भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०३१ मर्शे शिरोविरेके च व्यापदो विविधाः स्मृताः। दोषोत्क्लेशात्क्षयाच्चैव विज्ञेयास्ता यथाक्रमम् ।। दोषोत्क्लेशनिमित्तासु युञ्ज्याद्वमनशोधनम् ।।२१६।। मर्श नस्य देने के समय यदि स्थानभ्रष्ट दोष कुपित हुये हों तो उससे और शिरो-विरेचनार्थ रेचन नस्य के उपयोगसे, धात्वादि के क्षय से विविध प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। यदि स्थान-भ्रष्ट दोष के प्रकोप से रोग उत्पन्न हो जाय तो वमनरूप शोधन का प्रयोग करना उचित है ॥२१६॥ ❖ वमनशोधनम्=वमनरूपं शोधनम् ।।२१६।। यहाँ 'वमनशोधनम्' का 'वमनरूप शोधन' अर्थ समझना चाहिये ॥२१६॥ अथ क्षयनिमित्तासु यथास्वं बृंहणं हितम् । शिरोनासाऽक्षिरोगेषु सूर्यावर्त्तार्द्धभेदके ।।२१७।। दन्तरोगे बले हीने मन्याबाह्वंसजे गदे । मुखशोषे कर्णनादे वातपित्तगदे तथा ।।२१८।। अकालपलिते चैव केशश्मश्रुप्रपातने । पूज्यते बृंहणं नस्यं स्नेहैर्वा मधुरद्रवैः ।।२१९।। यदि धात्वादि के क्षय से रोग उत्पन्न हुये हों तो तत्तद्धातुवर्ध बृंहण (स्नेहन) नस्य का उपयोग हितकर होता है । शिरोविकार, नासिका के रोग, नेत्ररोग, सूर्यावर्त, आधा शीशी, (अधकपारी), दन्तरोग, बलक्षय, गर्दन, भुजा तथा कन्धा इनके रोगों में, मुखशोष, कर्णनाद, वातपित्त-सम्बन्धी विकार, अकाल में बालों का श्वेत हो जाना एवं जिसमें दाढ़ी-मूंछ बिल्कुल गिर पड़े ऐसे रोगों में स्नेहों से अथवा मधुर पदार्थों के रस से बृंहण (स्नेहन) नस्य देना उत्तम है ॥ अथ बृंहणनस्यस्य विधिमाह- सशर्करं पयःपिष्टं धृष्टमाज्येन कुङ्कुमम्। नस्यप्रयोगतो हन्याद्वातरक्तभवा रुजः ।। भ्रूशङ्खाक्षिशिरःकर्णसूर्यावर्त्तार्द्धभेदकान् ।।२२०।। बृंहण नस्य की विधि-शर्करा संयुक्त दूध में घी से भुनी केशर को पीस कर नस्य देने से वातरक्तजन्य पीड़ा नष्ट होती है । इसी प्रकार भौंह, कपाल, नेत्र, मस्तक तथा कान के रोग, सूर्यावर्त तथा आधा शीशी (अधकपारी) ये भी नस्य से नष्ट होते हैं ।।२२०।। नस्यं स्यादणुतैलेन तथा नारायणेन वा । माषादिना वा सर्पिर्भिस्तत्तद्भेषजसाधितैः ।।२२१।। अणु तेल, नारायण तेल, माषादि तेल अथवा तत्तद्रोगनाशक ओषधियों से पकाये हुये घी से भी बृंहण नस्य देना चाहिये ॥२२१॥ ❖ अणुतैलमुक्तं सुश्रुतेन । तद्यथा-'तिलपिपीडनोपकरणकाष्ठान्याहृत्य यैरनल्पकालं तिलाः परिपीडितास्तान्यणूनि खण्डशः कल्पयित्वा उलूखले संकुट्य कटाह्ये पानीये वाप्लाव्य क्काथयेत् ततस्तैलं निःसरित तत्तैलं शीतलं हस्तेन जलान्निःसार्य वातघ्नौषधकल्केन पचेत् । तद्गुणतैलमिति । तद्वातरोगहरम्' इति ।।२२१।। अणुतैल सुश्रुत में इस प्रकार कहा है-जिससे बहुत दिनों तक तेल पेरा गया हो ऐसे तेल पेरने के कोल्हू के लकड़ी को लाकर उसके सूक्ष्म-सूक्ष्म टुकड़े काट कर ओखली में कूट ले और पानी से भरी कड़ाही में डाल कर आँच पर चढ़ा दे जब उससे तेल निकले तो उस तेल को हथेली से निकाल ले तत्पश्चात् वातनाशक ओषधियों के कल्क के साथ उसे पकावे इसको अणुतैल कहते हैं, यह वातसम्बन्धी रोगों को नष्ट करता है ॥२२१॥ अथ नस्यस्यान्यं विधिमाह- तैलं कफे स्याद्वाते च केवल वाते च केवल पवने वसा । दयान्मस्य सदा पित्ते मज्जानमेव च ॥२२२॥ माषात्मगुप्तारास्नाभिर्बलारुबुकैरहिषैः । कृतोऽश्वगन्धया क्वाथो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः ।।२२३।। कोष्णो नस्यप्रयोगेण पक्षाघातं सकम्पनम्। जयेदर्दितवातञ्च मन्यास्तम्भावबाहुकौ ।।२२४।।