भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रेचन ओषधियों के गुण-सोंठ का चूर्ण तथा गुण को एकत्र कर अथवा पीपल अथवा सेंधा नमक को पानी में पीस कर यदि नस्य दे तो कान, नेत्र, नासिका, सिर, गर्दन, दाढ़, गला, बाहु और पीठ के रोग नष्ट हो जाते हैं । महुआ का रस, पीपल, वच, मिरिच और सेंधा नमक को थोड़े-थोड़े गरम जल से पीसकर नस्य देने से मृगी, उन्माद, सन्निपात तथा अपतन्त्रक नष्ट होता है ॥२०६-२०८॥ अथ रेचननस्यस्यापरविधिमाह- सैन्धवं श्वेतमरिचं सर्षपाः कुष्ठमेव च। बस्तमूत्रेण संपिष्टं नस्यं तन्द्रानिवारणम् ॥२०९॥ रेचन नस्य का दूसरा प्रकार-सेंधा नमक, श्वेत मरिच (सहजने के बीज), सरसों तथा कूठ को बकरे के मूत्र में पीसकर नस्य देने से तन्द्रा नष्ट होती है ॥२०९॥ अथ प्रधमननस्यस्यौषधिमाह- रोहितस्य च पित्तेन भावितं मरिचं वचा। कट्फलं चेति तच्चूर्णं देयं प्रधमनं बुधैः ॥२१०॥ प्रधमन नस्य की ओषधियाँ-मिर्च, वच तथा कायफल का चूर्ण करके रोहू मछली के पित्त की भावना देकर नली द्वारा प्रधमन नस्य देना चाहिये ॥२१०॥ अथ बृंहणस्नेहननस्यस्य कल्पनामाह- अथ बृंहणनस्यस्य कल्पना कथ्यतेऽधुना। मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्वौ भेदौ स्नेहने मतौ ॥२११॥ मर्शस्य तर्पणी मात्रा मुख्या शाणैः स्मृताऽष्टभिः । मध्यमा तु चतुःशाणैर्हीना शाणमिता मता ॥२१२॥ एकैकस्मिंस्तु मात्रयं देया नासापुटे बुधैः ॥२१३॥ स्नेहननस्य की कल्पना-स्नेहननस्य के मर्श और प्रतिमर्श दो भेद होते हैं । प्रत्येक नासापुट में आठ शाण (३२ माशा) मर्श डाली जाय तो यह मर्श की मात्रा उत्तम होती है एवं चार शाण (१६ माशे) की मात्रा मध्यम तथा एक- एक शाण (४ माशे) की मात्रा कनिष्ठ मात्रा कही जाती है ॥२११-२१३॥ मर्शस्य द्वित्रिवेलां वा वीक्ष्य दोषबलाबलम् । एकान्तरं द्वयन्तरं वा नस्यं दद्याद्विचक्षणः ॥२१४॥ बुद्धिमान वैद्य दोषों का बलाबल देख कर एक दिन में दो-तीन बार या एक दिन के अन्तर से अथवा दो दिन के अन्तर से मर्श नस्य का उपयोग करावे ॥२१४॥ ❖ एकान्तरम्=एकं दिनमन्तरं नस्यशून्यं यत्र तदेकान्तरम् ॥२१४॥ यहाँ 'एकान्तरम्' पद का 'एक दिन अन्तर नस्य देने से शून्य है जिसमें ऐसा नस्य अर्थात् एक दिन के अन्तर से नस्य' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१४॥ त्र्यहं पञ्चाहमथवा सप्ताहं वा सुयन्त्रितः ॥२१५॥ तीन या पाँच अथवा सात दिन तक बराबर सावधानी से नस्य का उपयोग करे ॥२१५॥ ❖ अथवा त्र्यहम्=त्रीण्यहानि यावत्, प्रतिदिनम् । एवं पञ्चाहं सप्ताहं च । सुयन्त्रितः=सावधानः । यथा उच्छिक्कं न भवति ॥२१५॥ यहाँ 'त्र्यहम्' पद का 'तीन दिन तक प्रतिदिन (बराबर)' और इसी भाँति 'पञ्चाह और सप्ताह' का भी 'पाँच या सात दिन तक प्रतिदिन' यह अर्थ समझना चाहिये । 'सुयन्त्रितः' का 'सावधानी से नस्य दे कि जिसमें छींक इत्यादि न आवे' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१५॥