्षतोरस्कः कृशस्तथा । आध्मानच्छर्दिहिक्काऽर्शःकासश्वासप्रपीडितः ।।१३८।। गुदशोफातिसारार्त्तो विसूचीकुष्ठसंयुतः । गर्भिणी मधुमेही च नास्थाप्यश्च जलोदरी ।।१३९।। अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाला, उत्क्लेशजनक आहारादि द्वारा जिसके दोष बाहर निकलने के लिये उन्मुख न हुए हों, उरःक्षत का रोगी, दुर्बल मनुष्य, अफारा, वमन, हिचकी, बवासीर, खाँसी और दमा से पीड़ित, गुदासम्बन्धी शोथ, अतिसार, विसूचिका तथा कुष्ठरोग से युक्त मनुष्य, गर्भिणी स्त्री, मधुमेह का रोगी और जलोदर वाले रोगी को आस्थापन बस्ति नहीं देनी चाहिये ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२३ ❖ अक्लिष्टदोषः = अदत्तोत्क्लेशन इति यावत् । क्षतोरस्कः = उरःक्षतवान् ।। १३८-१३९।। यहाँ 'अक्लिष्टदोषः' पद का 'उत्क्लेशजनक आहारादि द्वारा जिसके दोष बाहर निकलने के लिये उन्मुख न हुये हों' और 'क्षतोरस्कः' पद का 'उरःक्षत का रोगी' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३८-१३९।। वातव्याधावुदावर्त्ते वातासृग्विषमज्वरे । मूर्च्छा तृष्णोदरानिाहमूत्रकृच्छ्राश्मरीषु च ।।१४०।। वृद्ध्यसृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेषु निरूहणम् । शूलेऽम्लपित्ते हृद्रोगे योजयेद्विधिवद् बुधः ।।१४१।। वातसम्बन्धी व्याधि, उदावर्त्त, वातरक्त, विषम ज्वर, मूर्च्छा, तृष्णा, उदर रोग, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, अण्डवृद्धि, रक्तप्रदर, मन्दाग्नि प्रमेह, शूल, अम्लपित्त और हृद्रोग इन सबों में बुद्धिमान वैद्य को विधिपूर्वक निरूह बस्ति देनी चाहिये ।।१४०-१४१।। उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं स्निग्धं स्विन्नमभोजितम् । मध्याह्ने गृहमध्ये च यथायोग्यं निरूहयेत् ।। जो अधोवायु तथा मल-मूत्र को त्याग कर चुका हो, जो स्निग्ध तथा स्विन्न हो चुका हो एवं जो बिना भोजन किये हुये हो ऐसे मनुष्य को घर के अन्दर दो पहर के समय यथायोग्य निरूह बस्ति देनी चाहिये ।।१४२।। ❖ स्निग्धम् = स्वभ्यक्तम् । स्विन्नम् = उष्णाम्बुस्नापितम् ।।१४२।। यहाँ 'स्निग्ध' का 'स्नेह द्वारा जिसका स्नेहन हुआ हो' तथा 'स्विन्न' का 'गर्म जल से जिसे स्नान कराया गया हो' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१४२।। स्नेहबस्तिविधानेन बुधः कुर्यान्निरूहणम् ।।१४३।। जाते निरूहे च ततो भवेदुत्कटकासनः । तिष्ठेन्मुहूर्त्तमात्रन्तु निरूहागमनेच्छया ।।१४४।। बुद्धिमान् वैद्य स्नेहबस्ति के विधान से निरूहबस्ति दे और निरूहण हो जाने पर निरूह द्रव के बाहर निकालने की इच्छा से रोगी मुहूर्त्तमात्र उत्कटकासन (उकरूँ) बैठे ।।१४३-१४४।। ❖ अत्र मुहूर्त्तमात्रशब्देनैतदपि बोधितम् । निरूहप्रत्यागमनकालो मुहूर्त्तमात्रः ।।१४३-१४४।। यहाँ 'मुहूर्त्तमात्र' पद से यह समझना चाहिये कि जितने समय में निरूह द्रव बाहर निकलता है उतने समय का नाम मुहूर्त्तमात्र है ।।१४३-१४४।। अनायातं मुहूर्त्त तु निरूहं शोधनैर्हरेत् । निरूहैरेव मतिमाञ्क्षारमूत्राम्लसैन्धवैः ।।१४५।। यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः । लाघवं चोपजायेत सुनिरूहं तमादिशेत् ।।१४६।। मुहूर्त्त भर प्रतीक्षा करने पर यदि निरूह बस्ति में प्रयुक्त द्रव्य बाहर न निकले तो जवाखार, गोमूत्र, अम्ल, सेंधा नमक के निरूहण द्वारा निरूह बस्ति के द्रव्य को बाहर निकाले । जिस मनुष्य के क्रमानुसार मल, पित्त, कफ तथा वायु निकलते हैं तथा शरीर में लघुता मालूम होती है उस मनुष्य को सुनिरूह (भलीभांति निरूहण हुआ) कहते हैं ।।१४५-१४६।। यस्य स्याद्वस्तिरत्यल्पवेगो हीनमलानिलः । मूर्च्छाऽऽर्त्तिजाड्यारुचिमान्दुर्निहं तमादिशेत् ।।१४७।। जिस मनुष्य को बस्ति बहुत धीरे निकले, मल तथा तथा वायु बहुत कम निकले और जो मूर्च्छा, पीड़ा, जड़ता और अरुचि से युक्त हो उसे दुर्निह (खराब निरूहण हुआ) कहते हैं ।।१४७।। ❖ विविक्तता मनस्तुष्टिः स्निग्धता व्याधिनिग्रहः । आस्थापनस्नेहबस्त्योः सम्यग्दाने तुलक्षणम् ।।१४८।। दी हुई औषधियों का बाहर निकल जाना, मन की प्रसन्नता, स्निग्धता, व्याधिनिग्रह (रोग में कमी) ये सब आस्थापन तथा स्नेह बस्ति के भलीभाँति दिये जाने के लक्षण हैं ।।१४८।। ❖ विविक्तता = दत्तौषधनिःसरणम् ।।१४८।।
१०२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहां 'विविक्ता' का 'दी हुई ओषधियों का बाहर निकल जाना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ अनेन विधिना युञ्ज्यान्निरूहं बस्तिदानवित् । द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थ वा यथोचितम् ।। १४९ ।। सस्नेह एकः पवने पित्ते द्वौ पयसा सह । कषायकटुमूत्राद्याः कफेऽत्युष्णास्त्रयो हिताः ।। १५० ।। पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयूषरसैः क्रमात् । निरूढं भोजयित्वा च ततस्तमनुवासयेत् ।। १५१ ।। सुकुमारस्य वृद्धस्य बालस्य च मृदुर्हितः । बस्तिस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु तेषां हन्याद्बलायुषी ।। १५२ ।। दद्यादुत्क्लेशनं पूर्वं मध्य दोषहरं ततः । पश्चात्संशमनीयञ्च दद्याद्वस्तिं विचक्षणः ।। १५३ ।। बस्ति देने में चतुर वैद्य इस प्रकार से निरूह बस्ति दे, यदि उचित हो तो दूसरी बार, तीसरी बार और चौथी बार भी दे । वात रोग में स्नेह वाली एक बस्ति, पित्त रोग में दूध के साथ दो बस्ति तथा कफ रोग हो तो गर्म कषाय तथा कटु रसयुक्त पदार्थ तथा गोमूत्र आदि पदार्थों की तीन बस्ति देनी उत्तम होती है । पित्त, कफ तथा वायु से आक्रान्त हुये मनुष्य को क्रम से दूध की, मूँग के रस तथा मांसरस की वस्ति देनी चाहिये । जिसको निरूह बस्ति दी गई हो उसे भोजन के पश्चात् अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । सुकुमार शरीर वाले को, वृद्ध को तथा बालक को मृदु बस्ति हितकर है । यदि इन्हें तीक्ष्ण बस्ति दी जाय तो इनके बल तथा आयु का नाश होता है । चतुर वैद्य प्रथम उत्क्लेशन बस्ति तत्पश्चात् दोषहर बस्ति पुनः संशमनीय बस्ति दे ।। १४९-१५३।। अथोत्क्लेशनबस्तिमाह- एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा । हवुषाफलकल्कश्च बस्तिरुत्क्लेशनः स्मृतः ।। १५४।। उत्क्लेशन वस्ति-रेंड के बीज, मुलेठी, पीपल, सेंधानमक, वच और हाऊबेर के फल का कल्क, इनकी बस्ति को उत्क्लेशन (दोषों को बहिर्गमनोन्मुख करने वाली) बस्ति कहते हैं ।। १५४ ।। अथ दोषहरबस्तिमाह- शताह्वा मधुकं बिल्वं कौटजं फलमेव च । सकाञ्जिकः सगोमूत्रो बस्तिर्दोषहरः स्मृतः ।। दोषहर बस्ति-शतावरी, मुलेठी, बेल का गूदा, इन्द्रजौ इनको कांजी तथा गोमूत्र में पीस कर उससे जो बस्ति दी जाती है उसे दोषहर बस्ति कहते हैं ।। १५५ ।। अथ शमनबस्तिमाह- प्रियङ्गुर्मधुकं मुस्ता तथैव च रसाञ्जनम् । सक्षीरः शस्यते बस्तिर्दोषाणां शमनः स्मृतः ।। शमन बस्ति-फूल प्रियङ्गु, मुलेठी, नागरमोथा और रसौत इन सबको दूध में पीस कर जो बस्ति दी जाती है उसे संशमनीय बस्ति कहते हैं । इस बस्ति से दोषों का शमन होता है ।। १५६ ।। अथ लेखनबस्तिमाह- त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमायुतः । १ऊषकादिप्रतीवापैर्बस्तयो लेखनाः स्मृताः ।। १५७ ।। लेखन बस्ति-हरड़, बहेड़ा, आँवला के क्वाथ, गोमूत्र, शहद, जवाखार, ऊषकादि गणोक्त (खारी मिट्टी, तूतिया, हींग, दो प्रकार के कसीस, सेंधानमक, शिलाजीत) चूर्ण के प्रक्षेप युक्त जो बस्ति दी जाती है वह लेखन बस्ति कहलाती है ।। १५७।। ❖ ऊषकादिप्रतीवापाः=ऊषकादिगणविशेषचूर्णप्रक्षेपाः ।। १५७ ।। १. ऊषकादिगणस्तु-ऊषकस्तुत्थको हिङ्गुकाशीसद्वयसैन्धवम् । सशिलाजतु (वा.सू.अ. १५) ।
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२५ यहाँ 'ऊषकादिप्रतीवापाः' पद का 'ऊषकादि गणोक्त चूर्ण का प्रक्षेप' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५७॥ अथ बृंहणबस्तिमाह- बृहंणद्रव्यनिक्वाथैः कल्कैर्मधुरकैर्युताः । सर्पिर्मांसरसोपेता बस्तयो बृंहणाः स्मृताः ।। १५८ ।। बृंहणबस्ति—धातुओं के बढ़ाने वाले द्रव्यों के क्वाथों से तथा मधुर पदार्थों के कल्क, घी एवं मांलरस से जो बस्ति दी जाती है उसे बृंहण बस्ति कहते हैं। इस बस्ति से धातुओं की वृद्धि होती है ॥१५८॥ अथ पिच्छिलबस्तमाह- बदर्यैरावतीशेलुशाल्मलीपुष्पजाङ्कुराः । क्षीरसिद्धाः क्षौद्रयुक्ता नाम्ना पिच्छिलसंज्ञिताः ।। १५९ ।। अजोरभ्रैणरुधिरैर्युक्ता देया विचक्षणैः । मात्रा पिच्छिलवस्तीनां पलैर्द्वादशभिर्मता ।। १६० ।। पिच्छिलबस्ति—बेर, नारङ्गी, लिसोरा, सेमर के फूलों के अङ्कुर इनको दूध में पकाकर मधु डाल कर बकरा, भेड़ तथा काले मृग के रक्त के साथ जो बस्ति दी जाती है उसे पिच्छिल बस्ति कहते हैं। पिच्छिल बस्ति की मात्रा बारह पल की कही गई है ॥१५९-१६०॥ ❖ अजः=छागः, उरभ्रः=मेषः, एणः=कृष्णमृगः ।। १५९-१६०।। यहाँ 'अज' से 'बकरा', 'उरभ्र' से 'भेड़ा', 'एण' से 'काले मृग' का बोध करना चाहिये ॥ अथ निरूहमात्राविधिमाह- दत्त्वादौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतिद्वयम् । विनिर्मथ्य ततो दद्यात्स्नेहस्य प्रसृतित्रयम् ।।१६१।। एकीभूते ततः स्नेहे कल्कस्य प्रसृतिं क्षिपेत् । सम्मूर्च्छिते कषायन्तु चतुःप्रसृतिसम्मितम् ।। १६२ ।। गृह्णीयाञ्च तदा वाऽल्पमन्ते द्विपसृतोन्मितम् । क्षिप्त्वा विमथ्य दद्याञ्च निरूहं कुशलो भिषक् ।।१६३।। एवं प्रकल्पितो बस्तिर्द्वादशप्रसृतिर्भवेत् । वाते चतुष्पलं क्षौद्रं दद्यात् स्नेहस्य षट्पलम् ।। १६४ ।। पित्ते चतुष्पलं क्षौद्रं स्नेहं दद्यात्पलत्रयम् । कफे तु षट्पलं क्षौद्रं क्षिपेत् स्नेहं चतुष्पलम् ।।१६५।। निरूह बस्ति की मात्रा—पहले एक तोला सेंधा नमक लेकर दो प्रसृति (१६ तोला) मधु डालकर खूब घोटे। इसके बाद उसमें तीन प्रसृति (२४ तोला) स्नेह देकर सबको मर्दन करके खूब मिलाले जब सब एक में मिल जाय तो उसमें एक प्रसृति (८ तोला) ओषधि कल्क डालकर घोटे फिर चार प्रसृति (३२ तोला) क्वाथ और उसके बाद दो प्रसृति (१६ तोला) प्रक्षेप्य द्रव्य का उत्तम चूर्ण डालकर तथा सबको भलीभाँति मर्दन, कर विद्वान् वैद्य निरूह बस्ति दे। इस प्रकार तैयार की हुई बस्ति परिमाण में बारह प्रसृति (९६ तोला) होती है। विशेष वक्तव्य यह है कि—वातरोग में चार पल (१६ तोला) मधु और छः पल (२४ तोला) स्नेह डाले। पित्तजन्य विकार में चार पल (१६ तोला) मधु और तीन पल (१२ तोला) स्नेह डाले। यदि कफसम्बन्धी रोग हो तो छः पल (२४ तोला) मधु और चार पल (१६ तोला) स्नेह डालना चाहिये ॥१६१-१६५॥ अथ मधुतैलकबस्तिमाह- एरण्डक्वाथतुल्यांशं मधुतैलं पलाष्टकम् । शतपुष्पापलार्द्धेन सैन्ध
! In Devanagari, 'द्ग' is written as 'द' with 'ग' hanging below it! * Wait, does it have 'ग' hanging below? * Yes, 'द्' with a little 'ग' below: 'द्ग'. * Wait, look at: 'मुद्गप्रवेशयोग्यञ्च' - yes, a mung bean / green gram passing through! Mudga-pravesha-yogyam! * Wait, let's look at the Hindi: "सरसों निकलने भर छेद वाली" was for men (सर्षपनिर्गमम्). For women, the text doesn't finish the Hindi translation on this page (it cuts off at "बैठाकर तथा"). * So the Sanskrit is "मुद्गप्रवेशयोग्यञ्च" (mudgapraveshayogyam cha).
* Let's check line 22:
* "स्निग्धया मेढ्रमार्गे तु तत्रो नेत्रं नियोजयेत्। शनैः शनैर्घृताभ्यक्तं मेढ्ररन्ध्राङ्गुलानि षट् ।।१७६।।"
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अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२७ स्नेह लगी हुई सलाई से उसके मूत्रमार्ग को स्वच्छ करके घृत लगी हुई छः अङ्गुल की नली लिङ्ग के छिद्र में डाले। तत्पश्चात् बस्ति को दबाकर धीरे से नली को बाहर निकाल ले तत्पश्चात् स्नेह के बाहर निकल आने पर पूर्वोक्त स्नेह बस्ति की भाँति उपचार करना हितकर है। स्त्रियों की योनि में उत्तरबस्ति की क्रिया करनी हो तो कनिष्ठिका अङ्गुली के समान मोटी और जिससे मूँग निकल जाय उतने छिद्र वाली दश अङ्गुल की सूक्ष्म नली लेकर योनि के अन्दर चार अङ्गुल डाले ॥१७२-१७८॥ द्व्यङ्गुलं मूत्रमार्गे च सूक्ष्मं नेत्रं नियोजयेत्। मूत्रकृच्छ्रविकारेषु बालानां त्वेकमङ्गुलम् ॥१७९॥ शनैर्निष्कम्पमाधेयं सूक्ष्मं नेत्रं विचक्षणैः। मालतीपुष्पवृन्ताभं नेत्रमित्युदितं पुनः ॥१८०॥ यदि मूत्रकृच्छ्र रोगवाली स्त्री के मूत्रमार्ग में डालनी हो तो दो अङ्गुल डाले और बालकों के मूत्रकृच्छ्र विकार में इससे भी सूक्ष्म हाथ को काँपने से रोक धीरे-धीरे लिङ्ग के भीतर एक अङ्गुल डाले। यह नली मालती के फूल की डंडी के समान होनी चाहिये, ऐसा ही ऊपर कह आये हैं ॥१७९-१८०॥ योनिमार्गेषु नारीणां स्नेहमात्रा द्विपालिकी। मूत्रमार्गे पलोन्माना बालानां च द्विकार्षिकी ।। उत्तानायै स्त्रियै दद्यादूर्ध्वजान्वै विचक्षणः। अप्रत्यागच्छति भिषग् बस्तावृत्तरसंज्ञिते ॥१८२॥ भूयो बस्तिं विदध्याच्च संयुक्तं शोधनैर्गुणैः। फलवर्त्तिं विदध्याद् वा योनिमार्गे दृढां भिषक् ॥१८३॥ सूत्रैर्विनिर्मितां स्निग्धां शोधनद्रव्यसंयुताम् ॥१८४॥ स्त्रियों के योनिमार्ग में स्नेह की मात्रा आठ तोले की और मूत्रमार्ग में चार तोले की है। बालकों के लिङ्ग में दो ताले की मात्रा लेनी चाहिये। विद्वान् वैद्य स्त्री को उत्तान (चित्त) लेटाकर घुटने को ऊपर करके बस्ति दे, यदि उत्तर बस्ति बाहर न निकले तो वैद्य शोधन गुण वाली दूसरी बस्ति दे अथवा योनिद्वार में शोधन पदार्थों को मिलाकर सूत से बनी चिकनी दृढ़ फलवर्त्ति प्रवेश करे ॥१८१-१८४॥ दह्यमाने तथा बस्तौ दद्याद्बस्तिं विशारदः। क्षीरिवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन वा ।।१८५।। जिस स्थान में बस्ति दी गई हो हो उसमें दाह हो तो बुद्धिमान वैद्य दूध वाले वृक्षों के क्वाथ से अथवा शीतल जल से दूसरी बस्ति दे ॥१८५॥ ❖ दह्यमाने बस्तौ=यस्मिन् स्थाने बस्तिर्दत्तस्तस्मिन् दह्यमाने ।।१८५।। यहाँ 'दह्यमाने बस्तौ' इन पदों का 'जिस स्थान में बस्ति दी गई हो उसमें दाह हो तो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८५॥ बस्तिः शुक्ररुजः पुंसां स्त्रीणामार्त्तवजा रुजः । हन्यादुत्तरबस्तिस्तु नोचितो मेहिने क्वचित् ॥१८६॥ सम्यग्दत्तस्य लिङ्गानि व्यापदः क्रम एव च । बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य समानाः स्नेहबस्तिना ॥१८७॥ उत्तरबस्ति-पुरुषों के शुक्रसम्बन्धी रोगों को तथा स्त्रियों के ऋतु-सम्बन्धी दोषों को नष्ट करता है, किन्तु यह उत्तरबस्ति प्रमेह के रोगी को देना कभी उचित नहीं है। उत्तरबस्ति से भलीभाँति देने के लक्षण, उत्तम रीति से न देने से उत्पन्न उपद्रव अन्य समस्त क्रम स्नेहबस्ति के समान ही जानने चाहिये ॥१८६-१८७॥ अथ फलवर्त्तिविधिमाह- घृताभ्यक्ते गुदे क्षिप्ता श्लक्ष्णा स्वाङ्गुष्ठसन्निभा। मलप्रवर्त्तिनी वर्त्तिः फलवर्त्तिश्च सा स्मृता ।।१८८।। फलवर्त्ति की विधि-मल निःसरण के लिये गुदा में घी चुपड़ कर रोगी के अंगूठे के समान मोटी और चिकनी वर्त्ति प्रविष्ट-करे इसको वैद्यजन फलवर्ति कहते हैं ॥१८८॥
१०२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ नावनम् । अथ नस्यग्रहणविधिमाह- नस्यं तत्कथ्यते धीरैर्नासाग्राह्यं यदौषधम् । नावनं नस्यकर्मेति तस्य नामद्वयं मतम् ॥१९८९॥ नस्यग्रहण की विधि-नासिका से जो ग्राह्य ओषधि होती है उसको बुद्धिमान लोग नस्य कहते हैं। इसके नावन तथा नस्यकर्म ये दो नाम हैं ॥१९८९॥ ❖ नस्यकर्म=नासिकायां कर्म चिकित्सा येन तद् तस्यकर्म ॥१९८९॥ इससे नाक की चिकित्सा होती है इस कारण इसको नस्यकर्म कहते हैं ॥१९८९॥ नस्यभेदो द्विधा प्रोक्तो रेचनं स्नेहनं तथा । रेचनं कर्षणं प्रोक्तं स्नेहनं बृंहणं मतम् ॥१९९०॥ रेचन तथा स्नेहन ये दोनों भेद नस्य के कहे गये हैं। जिस नस्य से अन्तःस्थ पदार्थों की हीनता हो वह रेचन तथा जिस नस्य से भीतर के पदार्थों की वृद्धि की जाती है वह स्नेहन कहलाती है ॥ कफपित्तानिलध्वंसि पूर्वमध्यापराह्नके । दिनस्य गृह्यते नस्यं रात्रावप्युत्कटे गदे ॥१९९१॥ यदि कफ को नष्ट करना हो तो पूर्वाह्न में, पित्त को नष्ट करना हो तो मध्याह्न में तथा बात को नष्ट करना हो तो अपराह्न में नस्य देना चाहिये । यदि रोग भयङ्कर हो तो रात्रि में भी नस्य देना चाहिये ॥१९९१॥ ❖ दिनस्य त्रिधा विभक्तस्य पूर्वभागादौ ॥१९९१॥ यहाँ वर्त्तमान दिन के तीन भाग क्रम से पूर्वाह्न आदि समझना चाहिये ॥१९९१॥ नस्यं त्यजेद्भोजनान्ते दुर्दिने चापतर्पितः । तथा नवप्रतिश्यायी गर्भिणी गरदूषितः । अजीर्णी दत्तबस्तिश्च पीतस्नेहोदकासवः ॥१९९२॥ क्रुद्धः शोकाभिभूतश्च तृषार्त्तो वृद्धबालकौ । वेगावरोधि श्रान्तश्च स्नातुकामश्च वर्जयेत् ॥१९९३॥ भोजन करने के पश्चात् तथा मेघ से घिरे दिन में नस्य लेना त्याग कर दे, एवं लंघन किए हुए, नवीन प्रतिश्याय के रोगी, गर्भिणी स्त्री, गर (कृत्रिम विष) से दूषित हुए, अजीर्ण रोगी, जिसको बस्ति दी गई हो, जिसने स्नेह, जल अथवा अथवा आसव तुरन्त पिया हो, क्रुद्ध, शोकाकुल, प्यासे, वृद्ध, बालक, मल-मूत्र के वेग को रोकने वाले, परिश्रमी, जिसे स्नान करने की इच्छा हो ऐसे लोगों को नस्य देना वर्जित है ॥१९९२-१९९३॥ नस्यमिति शेषः ॥१९९२-१९९३॥ यहाँ 'नस्य' पद अन्तिम श्लोक में यद्यपि नहीं हैं तथापि ऊपर से योग्यतावश लाकर अर्थ किया गया है ॥१९९२- १९९३॥ अष्ठवर्षस्य बालस्य नस्यकर्म समाचरेत् । अशीतिवर्षादूर्ध्वञ्च नावनं नैव दीयते ॥१९९४॥ बालक जब तक आठ वर्ष का न हो तब तक उसको नस्य नहीं देना चाहिये तथा अस्सी वर्ष के ऊपर अवस्था वाले वृद्ध को भी नस्य नहीं देना चाहिये ॥१९९४॥ अथ रेचनस्य मात्रामाह- अथ वैरेचनं नस्यं ग्राह्यं तैलः सुतीक्ष्णकैः । तीक्ष्णं भेषजसिद्धैर्वा स्नेहैः क्वाथै रसैस्तथा ॥१९९५॥ रेचन नस्य की मात्रा-तीक्ष्ण तैलों से, तीक्ष्ण ओषधियों द्वारा पकाये हुये स्नेहों से, क्वाथों तथा रसों से रेचन नस्य देना चाहिये ॥१९९५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२९ अथ रेचननस्यविधिमाह- नासिकारन्ध्रयोरष्टौ षट् चत्वारश्च बिन्दवः । प्रत्येकं रेचनं योग्यं मुख्यमध्याल्पमात्रया ।।१९६।। रेचन नस्य की विधि-नासिका के दोनों छिद्रों में रेचन नस्य देना चाहिये । प्रत्येक छिद्र में आठ-आठ बूँद की मात्रा उत्तम, छः छः बूँद की मात्रा मध्यम तथा चार-चार बूँद की मात्रा कनिष्ठ होती है ।।१९६।। अथ नस्यौषधप्रमाणमाह- नस्यकर्मणि दातव्यं शाणैकं तीक्ष्णमौषधम् । हिङ्गु स्याद्यवमात्रन्तु माषैकं सैन्धवं मतम् ।।१९७।। क्षीरं चैवाष्टशाणं स्यात्पानीयञ्च त्रिकार्षिकम् । कार्षिकं मधुरद्रव्यं नस्यकर्मणि योजयेत् ।। नस्य औषध का प्रमाण-नस्य कर्म में तीक्ष्ण ओषधि एक शाण (४ माशे), हींग यवभर, सेंधा नमक एक माशा, दूध पाठ शाण (३२ माशे), पानी तीन तोले और मधुर द्रव्य एक तोला लेना चाहिये ।।१९७-१९८।। अथ रेचननस्यस्य भेदद्वयमाह- अवपीडः प्रधमनं द्वौ भेदावपरौ स्मृतौ । शिरोविरेचनस्याथ तौ तु देयौ यथायथम् ।।१९९।। रेचन नस्य के भेद-रेचन नस्य के अवपीड तथा प्रधमन नामक दो भेद हैं । शिरोविरेचन के लिये योग्य रीति से इन भेदों का उपयोग करना चाहिये ।।१९९।। अथ रेचनस्य भेदद्वयस्य लक्षणमाह- कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निःसृतो रसः । सोऽवपीडः समुद्दिष्टस्तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ।।२००।। षडङ्गुला द्विवक्त्रा या नाडी चूर्णं तथा धमेत् । तीक्ष्णं कोलमितं वक्त्रवातैः प्रधमनं हितम् ।।२०१।। रेचन नस्य के भेदों के लक्षण-जिसके साथ तीक्ष्ण पदार्थ संयुक्त हों ऐसी ओषधि का कल्क करके उसको निचोड़ कर जो रस निकाला जाता है वह अवपीड और छः अङ्गुल लम्बी, दो मुख वाली नली में आधा तीक्ष्ण चूर्ण भर कर मुख से फूक कर जो चूर्ण नाक में चढ़ाया जाता है, उसको प्रधमन कहते हैं ।।२००-२०१।। अथ रेचनस्नेहनस्योपयोगमाह- ऊर्ध्वजत्रुगते रोगे कफजे स्वरसंक्षये । अरोचके प्रतिश्याये शिरःशूले च पीनसे ।।२०२।। शोफापस्मारकुष्ठेषु नस्यं वैरेचनं हितम् । भीस्त्री कृशबालानां नस्यं स्नेहेन शस्यते ।।२०३।। गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे । मनोविकारे कृमिषु पूज्यते चावपीडनम् ।।२०४।। अत्यन्तोत्कटदोषेषु विसंज्ञेषु च दीयते । चूर्णं प्रधमनं धीरैस्तद्धि तीक्ष्णतरं यतः ।।२०५।। रेचन तथा स्नेहन नस्य के उपयोग-ऊर्ध्व जत्रुगत अर्थात् गले से ऊपर के रोगों में, कफ से उत्पन्न रोगों में, स्वरक्षय (गला बैठ जाने) में एवं अरुचि, प्रतिश्याय (जुखाम), शिरःशूल, शोथ, अपस्मार तथा कुष्ठ रोगों में रेचन नस्य हितकर है । डरने वाले व्यक्ति, स्त्री, कृश मनुष्य और बालक इन सबों को स्नेह से नस्य देना हितकर होता है । गले के रोग में, सन्निपात में, निद्रा में, विषमज्वर में, मनोविकार (उन्मादादि) में और कृमि रोग में अवपीडन नस्य देना उत्तम है । अत्यन्त उत्कट दोषों में, जिनमें ज्ञान हो जाय ऐसे रोगों में धीर वैद्य चूर्ण का प्रधमन नस्य दे क्योंकि यह अत्यन्त तीक्ष्ण होता है ।।२०२-२०५।। अथ वैरेचननस्यौषधिगुणानाह- नस्यं स्याद् गुडशुण्ठीभ्यां पिप्पलीसैन्धवेन वा । जलपिष्टेन कर्णाक्षिनासामूर्द्धभवा गदाः ।।२०६।। मन्याहनुगलोद्भूता नश्यन्ति भुजपृष्ठजाः । मधूकसारकृष्णाभ्यां वचामरिचसैन्धवैः ।।२०७।। नस्यं कोष्णाम्भसा पिष्टं दद्यात्संज्ञाप्रबोधनम् । अपस्मारे तथोन्मादे सन्निपातेऽपतन्त्रके ।।२०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रेचन ओषधियों के गुण-सोंठ का चूर्ण तथा गुण को एकत्र कर अथवा पीपल अथवा सेंधा नमक को पानी में पीस कर यदि नस्य दे तो कान, नेत्र, नासिका, सिर, गर्दन, दाढ़, गला, बाहु और पीठ के रोग नष्ट हो जाते हैं । महुआ का रस, पीपल, वच, मिरिच और सेंधा नमक को थोड़े-थोड़े गरम जल से पीसकर नस्य देने से मृगी, उन्माद, सन्निपात तथा अपतन्त्रक नष्ट होता है ॥२०६-२०८॥ अथ रेचननस्यस्यापरविधिमाह- सैन्धवं श्वेतमरिचं सर्षपाः कुष्ठमेव च। बस्तमूत्रेण संपिष्टं नस्यं तन्द्रानिवारणम् ॥२०९॥ रेचन नस्य का दूसरा प्रकार-सेंधा नमक, श्वेत मरिच (सहजने के बीज), सरसों तथा कूठ को बकरे के मूत्र में पीसकर नस्य देने से तन्द्रा नष्ट होती है ॥२०९॥ अथ प्रधमननस्यस्यौषधिमाह- रोहितस्य च पित्तेन भावितं मरिचं वचा। कट्फलं चेति तच्चूर्णं देयं प्रधमनं बुधैः ॥२१०॥ प्रधमन नस्य की ओषधियाँ-मिर्च, वच तथा कायफल का चूर्ण करके रोहू मछली के पित्त की भावना देकर नली द्वारा प्रधमन नस्य देना चाहिये ॥२१०॥ अथ बृंहणस्नेहननस्यस्य कल्पनामाह- अथ बृंहणनस्यस्य कल्पना कथ्यतेऽधुना। मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्वौ भेदौ स्नेहने मतौ ॥२११॥ मर्शस्य तर्पणी मात्रा मुख्या शाणैः स्मृताऽष्टभिः । मध्यमा तु चतुःशाणैर्हीना शाणमिता मता ॥२१२॥ एकैकस्मिंस्तु मात्रयं देया नासापुटे बुधैः ॥२१३॥ स्नेहननस्य की कल्पना-स्नेहननस्य के मर्श और प्रतिमर्श दो भेद होते हैं । प्रत्येक नासापुट में आठ शाण (३२ माशा) मर्श डाली जाय तो यह मर्श की मात्रा उत्तम होती है एवं चार शाण (१६ माशे) की मात्रा मध्यम तथा एक- एक शाण (४ माशे) की मात्रा कनिष्ठ मात्रा कही जाती है ॥२११-२१३॥ मर्शस्य द्वित्रिवेलां वा वीक्ष्य दोषबलाबलम् । एकान्तरं द्वयन्तरं वा नस्यं दद्याद्विचक्षणः ॥२१४॥ बुद्धिमान वैद्य दोषों का बलाबल देख कर एक दिन में दो-तीन बार या एक दिन के अन्तर से अथवा दो दिन के अन्तर से मर्श नस्य का उपयोग करावे ॥२१४॥ ❖ एकान्तरम्=एकं दिनमन्तरं नस्यशून्यं यत्र तदेकान्तरम् ॥२१४॥ यहाँ 'एकान्तरम्' पद का 'एक दिन अन्तर नस्य देने से शून्य है जिसमें ऐसा नस्य अर्थात् एक दिन के अन्तर से नस्य' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१४॥ त्र्यहं पञ्चाहमथवा सप्ताहं वा सुयन्त्रितः ॥२१५॥ तीन या पाँच अथवा सात दिन तक बराबर सावधानी से नस्य का उपयोग करे ॥२१५॥ ❖ अथवा त्र्यहम्=त्रीण्यहानि यावत्, प्रतिदिनम् । एवं पञ्चाहं सप्ताहं च । सुयन्त्रितः=सावधानः । यथा उच्छिक्कं न भवति ॥२१५॥ यहाँ 'त्र्यहम्' पद का 'तीन दिन तक प्रतिदिन (बराबर)' और इसी भाँति 'पञ्चाह और सप्ताह' का भी 'पाँच या सात दिन तक प्रतिदिन' यह अर्थ समझना चाहिये । 'सुयन्त्रितः' का 'सावधानी से नस्य दे कि जिसमें छींक इत्यादि न आवे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१५॥
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०३१ मर्शे शिरोविरेके च व्यापदो विविधाः स्मृताः। दोषोत्क्लेशात्क्षयाच्चैव विज्ञेयास्ता यथाक्रमम् ।। दोषोत्क्लेशनिमित्तासु युञ्ज्याद्वमनशोधनम् ।।२१६।। मर्श नस्य देने के समय यदि स्थानभ्रष्ट दोष कुपित हुये हों तो उससे और शिरो-विरेचनार्थ रेचन नस्य के उपयोगसे, धात्वादि के क्षय से विविध प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। यदि स्थान-भ्रष्ट दोष के प्रकोप से रोग उत्पन्न हो जाय तो वमनरूप शोधन का प्रयोग करना उचित है ॥२१६॥ ❖ वमनशोधनम्=वमनरूपं शोधनम् ।।२१६।। यहाँ 'वमनशोधनम्' का 'वमनरूप शोधन' अर्थ समझना चाहिये ॥२१६॥ अथ क्षयनिमित्तासु यथास्वं बृंहणं हितम् । शिरोनासाऽक्षिरोगेषु सूर्यावर्त्तार्द्धभेदके ।।२१७।। दन्तरोगे बले हीने मन्याबाह्वंसजे गदे । मुखशोषे कर्णनादे वातपित्तगदे तथा ।।२१८।। अकालपलिते चैव केशश्मश्रुप्रपातने । पूज्यते बृंहणं नस्यं स्नेहैर्वा मधुरद्रवैः ।।२१९।। यदि धात्वादि के क्षय से रोग उत्पन्न हुये हों तो तत्तद्धातुवर्ध बृंहण (स्नेहन) नस्य का उपयोग हितकर होता है । शिरोविकार, नासिका के रोग, नेत्ररोग, सूर्यावर्त, आधा शीशी, (अधकपारी), दन्तरोग, बलक्षय, गर्दन, भुजा तथा कन्धा इनके रोगों में, मुखशोष, कर्णनाद, वातपित्त-सम्बन्धी विकार, अकाल में बालों का श्वेत हो जाना एवं जिसमें दाढ़ी-मूंछ बिल्कुल गिर पड़े ऐसे रोगों में स्नेहों से अथवा मधुर पदार्थों के रस से बृंहण (स्नेहन) नस्य देना उत्तम है ॥ अथ बृंहणनस्यस्य विधिमाह- सशर्करं पयःपिष्टं धृष्टमाज्येन कुङ्कुमम्। नस्यप्रयोगतो हन्याद्वातरक्तभवा रुजः ।। भ्रूशङ्खाक्षिशिरःकर्णसूर्यावर्त्तार्द्धभेदकान् ।।२२०।। बृंहण नस्य की विधि-शर्करा संयुक्त दूध में घी से भुनी केशर को पीस कर नस्य देने से वातरक्तजन्य पीड़ा नष्ट होती है । इसी प्रकार भौंह, कपाल, नेत्र, मस्तक तथा कान के रोग, सूर्यावर्त तथा आधा शीशी (अधकपारी) ये भी नस्य से नष्ट होते हैं ।।२२०।। नस्यं स्यादणुतैलेन तथा नारायणेन वा । माषादिना वा सर्पिर्भिस्तत्तद्भेषजसाधितैः ।।२२१।। अणु तेल, नारायण तेल, माषादि तेल अथवा तत्तद्रोगनाशक ओषधियों से पकाये हुये घी से भी बृंहण नस्य देना चाहिये ॥२२१॥ ❖ अणुतैलमुक्तं सुश्रुतेन । तद्यथा-'तिलपिपीडनोपकरणकाष्ठान्याहृत्य यैरनल्पकालं तिलाः परिपीडितास्तान्यणूनि खण्डशः कल्पयित्वा उलूखले संकुट्य कटाह्ये पानीये वाप्लाव्य क्काथयेत् ततस्तैलं निःसरित तत्तैलं शीतलं हस्तेन जलान्निःसार्य वातघ्नौषधकल्केन पचेत् । तद्गुणतैलमिति । तद्वातरोगहरम्' इति ।।२२१।। अणुतैल सुश्रुत में इस प्रकार कहा है-जिससे बहुत दिनों तक तेल पेरा गया हो ऐसे तेल पेरने के कोल्हू के लकड़ी को लाकर उसके सूक्ष्म-सूक्ष्म टुकड़े काट कर ओखली में कूट ले और पानी से भरी कड़ाही में डाल कर आँच पर चढ़ा दे जब उससे तेल निकले तो उस तेल को हथेली से निकाल ले तत्पश्चात् वातनाशक ओषधियों के कल्क के साथ उसे पकावे इसको अणुतैल कहते हैं, यह वातसम्बन्धी रोगों को नष्ट करता है ॥२२१॥ अथ नस्यस्यान्यं विधिमाह- तैलं कफे स्याद्वाते च केवल वाते च केवल पवने वसा । दयान्मस्य सदा पित्ते मज्जानमेव च ॥२२२॥ माषात्मगुप्तारास्नाभिर्बलारुबुकैरहिषैः । कृतोऽश्वगन्धया क्वाथो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः ।।२२३।। कोष्णो नस्यप्रयोगेण पक्षाघातं सकम्पनम्। जयेदर्दितवातञ्च मन्यास्तम्भावबाहुकौ ।।२२४।।
१०३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य का दूसरा प्रकार-कफ, वातसम्बन्धी रोगों में तेल और केवल वात रोग में वसा का नस्य देना चाहिये। पित्त रोग हो तो सर्वदा घी और मज्जा का नस्य देना चाहिये। उड़द, केवाँच के बीज, रास्ना, बला, एरण्ड की जड़, रोहिष तृण और असगन्ध का क्वाथ करके उससे हींग तथा सेंधा नमक डालकर कुछ गरम रहते हुए नस्य देने से कम्पसहित पक्षाघात (अर्द्धाङ्गवात), अर्दित (लकवा), मन्यास्तम्भ और अवबाहुक रोग नष्ट हो जाते हैं ॥२२२-२२४॥ अथ प्रतिमर्शस्य मात्राविषये आह- प्रतिमर्शस्य मात्रा तु द्वित्रिबिन्दुमिता मता। प्रत्येकशो नासिकया स्नेहेनेति विनिश्चितम् ।।२२५।। स्नेहे ग्रन्थिद्वयं यावन्निमग्ना चोद्धृता ततः। तर्जनी यं स्रवेद्विन्दुं सा मात्रा बिन्दुसंज्ञिता ।।२२६।। एवंविधैर्बिन्दुसङ्गैरष्टाभिः शाण उच्यते। स देयो मर्शनस्येषु प्रतिमर्शो द्विबिन्दुकः ।।२२७।। प्रतिमर्श की मात्रा-प्रत्येक नासापुट में स्नेह की दो, तीन बूँद डाले इसको प्रतिमर्श कहते हैं। तर्जनी अंगुली को स्नेह में दो पोर तक डुबो कर निकाल ले, उस अंगुली से जो बूंद टपके वह बिन्दुरूप मात्रा कहलाती है। इसी प्रकार आठ बूँदों से शाण नामक मात्रा होती है जिसका मर्श संशक नस्य में उपयोग होता है। दो-दो बूँद की मात्रा जिस नस्य में दी जाय वह प्रतिमर्श कहलाता है ॥ अथ प्रतिमर्शस्य समयमाह- समयाः प्रतिमर्शस्य बुधैः प्रोक्ताश्चतुर्दश । प्रभाते दन्तकाष्ठान्ते गृहान्निर्गमने तथा ।।२२८।। व्यायामाध्वव्यवायान्ते विण्मूत्रान्तेऽञ्जने कृते। कवलान्ते भोजनान्ते दिवास्वप्नोत्थिते तथा ।। वमनान्ते तथा सायं प्रतिमर्शः प्रयुज्यते ।।२३०।। प्रतिमर्श का समय-विद्वानों ने प्रतिमर्श नस्य देने के निम्नलिखित चौदह समय कहे हैं- (१) प्रभात काल, (२) दतौन के पश्चात् (३) घर से बाहर निकलते समय, (४) व्यायाम करने के बाद, (५) मार्ग चलकर आने के पश्चात्, (६) मैथुन के बाद, (७) मल त्यागने के पश्चात्, (८) मूत्र के पश्चात्, (९) अञ्जन लगाने के पश्चात्, (१०) कवल खाने के पश्चात्, (११) भोजन के पश्चात्। (१२) दिन में सोने के पीछे (१३) वमन करने के पीछे और (१४) सायंकाल ॥२२८-२३०॥ ईषदुच्छिक्कनात्स्नेहो यथा वक्त्रं प्रपद्यते। नस्ये निषिक्तं तं विद्यात्प्रतिमर्शप्रमाणतः ।।२३१।। उच्छिष्टं न पिबेन्नैव निष्ठीवेन्मुखमागतम् ।।२३२।। कुछ छींक आजाने पर नाक में डाला हुआ पदार्थ यदि मुख में आजाय तो जानना चाहिये कि प्रतिमर्श की उचित मात्रा हो चुकी है। नाक से मुख में आये हुए पदार्थ को पीना नहीं चाहिये बल्कि तुरन्त थूक देना चाहिये ॥२३१-२३२॥ ❖ प्रमाणतः=मात्रायुक्तम्। उच्छिष्टम्=नस्यावशिष्टम् ।।२३१-२३२।। यहाँ 'प्रमाणतः' पद का 'उचित मात्रा हो चुकी है' और 'उच्छिष्टम्' पद का 'नस्य लेने पर नाक में बचा हुआ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२३१-२३२॥ अथ प्रतिमर्शस्य विषयान् गुणांश्चाह- क्षीणे तृष्णाऽऽस्यशोषार्त्ते बाले वृद्धे च पूज्यते । प्रतिमर्शात्न जायन्ते रोगाश्चैवोर्ध्वजत्रुजाः । बलीपलितनाशश्च बलमिन्द्रियजं भवेत् ।।२३३।। प्रतिमर्श के विषय तथा गुण-क्षीण, प्यास तथा मुखशोष से व्याकुल रोगी, बालक तथा वृद्ध को प्रतिमर्श हितकर होता है। प्रतिमर्श के उपयोग करते रहने से ऊर्ध्व जत्रुगत रोग नहीं उत्पन्न होते, देह में झुर्रियों का पड़ना तथा पलित का नाश होता है और इन्द्रियों की शक्ति उत्तम होती है ॥
अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०३३ बिभीतनिम्बौ गाम्भारी शिवा शेलुश्च काकिनी । एकैकतैलनस्येन पलितं नश्यति ध्रुवम् ।।२३४।। बहेड़ा, नीम, खंभार, हरड़, लिसोड़ा और मालकांगनी में से हर एक पदार्थ के तेल का नस्य लेने के अभ्यास से अवश्य पलित (अकाल में बालों का श्वेत होना) नष्ट हो जाता है ।।२३४।। अथ नस्यविधिं वक्ष्ये नस्यग्रहणहेतवे । देशे वातरजोमुक्ते कृतदन्तनिघर्षणम् ।।२३५।। विशुद्धं धूमपानेन स्विन्नभालगलं तथा । उत्तानशायिनं किञ्चित्प्रलम्बशिरसं नरम् ।।२३६।। आस्तीर्णहस्तपादञ्च वस्त्राच्छादितलोचनम् । समुन्नामितनासाग्रं वैद्यो नस्येन योजयेत् ।। नस्य की सामान्य विधि-वायु तथा धूल से रहित प्रदेश में दतौन कराने के पश्चात्, धूम्रपान करने से विशुद्ध होने के पीछे, कपाल तथा गले को स्वेदित कराने के बाद चित्त सुला कर मस्तक को कुछ नीचा कर दे तथा हाथ और पैरों को लम्बा फैलवा दे, तत्पश्चात् नेत्रों को वस्त्र से ढक कर नाक की नोक को ऊँची करके वैद्य रोगी को नस्य देवे ।।२३५-२३७।। कोष्णोनाच्छिन्नधारेण हेमतारादिशुक्तिभिः । शुक्त्या वा यन्त्रयुक्त्वा वा प्लोतैर्वा नस्यमाचरेत् ।।२३८।। सुवर्ण अथवा चाँदी आदि की चमची या सींप या किसी यन्त्र से या कपड़े अथवा रूई के फोहे से बीच में धार न टूटे इस प्रकार कुछ गर्म नस्य नाक में डाले ।।२३८।। ❖ प्लोतैर्वस्त्रैस्तदुपलक्षितैस्तूलैरपि ।।२३८।। यहाँ 'प्लोतैः' पद का 'कपड़े अथवा उससे उपलक्षित रूई के फोहे से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२३८।। नस्येष्वासिच्यमानेषु शिरो नैव प्रकम्पयेत् । न कुप्येन्न प्रभाषेत नोच्छिक्केन्न हसेत्तथा ।। एतैर्हि विहितः स्नेहो नैवान्तं सम्प्रपद्यते । ततः कासप्रतिश्यायशिरोऽक्षिगदसम्भवः ।।२४०।। नस्य जिस समय नाक में डाला जाता है उस समय रोगी को शिर हिलाना, क्रोध करना, किसी से बोलना, छींकना तथा हँसना वर्जित है। क्योंकि ऐसा करने से नस्य भीतर नहीं पहुँचता है और कास, प्रतिश्याय, शिरःशूल तथा नेत्रपीड़ा उत्पन्न हो जाती है ।।२३९-२४०।। शृङ्गाटकमभिव्याप्य स्थापयेन्न गिलेद् द्रवम् । पञ्च सप्त दशैव स्युर्मात्राः स्नेहस्य धारणे ।।२४१।। उपविश्याथ निष्ठीवेन्नासावक्त्रागतं द्रवम् । वामदक्षिणपार्श्वाभ्यां निष्ठीवेत्संमुखं न हि ।।२४२।। नस्य को शृङ्गाटक पर्यन्त पहुँच जाने तक स्थिर रखे जिससे नस्य निकल न जाय। पाँच, सात, अथवा दश गुरु अक्षरों के उच्चारण काल तक नस्य को धारण करना चाहिये। तत्पश्चात् बैठ कर नाक से मुख में आये हुये द्रव को दाहिनी अथवा बाईं ओर थूक दे, किन्तु सामने न थूके ।। अथ नस्यदानान्तरमकर्त्तव्यानि कर्माण्याह- नीते नस्ये मनस्तापं रजःक्रोधञ्च सन्त्यजेत् । शयीत निद्रां त्यक्त्वा च प्रोत्तानो वाक्छतं नरः ।।२४३।। नस्य दान के पश्चात् निषिद्ध कर्म-नस्य देने के पश्चात् मनस्ताप, धूल तथा क्रोध का त्याग कर देना चाहिये । जब तक सौ गुरु अक्षरों का उच्चारण काल हो तब चित्त लेटा रहे नींद से नहीं सोये ।।२४३।। तथा शिरोविरेकान्ते धूमो वा कवलो हितः । नस्ये त्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।। २४४।। शुद्धहीनात्तियोगा हि विज्ञेयाः शास्त्रचिन्तकैः । लाघवं मलसंशुद्धिः स्रोतसां व्याधिसंक्षयः ।। चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ।।२४५।। शिरोविरेचन के पश्चात् धूम्रपान करना चाहिये या कवल खाना चाहिये यह हितकारक है।
१०३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य प्रयोग करने के पश्चात् वैद्यक शास्त्र के चिन्तक वैद्यों को शुद्धयोग, हीनयोग और अतियोग की परीक्षा करनी चाहिये। उत्तम शुद्धि हो जाने पर शरीर में लघुता होती है, स्रोतों के मल साफ हो जाते हैं, शिरसम्बन्धी व्याधि का नाश और चित्त तथा इन्द्रियों में प्रसन्नता होती है ॥२२४-२४५॥ कण्डूः प्रदेहो गुरुता स्रोतसां कफसंस्रवः । मूर्ध्नि हीनाविशुद्धेस्तु लक्षणं परिकीर्तितम् ।।२४६।। नस्य के अल्प प्रयोग से सिर की उत्तम शुद्धि न होने पर खुजली, शरीर में चिकनापन तथा गुरुता होती है और स्रोतो में कफ बढ़ता है ॥२४६॥ ❖ हीनाविशुद्धे=हीननस्येनाविशुद्धेः ।।२४६।। यहां 'हीनाविशुद्धेः' पद का 'हीनयोग होने से अर्थात् नस्य के अल्प प्रयोग से सिर की उत्तम शुद्धि न होने पर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२४६॥ मस्तुलुङ्गागमो वातवृद्धिरेन्द्रियविभ्रमः । शून्यता शिरसश्चापि मूर्ध्नि गाढं विरेचिते ।।२४७।। यदि शुद्धि का अतियोग हो गया हो तो नासिका से सिर की बसा गिरने लगती है और वात की वृद्धि, इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों को भली भाँति ग्रहण न करना और मस्तक का शून्य हो जाना ये सब होते हैं ॥२४७॥ ❖ मस्तुलुङ्गम्=मस्तकान्तःस्नेहः । इन्द्रियविभ्रमः=इन्द्रियाणामयथाविषयग्रहः ।।२४७।। यहाँ 'मस्तुलुङ्ग' पद का 'सिर की वसा अर्थात् अन्दर का स्नेह' और 'इन्द्रियविभ्रम' पद का 'इन्द्रियों का अपने- अपने विषयों को भलीभाँति ग्रहण न करना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२४७॥ अथ नस्यहीनयोगचिकित्सामाह- हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातघ्नमाचरेत् । तत्र हीनेन शुद्ध वातघ्नमाचरेत् ।।२४८।। सम्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिर्नस्येन दीयते । कफप्रसेकः शिरसो गुरुतेन्द्रियविभ्रमः ।।२४९।। लक्षणंतदतिस्निग्धे तत्र रूक्षं प्रदापयेत् । भोजयेच्चानभिष्यन्दि नस्ये वातिकमादिशेत् ।।२५०।। नस्य के हीनयोग तथा अतियोग की चिकित्सा-यदि नस्य का हीनयोग तथा अतियोग हो गया हो तो कफ- वातघ्न और केवल नस्य का हीनयोग हुआं हो तो वातघ्न उपचार करना चाहिये । यदि रेचन नस्य से सिर बहुत शून्य हो गया हो तो फिर घी का नस्य देना चाहिये । स्नेहन नस्य से सिर बहुत स्निग्ध हो गया हो तो कफ का स्राव होता है, शिर में गुरुता तथा इन्द्रियों में भ्रम होता है । यदि इस प्रकार अतिस्निग्ध के लक्षण प्रतीत हों तो रूक्ष पदार्थों का नस्य देना चाहिये । अभिष्यन्दी पदार्थों का सेवन न करे तथा वात-वर्द्धक क्रियाओं का नस्य में उपयोग करे ॥२४८-२५०॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषाऽऽदि- प्रकरणे पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।५।। अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् ।।६।। तत्रादौ धूमपानविधिमाह- धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा । रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः ।।१।। शमनस्य तु पर्यायौ मध्यः प्रायोगिकस्तथा । बृंहणस्य च पर्यायौ स्नेहनो मृदुरेव च ।।२।।
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३५ रेचनस्यापि पर्यायौ शोधनस्तीक्ष्ण एव च। अधूमार्हाश्च खल्वेते श्रान्तो भीतश्च दुःखितः ॥३॥ दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च रात्रौ जागरितस्तथा। पिपासितश्च दाहार्त्तस्तालुशोषी तथोदरी ॥४॥ शिरोऽभितापी तिमिरी च्छर्द्द्याध्मानप्रपीडितः। क्षतोरस्कः प्रमेहार्त्तः पाण्डुरोगी च गर्भिणी ॥५॥ रूक्षः क्षीणोऽभ्यवहतक्षीरक्षौद्रघृतासवः। भुक्तान्नदधिमत्स्यश्च बालो वृद्धः कृशस्तथा ॥६॥ अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान्। तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम् ॥७॥ सर्पिरिक्षुरसं द्राक्षां पयो वा शर्कराऽम्बु वा। मधुराम्लौ रसौ वाऽपि वमनाय प्रदापयेत् ॥८॥ धूमस्तु द्वादशाद्वर्षाद् गृह्यतेऽशीतिकान्न च। कासश्वासप्रतिश्यायान् मन्याहनुशिरोरुजः ॥९॥ वातश्लेष्मविकारांश्च हन्याद्धूमः सुयोजितः। धूमोपयोगात्पुरुषः प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः ॥ दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिवदनो भवेत् ॥१०॥ धूमपान की विधि धूम छः प्रकार के होते है—(१) शमन (दोषों को शान्त करने वाला), (२) बृंहण (धातुओं को बढ़ाने वाला), (३) रेचन (दोषों को निकालने वाला), (४) कासहा (कासनाशक), (५) वामन (वमन कराने वाला) और ६ व्रणधूपन (व्रण को धूपित करने वाला)। इनमें शमन के मध्य तथा प्रायोगिक और बृंहण के स्नेहन तथा मृदु एवं रेचन के शोधन तथा तीक्ष्ण ये पर्याय हैं। धूमपान के अयोग्य व्यक्ति—जो व्यक्ति थका हुआ या डरा हुआ किंवा दुःखित हो अथवा जिसे बस्ति दी गई हो या विरेचन दिया गया हो या जो रात्रि में जागा हुआ हो या प्यासा हुआ वा दाह से दुःखी हो या जिसका तालु सूखता हो किंवा जो उदर रोगी हो या जिसका शिर तप्त हो रहा हो वा तिमिर, वमन या अफारा से जो पीड़ित हो अथवा उरःक्षत, प्रमेह या पाण्डु रोग से युक्त हो और गर्भिणी स्त्री, रूक्ष तथा क्षीण शरीर वाला एवं दूध, शहद, घी या आसव का जिसने पान किया हो अथवा अन्न, दही या मछली जिसने खाई हो किंवा जो बालक, वृद्ध या कृश शरीर वाला हो तो वे सभी निश्चय धूमपान के अयोग्य समझे जाते हैं। असमय में तथा अधिक मात्रा में धूमपान करना अनेक उपद्रवों को उत्पन्न करने वाला होता है। ऐसे समय में उपद्रवों को शान्त करने के लिये घी पिलाना, नस देना, आँखों में अञ्जन लगाना, सन्तर्पण करना उत्तम होता है। घी, ऊख का रस, मुनक्का, दूध, चीनी का शर्बत, मधुर या अम्ल पदार्थों का रस वमन कराने में देना चाहिये। धूम्रपान बारह वर्ष की अवस्था से लेकर अस्सी वर्ष की अवस्था तक करना चाहिये, बारह से पहले और अस्सी के बाद नहीं करना चाहिये। यदि धूमपान का प्रयोग उत्तम रीति से किया जाय तो खाँसी, दमा, जुखाम, मन्या (गर्दन की शिरा का) स्तम्भ, हनु (जबड़े का) स्तम्भ, सिर की पीड़ा, वात तथा कफसम्बन्धी विकार ये सब नष्ट हो जाते हैं। धूम का उपयोग करने वाले पुरुष की इन्द्रियाँ तथा मन प्रसन्न रहता है और वाणी स्वच्छ होती है। सिर, दाढ़ी तथा मूछ के बाल एवं दाँत दृढ़ होते हैं और मुख सुगन्धित रहता है ॥१-१०॥ अथ धूमपाननलिकामानमाह— धूमनाडी भवेत्तत्र त्रिखण्डा च त्रिपर्विका। कनिष्ठिकापरीणाहा राजमाषागमान्तरा ॥११॥ धूमपान की नली का मान—धूमपान करने में उसकी नली तीन टुकड़ों तथा तीन पर्व वाली एवं कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटी और राजमाष (बोड़ा) जाने योग्य छिद्र वाली होनी चाहिये ॥११॥ ❖ राजमाषागमा समस्ता नाडी ॥११॥ यहाँ ‘राजमाषागमा' पद से 'राजमाष (बोड़ा) जाने योग्य छिद्रवाली सम्पूर्ण नली' का बोध करना चाहिये ॥११॥ धूमपानी भवेद्दीर्घा शमने रोगिणोऽङ्गुलैः। चत्वारिंशन्मितैस्तद्वद् द्वात्रिंशद्भिर्मृदौ मता ॥१२॥ शमनसंज्ञक धूमपान में उसकी नली की लम्बाई रोगी के अंगुल से ४० अंगुल की होनी चाहिये और बृंहणसंज्ञक धूमपान में नली की लम्बाई ३२ अंगुल की होनी चाहिये ॥१२॥ ❖ मृदौ=बृंहणे ॥१२॥
