भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ नावनम् । अथ नस्यग्रहणविधिमाह- नस्यं तत्कथ्यते धीरैर्नासाग्राह्यं यदौषधम् । नावनं नस्यकर्मेति तस्य नामद्वयं मतम् ॥१९८९॥ नस्यग्रहण की विधि-नासिका से जो ग्राह्य ओषधि होती है उसको बुद्धिमान लोग नस्य कहते हैं। इसके नावन तथा नस्यकर्म ये दो नाम हैं ॥१९८९॥ ❖ नस्यकर्म=नासिकायां कर्म चिकित्सा येन तद् तस्यकर्म ॥१९८९॥ इससे नाक की चिकित्सा होती है इस कारण इसको नस्यकर्म कहते हैं ॥१९८९॥ नस्यभेदो द्विधा प्रोक्तो रेचनं स्नेहनं तथा । रेचनं कर्षणं प्रोक्तं स्नेहनं बृंहणं मतम् ॥१९९०॥ रेचन तथा स्नेहन ये दोनों भेद नस्य के कहे गये हैं। जिस नस्य से अन्तःस्थ पदार्थों की हीनता हो वह रेचन तथा जिस नस्य से भीतर के पदार्थों की वृद्धि की जाती है वह स्नेहन कहलाती है ॥ कफपित्तानिलध्वंसि पूर्वमध्यापराह्नके । दिनस्य गृह्यते नस्यं रात्रावप्युत्कटे गदे ॥१९९१॥ यदि कफ को नष्ट करना हो तो पूर्वाह्न में, पित्त को नष्ट करना हो तो मध्याह्न में तथा बात को नष्ट करना हो तो अपराह्न में नस्य देना चाहिये । यदि रोग भयङ्कर हो तो रात्रि में भी नस्य देना चाहिये ॥१९९१॥ ❖ दिनस्य त्रिधा विभक्तस्य पूर्वभागादौ ॥१९९१॥ यहाँ वर्त्तमान दिन के तीन भाग क्रम से पूर्वाह्न आदि समझना चाहिये ॥१९९१॥ नस्यं त्यजेद्भोजनान्ते दुर्दिने चापतर्पितः । तथा नवप्रतिश्यायी गर्भिणी गरदूषितः । अजीर्णी दत्तबस्तिश्च पीतस्नेहोदकासवः ॥१९९२॥ क्रुद्धः शोकाभिभूतश्च तृषार्त्तो वृद्धबालकौ । वेगावरोधि श्रान्तश्च स्नातुकामश्च वर्जयेत् ॥१९९३॥ भोजन करने के पश्चात् तथा मेघ से घिरे दिन में नस्य लेना त्याग कर दे, एवं लंघन किए हुए, नवीन प्रतिश्याय के रोगी, गर्भिणी स्त्री, गर (कृत्रिम विष) से दूषित हुए, अजीर्ण रोगी, जिसको बस्ति दी गई हो, जिसने स्नेह, जल अथवा अथवा आसव तुरन्त पिया हो, क्रुद्ध, शोकाकुल, प्यासे, वृद्ध, बालक, मल-मूत्र के वेग को रोकने वाले, परिश्रमी, जिसे स्नान करने की इच्छा हो ऐसे लोगों को नस्य देना वर्जित है ॥१९९२-१९९३॥ नस्यमिति शेषः ॥१९९२-१९९३॥ यहाँ 'नस्य' पद अन्तिम श्लोक में यद्यपि नहीं हैं तथापि ऊपर से योग्यतावश लाकर अर्थ किया गया है ॥१९९२- १९९३॥ अष्ठवर्षस्य बालस्य नस्यकर्म समाचरेत् । अशीतिवर्षादूर्ध्वञ्च नावनं नैव दीयते ॥१९९४॥ बालक जब तक आठ वर्ष का न हो तब तक उसको नस्य नहीं देना चाहिये तथा अस्सी वर्ष के ऊपर अवस्था वाले वृद्ध को भी नस्य नहीं देना चाहिये ॥१९९४॥ अथ रेचनस्य मात्रामाह- अथ वैरेचनं नस्यं ग्राह्यं तैलः सुतीक्ष्णकैः । तीक्ष्णं भेषजसिद्धैर्वा स्नेहैः क्वाथै रसैस्तथा ॥१९९५॥ रेचन नस्य की मात्रा-तीक्ष्ण तैलों से, तीक्ष्ण ओषधियों द्वारा पकाये हुये स्नेहों से, क्वाथों तथा रसों से रेचन नस्य देना चाहिये ॥१९९५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA