भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1080

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२९ अथ रेचननस्यविधिमाह- नासिकारन्ध्रयोरष्टौ षट् चत्वारश्च बिन्दवः । प्रत्येकं रेचनं योग्यं मुख्यमध्याल्पमात्रया ।।१९६।। रेचन नस्य की विधि-नासिका के दोनों छिद्रों में रेचन नस्य देना चाहिये । प्रत्येक छिद्र में आठ-आठ बूँद की मात्रा उत्तम, छः छः बूँद की मात्रा मध्यम तथा चार-चार बूँद की मात्रा कनिष्ठ होती है ।।१९६।। अथ नस्यौषधप्रमाणमाह- नस्यकर्मणि दातव्यं शाणैकं तीक्ष्णमौषधम् । हिङ्गु स्याद्यवमात्रन्तु माषैकं सैन्धवं मतम् ।।१९७।। क्षीरं चैवाष्टशाणं स्यात्पानीयञ्च त्रिकार्षिकम् । कार्षिकं मधुरद्रव्यं नस्यकर्मणि योजयेत् ।। नस्य औषध का प्रमाण-नस्य कर्म में तीक्ष्ण ओषधि एक शाण (४ माशे), हींग यवभर, सेंधा नमक एक माशा, दूध पाठ शाण (३२ माशे), पानी तीन तोले और मधुर द्रव्य एक तोला लेना चाहिये ।।१९७-१९८।। अथ रेचननस्यस्य भेदद्वयमाह- अवपीडः प्रधमनं द्वौ भेदावपरौ स्मृतौ । शिरोविरेचनस्याथ तौ तु देयौ यथायथम् ।।१९९।। रेचन नस्य के भेद-रेचन नस्य के अवपीड तथा प्रधमन नामक दो भेद हैं । शिरोविरेचन के लिये योग्य रीति से इन भेदों का उपयोग करना चाहिये ।।१९९।। अथ रेचनस्य भेदद्वयस्य लक्षणमाह- कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निःसृतो रसः । सोऽवपीडः समुद्दिष्टस्तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ।।२००।। षडङ्गुला द्विवक्त्रा या नाडी चूर्णं तथा धमेत् । तीक्ष्णं कोलमितं वक्त्रवातैः प्रधमनं हितम् ।।२०१।। रेचन नस्य के भेदों के लक्षण-जिसके साथ तीक्ष्ण पदार्थ संयुक्त हों ऐसी ओषधि का कल्क करके उसको निचोड़ कर जो रस निकाला जाता है वह अवपीड और छः अङ्गुल लम्बी, दो मुख वाली नली में आधा तीक्ष्ण चूर्ण भर कर मुख से फूक कर जो चूर्ण नाक में चढ़ाया जाता है, उसको प्रधमन कहते हैं ।।२००-२०१।। अथ रेचनस्नेहनस्योपयोगमाह- ऊर्ध्वजत्रुगते रोगे कफजे स्वरसंक्षये । अरोचके प्रतिश्याये शिरःशूले च पीनसे ।।२०२।। शोफापस्मारकुष्ठेषु नस्यं वैरेचनं हितम् । भीस्त्री कृशबालानां नस्यं स्नेहेन शस्यते ।।२०३।। गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे । मनोविकारे कृमिषु पूज्यते चावपीडनम् ।।२०४।। अत्यन्तोत्कटदोषेषु विसंज्ञेषु च दीयते । चूर्णं प्रधमनं धीरैस्तद्धि तीक्ष्णतरं यतः ।।२०५।। रेचन तथा स्नेहन नस्य के उपयोग-ऊर्ध्व जत्रुगत अर्थात् गले से ऊपर के रोगों में, कफ से उत्पन्न रोगों में, स्वरक्षय (गला बैठ जाने) में एवं अरुचि, प्रतिश्याय (जुखाम), शिरःशूल, शोथ, अपस्मार तथा कुष्ठ रोगों में रेचन नस्य हितकर है । डरने वाले व्यक्ति, स्त्री, कृश मनुष्य और बालक इन सबों को स्नेह से नस्य देना हितकर होता है । गले के रोग में, सन्निपात में, निद्रा में, विषमज्वर में, मनोविकार (उन्मादादि) में और कृमि रोग में अवपीडन नस्य देना उत्तम है । अत्यन्त उत्कट दोषों में, जिनमें ज्ञान हो जाय ऐसे रोगों में धीर वैद्य चूर्ण का प्रधमन नस्य दे क्योंकि यह अत्यन्त तीक्ष्ण होता है ।।२०२-२०५।। अथ वैरेचननस्यौषधिगुणानाह- नस्यं स्याद् गुडशुण्ठीभ्यां पिप्पलीसैन्धवेन वा । जलपिष्टेन कर्णाक्षिनासामूर्द्धभवा गदाः ।।२०६।। मन्याहनुगलोद्भूता नश्यन्ति भुजपृष्ठजाः । मधूकसारकृष्णाभ्यां वचामरिचसैन्धवैः ।।२०७।। नस्यं कोष्णाम्भसा पिष्टं दद्यात्संज्ञाप्रबोधनम् । अपस्मारे तथोन्मादे सन्निपातेऽपतन्त्रके ।।२०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA