भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२७ स्नेह लगी हुई सलाई से उसके मूत्रमार्ग को स्वच्छ करके घृत लगी हुई छः अङ्गुल की नली लिङ्ग के छिद्र में डाले। तत्पश्चात् बस्ति को दबाकर धीरे से नली को बाहर निकाल ले तत्पश्चात् स्नेह के बाहर निकल आने पर पूर्वोक्त स्नेह बस्ति की भाँति उपचार करना हितकर है। स्त्रियों की योनि में उत्तरबस्ति की क्रिया करनी हो तो कनिष्ठिका अङ्गुली के समान मोटी और जिससे मूँग निकल जाय उतने छिद्र वाली दश अङ्गुल की सूक्ष्म नली लेकर योनि के अन्दर चार अङ्गुल डाले ॥१७२-१७८॥ द्व्यङ्गुलं मूत्रमार्गे च सूक्ष्मं नेत्रं नियोजयेत्। मूत्रकृच्छ्रविकारेषु बालानां त्वेकमङ्गुलम् ॥१७९॥ शनैर्निष्कम्पमाधेयं सूक्ष्मं नेत्रं विचक्षणैः। मालतीपुष्पवृन्ताभं नेत्रमित्युदितं पुनः ॥१८०॥ यदि मूत्रकृच्छ्र रोगवाली स्त्री के मूत्रमार्ग में डालनी हो तो दो अङ्गुल डाले और बालकों के मूत्रकृच्छ्र विकार में इससे भी सूक्ष्म हाथ को काँपने से रोक धीरे-धीरे लिङ्ग के भीतर एक अङ्गुल डाले। यह नली मालती के फूल की डंडी के समान होनी चाहिये, ऐसा ही ऊपर कह आये हैं ॥१७९-१८०॥ योनिमार्गेषु नारीणां स्नेहमात्रा द्विपालिकी। मूत्रमार्गे पलोन्माना बालानां च द्विकार्षिकी ।। उत्तानायै स्त्रियै दद्यादूर्ध्वजान्वै विचक्षणः। अप्रत्यागच्छति भिषग् बस्तावृत्तरसंज्ञिते ॥१८२॥ भूयो बस्तिं विदध्याच्च संयुक्तं शोधनैर्गुणैः। फलवर्त्तिं विदध्याद् वा योनिमार्गे दृढां भिषक् ॥१८३॥ सूत्रैर्विनिर्मितां स्निग्धां शोधनद्रव्यसंयुताम् ॥१८४॥ स्त्रियों के योनिमार्ग में स्नेह की मात्रा आठ तोले की और मूत्रमार्ग में चार तोले की है। बालकों के लिङ्ग में दो ताले की मात्रा लेनी चाहिये। विद्वान् वैद्य स्त्री को उत्तान (चित्त) लेटाकर घुटने को ऊपर करके बस्ति दे, यदि उत्तर बस्ति बाहर न निकले तो वैद्य शोधन गुण वाली दूसरी बस्ति दे अथवा योनिद्वार में शोधन पदार्थों को मिलाकर सूत से बनी चिकनी दृढ़ फलवर्त्ति प्रवेश करे ॥१८१-१८४॥ दह्यमाने तथा बस्तौ दद्याद्बस्तिं विशारदः। क्षीरिवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन वा ।।१८५।। जिस स्थान में बस्ति दी गई हो हो उसमें दाह हो तो बुद्धिमान वैद्य दूध वाले वृक्षों के क्वाथ से अथवा शीतल जल से दूसरी बस्ति दे ॥१८५॥ ❖ दह्यमाने बस्तौ=यस्मिन् स्थाने बस्तिर्दत्तस्तस्मिन् दह्यमाने ।।१८५।। यहाँ 'दह्यमाने बस्तौ' इन पदों का 'जिस स्थान में बस्ति दी गई हो उसमें दाह हो तो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८५॥ बस्तिः शुक्ररुजः पुंसां स्त्रीणामार्त्तवजा रुजः । हन्यादुत्तरबस्तिस्तु नोचितो मेहिने क्वचित् ॥१८६॥ सम्यग्दत्तस्य लिङ्गानि व्यापदः क्रम एव च । बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य समानाः स्नेहबस्तिना ॥१८७॥ उत्तरबस्ति-पुरुषों के शुक्रसम्बन्धी रोगों को तथा स्त्रियों के ऋतु-सम्बन्धी दोषों को नष्ट करता है, किन्तु यह उत्तरबस्ति प्रमेह के रोगी को देना कभी उचित नहीं है। उत्तरबस्ति से भलीभाँति देने के लक्षण, उत्तम रीति से न देने से उत्पन्न उपद्रव अन्य समस्त क्रम स्नेहबस्ति के समान ही जानने चाहिये ॥१८६-१८७॥ अथ फलवर्त्तिविधिमाह- घृताभ्यक्ते गुदे क्षिप्ता श्लक्ष्णा स्वाङ्गुष्ठसन्निभा। मलप्रवर्त्तिनी वर्त्तिः फलवर्त्तिश्च सा स्मृता ।।१८८।। फलवर्त्ति की विधि-मल निःसरण के लिये गुदा में घी चुपड़ कर रोगी के अंगूठे के समान मोटी और चिकनी वर्त्ति प्रविष्ट-करे इसको वैद्यजन फलवर्ति कहते हैं ॥१८८॥