१०३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'मृदौ' पद का 'बृंहणसंज्ञक धूमपान में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१२॥ तीक्ष्णे चतुर्विंशतिभिः कासघ्ने षोडशोन्मितैः ॥१३॥ रेचनसंज्ञक धूमपान में २४ अंगुली की तथा कासनाशक धूमपान में १६ अंगुल की नली की लम्बाई होनी चाहिये ॥१३॥ ❖ तीक्ष्णे=रेचने ॥१३॥ यहाँ 'तीक्ष्णे' पद का 'रेचनसंज्ञक धूमपान में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१३॥ दशाङ्गुलैर्वमनीय तथा स्याद् व्रणनाडिका। कलायमण्डलस्थूला कुलत्थागमरन्ध्रिका ॥१४॥ वमन कराने वाले धूमपान में तथा व्रण को धूपित करने में नली की लम्बाई १० अंगुल की होनी चाहिये और मुटाई मटर के बराबर तथा उसके छिद्र की चौड़ाई कुलथी जाने लायक होनी चाहिये ॥१४॥ ❖ तथा=दशाङ्गुलमिता ॥१४॥ यहाँ 'तथा' पद से '१० अंगुल की' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१४॥ अथ धूमपानविधिमाह- अथेषिकां प्रलिम्पेच्च सुश्लक्ष्णां द्वादशाङ्गुलम्। धूमद्रव्यस्य कल्केन लेपश्वाष्टाङ्गुलः स्मृतः ॥१५॥ धूमपान की विधि-धूमपान की नली (हुक्का) तैयार कर चुकने के बाद एक अत्यन्त चिकनी शरकण्डे की १२ अंगुल लम्बी सलाई लेकर उसे जिस द्रव्य का धूम पीना हो उसके महीन कल्क (चटनी) से लपेट दे किन्तु इतना ध्यान अवश्य रहे कि लेप केवल आठ अंगुल तक ही सलाई पर रहे ॥१५॥ ❖ इषिकाम्=शरकाण्डम् ॥१५॥ यहाँ 'इषिका' पद से 'सरकण्डे की सलाई' का बोध करना चाहिये ॥१५॥ कल्कं कर्षमितं लिप्त्वा छायाशुष्कञ्च कारयेत्। ईषिकामपनीयाथ स्नेहाक्तां वर्त्तिमादरात् ॥१६॥ अङ्गारैर्दीपितां कृत्वा धृत्वा नेत्रस्य रन्ध्रके। वदनेन पिबेद् धूमं वदनेनैव संत्यजेत् ॥१७॥ नासिकाभ्यां ततः पीत्वा मुखेनैव वमेत्सुधीः। शरावसम्पुटे क्षिप्त्वा कल्कमङ्गारदीपितम् ॥ छिद्रे नेत्रं निवेश्याथ व्रणं तेनैव धूपयेत् ॥१८॥ एक तोला मात्र कल्क का सलाई के ऊपर लेप करके उसे छाया में सुखावे, जब सूख जाय तब सावधानी से सलाई को सूखे कल्क से अलग कर उक्त-सूखे कल्क की बत्ती को घृत से तर करके उसके एक सिरे पर आग लगा कर दूसरे सिरे को धूमपान की नली के छिद्र के अन्दर रख दे तत्पश्चात् बुद्धिमान् को चाहिये कि मुख से पीये और मुख से ही धूम बाहर निकाले। यदि किसी व्रण को धूम देना हो तो उसकी ओषधि के उक्त रीति से बने कल्प को घृतयुक्त करके तत्पश्चात् उसमें आग लगा कर उसे एक शराव (कसोरा) के सम्पुट के अन्दर रख कर ऊपर के कसोरे में एक छिद्र कर दे और उस छिद्र के अन्दर धूम लेने की नली को घुसा कर रख दे, उसके बाद नली के द्वारा निकले हुए धूम से व्रण को धूमित करे ॥१६-१८॥ अथ धूमपानौषधिकल्कमाह- एलादिकल्कं शमने स्निग्ध सर्जरसं मृदौ ॥१९॥ रेचने तीक्ष्णकल्कञ्च श्वासघ्ने क्षुद्रकोषणम्। वामने स्नायुचर्माद्यं दद्याद् धूमस्य पानकम् ॥२०॥ व्रणे निम्बवचाद्यञ्च धूपनं संप्रशस्यते। अन्येऽपि धूमा गेहेषु कर्त्तव्या रोगशान्तये ॥२१॥
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३७ धूमपान में ओषधि का कल्क-शमनसंज्ञक धूमपान में छोटी इलायची आदि का, बृंहण संज्ञक धूमपान में घृतादि युक्त राल का, रेचन संज्ञक धूमपान में तीक्ष्ण द्रव्यों का, श्वास (कास) नाशक धूमपान में कटेरी तथा काली मिरिच का और वामनसंज्ञक धूमपान में स्नायु तथा चमड़े के कल्क का धूमपान कराना चाहिये। व्रण में नीम, वच आदि के कल्क का धूम देना उचित होता है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के भी धूम का प्रयोग रोग-शान्ति के लिये गृह में करना चाहिये ॥१९-२१॥ अथ गृहदेयधूममाह- मयूरपिच्छं निम्बस्य पत्राणि बृहतीफलम् । मरिचं हिङ्गु मांसी च वीजं कार्पाससम्भवम् ।। २२ ।। छागरोमाहिनिर्मोको विष्ठा वैडालिकी तथा । गजदन्तश्च तच्चूर्णं किञ्चिद्घृतविमिश्रितम् ।। २३ ।। गेहेषु धूपनं दत्तं सर्वान् बालग्रहान् हरेत् । पिशाचान् राक्षसान् हत्वा सर्वज्वरहरं भवेत् ।। २४ ।। गृह में देने योग्य धूम-मयूर का पंख, नीम के पत्ते, बड़ी कटेरी के फल, काली मिरिच, हींग, जटामांसी, कपास के बीज (बिनौला) बकरे का बाल, साँप की केंचुल, बिल्ली की विष्ठा, हाथीदाँत इन सबों का चूर्ण करके उसमें थोड़ा घी मिलाकर गृह में धूनी देने से सभी प्रकार के बालकों के ग्रह दूर होते हैं तथा यह धूनी पिशाच तथा राक्षस सम्बन्धी बाधा को दूर कर सम्पूर्ण ज्वर को नष्ट करती है। इसीका नाम ‘अपराजित धूम’ है ॥२२-२४॥ ❖ अहिनिर्मोकः=सर्पकञ्चुकः ।। २२-२४ ।। यहाँ ‘अहिनिर्मोक’ पद का ‘साँप की केंचुल’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२-२४॥ इत्यपराजितो धूमः । अथ धूमपाने त्याज्यकार्याण्याह- मनस्तापं रजःक्रोधौ धूमपाने निवारयेत् । नेत्राणि धातुजान्यहुर्नलवंशादिजान्यपि ।। २५ ।। धूमपान में त्याग करने योग कार्य-धूमपान करने पर मन में सन्ताप नहीं होने देना चाहिये तथा धूलि से दूर रहना चाहिये और क्रोध नहीं करना चाहिये। धूमपान की नली या तो तामा आदि धातु की अथवा नरसल या बांस की बनानी चाहिये ॥२५॥ अथ गण्डूषकवलप्रतिसारणविधिमाह । तत्र गण्डूषविधिमाह- स्नेहक्षीरकषायादिद्रवैः सम्पूर्णमाननम् । आपूर्य स्थीयते तावद्धिर्गण्डूषधारणे ।। २६ ।। कफपूर्णास्यता यावच्छेदो दोषस्य वा भवेत् । नेत्रघ्राणस्रुतिर्यावत्तावद्गण्डूषधारणम् ।। २७ ।। गण्डूषान् सुस्थितः कुर्यात्स्विन्नभालगलादिकः । मनुष्यस्त्रींस्तथा पञ्च सप्त वाऽऽदोषनाशनात् ।। २८ ।। गण्डूष की विधि-स्नेह (घृतादि), दूध, क्वाथ आदि द्रव पदार्थों से मुख को पूर्ण रीति से भर कर जब तक रखने की विधि हो तब तक रखना यही गण्डूषधारण (कुल्ले करने) की विधि है। गण्डूष (कुल्ला) मुख में धारण करने का समय-जब तक कफ से मुख न भर जाय या दोष नष्ट न हो जाय अथवा आँख तथा नाक से पानी न झरने लगे तब तक मुख में गण्डूष धारण करना चाहिये। मनुष्य को चाहिये कि वह स्थिर आसन से बैठ कर जब तक कपाल, गला, गण्डस्थल तथा गालों पर पसीना न आ जाय अथवा जब तक दोष दूर न हो जाय तब तक ३, ५ अथवा ७ कुल्ले करे ॥२६-२८॥ ❖ गलादिकः=इत्यादिशब्देन गण्डकपोलौ गृह्येते सुश्रुतोक्तत्वात् ।। २६-२८ ।।
१०३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ सुश्रुत महर्षि के वचनानुसार 'गलादिक' में आदि शब्द से 'गण्डस्थल तथा कपोल का भी ग्रहण किया गया है' ॥२६-२८॥ अथ गण्डूषभेदानाह- चतुर्विधः स्याद् गण्डूषः स्नेहनः शमनस्तथा। शोधने रोपणश्चैव कवलश्चापि तादृशः ॥२९॥ स्निग्धोष्णैः स्नैहिको वाते स्वादुशीतैः प्रसादनः। पित्ते कट्वम्ललवणैरुष्णैः संशोधनः कफे ।। कषायतिक्तमधुरैः कटूष्णो रोपणो व्रणे ।।३०।। गण्डूष के भेद-(१) स्नेहन, (२) शमन, (३) शोधन और (४) रोपण इन भेदों से गण्डूष और इसी भाँति कवल भी चार प्रकार का होता है। वातसम्बन्धी दोष में स्निग्ध तथा उष्ण द्रवपदार्थों के द्वारा जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे स्नैहिक (स्नेहन) कहते हैं। पित्त सम्बन्धी दोष में स्वादिष्ट तथा शीतल द्रव पदार्थों से गण्डूष धारण किया जाता है उसे प्रसादन (शमन) और कफसम्बन्धी दोष में कटु, अम्ल तथा लवणरसयुक्त उष्ण द्रवपदार्थों से जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे संशोधन एवं व्रण में कषाय, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त किञ्चित् उष्ण द्रव पदार्थों से जो गण्डूष धारण किया जाता है उसे रोपणसंज्ञक गण्डूष कहते हैं ॥२९-३०॥ अथ गण्डूषकवलौषधमानमाह- दद्याद् द्रव्येषु चूर्णश्च गण्डूषे कोलमात्रकम्। कर्षप्रमाणः कल्कश्च कवले दीयते बुधैः ।।३१।। गण्डूष तथा कवल की ओषधियों का मान-गण्डूष धारण करना हो तो द्रव पदार्थों में डालने के लिये चूर्ण की मात्रा १ कोल (३ माशे) की होनी चाहिये। यदि कवल लेना हो तो उसमें कल्क की मात्रा १ कर्ष (१ तोला) की होनी चाहिये ।।३१।। अथ गण्डूषकवलयोरवस्थामर्यादामाह- धार्यन्ते पञ्चमाद्वर्षाद्गण्डूषाः कवलादयः ।।३२।। गण्डूष तथा कवल धारण करने में अवस्था की मर्यादा-५ वर्ष की अवस्था हो जाने के बाद गण्डूष तथा कवल आदि धारण करना उचित होता है ॥३२॥ व्याधेरपचयस्तुष्टिर्वैशद्यं वक्त्रलाघवम्। इन्द्रियाणां प्रसादश्च गण्डूषे विधृते भवेत् ।।३३।। हरेदास्यस्य वैरस्यं शोषं पाकं व्रणं तृषाम्। दन्तचालञ्च गण्डूषो वैशद्यं तु करोति हि ।।३४।। गण्डूष धारण के गुण-गण्डूष धारण करने पर व्याधियों का नाश, चित्त में सन्तोष, स्वच्छता, मुख में लघुता तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता ये सब उत्पन्न होते हैं और मुख की विरसता, शोष (मुख का सूखना) तथा पाक (मुख का पक जाना) दूर होता है एवं व्रण, तृषा और दाँतों का हिलना ये सब नष्ट हो जाते हैं और मुखादि की स्वच्छता भी होती है ।।३३-३४।। अथ कवलविधिमाह- वातपित्तकफघ्नस्य द्रव्यस्य कवलं मुखे। अर्द्ध निक्षिप्य संचर्व्य निष्ठीवेत्कवले विधिः ।।३५।। कवलः कुरुते काङ्क्षां भक्ष्येषु हरते कफम्। तृष्णां शोषञ्च वैरस्यं दन्तचालञ्च नाशयेत् ।।३६।। कवलधारण की विधि-योग्यतानुसार वात, पित्त तथा कफनाशक ओषधियों का कवल (ग्रास) मुख के अर्ध भाग में रखकर और उसे चबा कर थूक देना चाहिये। इसी को कवलधारण की विधि कहते हैं। कवल धारण के गुण- कवलधारण करने से भक्ष्य पदार्थों के खाने में रुचि उत्पन्न होती है और कफ नष्ट होता है एवं तृषा, मुख का शोष (सूखना) तथा विरसता और दाँतों का हिलना दूर हो जाता है ।।३५-३६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३९ अथ प्रतिसारणविधिमाह- दन्त जिह्वामुखानां यच्चूर्णकल्कावलेहकैः। शनैर्घर्षणमङ्गुल्या तदुक्तं प्रतिसारणम्।।३७।। वैरस्यं मुखदौर्गन्ध्यं मुखशोषं तथा तृषाम्। अरुचिं दन्तपीडाञ्च निहन्ति प्रतिसारणम्।।३८।। हीने जाड्यकफोत्क्लेशावरसज्ञानमेव च। अतियोगान्मुखे पाकः शोषस्तृष्णावमिः क्लमः।।३९।। प्रतिसारण की विधि-चूर्ण, कल्क अथवा अवलेह द्वारा अंगुली से दाँत, जीभ तथा मुख को जो धीरे-धीरे घिसा जाता है उसी को प्रतिसारण कहते हैं। प्रतिसारण (मज्जन) करने से मुख की विरसता, दुर्गन्ध तथा शोष (मुख का सूखना) नष्ट होता है और तृषा, अरुचि तथा दाँतों की पीड़ा दूर होती है। यदि प्रतिसारण हीन मात्रा में किया जाय तो जड़ता, कफ का प्रकोप तथा मधुरादि रसों का परिज्ञान न होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। यदि अधिक मात्रा में प्रतिसारण किया जाय तो मुख का पाक (पक जाना) तथा शोष (सूखना) एवं तृषा, वमन तथा ग्लानि ये सब उत्पन्न होते हैं ।।३७-३९।। अथ स्वेदविधिमाह- स्वेदश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तापोष्मस्वेदसंज्ञितः। उपनाहो द्रवः स्वेदः सर्वे वातार्त्तिहारिणः ।।४०।। स्वेद की विधि-स्वेद (पसीना निकलना) के ४ भेद होते हैं-(१) तापस्वेद, (२) ऊष्मस्वेद, (३) उपनाहस्वेद और (४) द्रवस्वेद। ये चारो स्वेद वातसम्बन्धी पीड़ा को नष्ट करने वाले होते हैं ।।४०।। ❖ तापस्वेद उष्मस्वेदश्च ताभ्यां संज्ञितः। उपनाहः=उपनाहस्वेद इत्यर्थः ।।४०।। यहाँ 'तापोष्मस्वेदसंज्ञितः' पद का 'तापस्वेद तथा उष्मस्वेद नाम से प्रसिद्ध' और 'उपनाह' पद का 'उपनाह स्वेद' यह अर्थ समझना चाहिये ।।४०।। स्वेदौ तापोष्मजौ प्रायः श्लेष्मघ्नौ समुदीरितौ। उपनाहस्तु वातघ्नः पित्तसङ्गे द्रवो हितः ।।४१।। उक्त ४ प्रकार के स्वेदों में तापस्वेद तथा ऊष्मस्वेद कफनाशक और उपनाह स्वेद वातनाशक कहा हुआ है। जहाँ पित्त का विशेष सम्बन्ध होता है वहाँ द्रवस्वेद हितकर कहा हुआ है ।।४१।। ❖ द्रवो हि द्रवस्वेदः ।।४१।। यहाँ 'द्रव' पद से 'द्रवस्वेद' का ग्रहण किया जाता है ।।४१।। महाबले महाव्याधौ शीते स्वेदो महान् स्मृतः। दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो मतः। बलासे रूक्षणः स्वेदो रूक्षस्निग्धः कफानिले ।।४२।। यदि रोगी महाबलवान् हो और व्याधि भी बड़ी हो और शीत काल हो तो प्रबल स्वेद कराना चाहिये। यदि रोगी तथा व्याधि दुर्बल हो तो दुर्बल स्वेद कराना उचित है। मध्यम बलवाला रोगी या व्याधि हो तो मध्यम स्वेद कराना चाहिये। कफसम्बन्धी रोगों में रूक्षण (रूक्षता करने वाला) स्वेद कराना चाहिये। कफयुक्त वायुसम्बन्धी रोगों में रूक्ष तथा स्निग्ध स्वेद कराना चाहिये ।।४२।। ❖ रूक्षणः = रूक्षयतीति रूक्षणः। नन्द्यादित्वाल्ल्युट् प्रत्ययः ।।४२।। यहाँ 'रूक्षण' पद का 'रूक्षता करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये। और 'रूक्ष्' धातु से 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' इस सूत्र से नन्द्यादि के अन्दर पाठ होने से ल्यु प्रत्यय हुआ और ल की इत्संज्ञा होने के बाद यु को न हुआ है तथा नकार को णकार होकर सु विभक्ति आई और रुत्व विसर्ग होकर 'रूक्षणः' यह पद सिद्ध होता है ।।४२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA