भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य का दूसरा प्रकार-कफ, वातसम्बन्धी रोगों में तेल और केवल वात रोग में वसा का नस्य देना चाहिये। पित्त रोग हो तो सर्वदा घी और मज्जा का नस्य देना चाहिये। उड़द, केवाँच के बीज, रास्ना, बला, एरण्ड की जड़, रोहिष तृण और असगन्ध का क्वाथ करके उससे हींग तथा सेंधा नमक डालकर कुछ गरम रहते हुए नस्य देने से कम्पसहित पक्षाघात (अर्द्धाङ्गवात), अर्दित (लकवा), मन्यास्तम्भ और अवबाहुक रोग नष्ट हो जाते हैं ॥२२२-२२४॥ अथ प्रतिमर्शस्य मात्राविषये आह- प्रतिमर्शस्य मात्रा तु द्वित्रिबिन्दुमिता मता। प्रत्येकशो नासिकया स्नेहेनेति विनिश्चितम् ।।२२५।। स्नेहे ग्रन्थिद्वयं यावन्निमग्ना चोद्धृता ततः। तर्जनी यं स्रवेद्विन्दुं सा मात्रा बिन्दुसंज्ञिता ।।२२६।। एवंविधैर्बिन्दुसङ्गैरष्टाभिः शाण उच्यते। स देयो मर्शनस्येषु प्रतिमर्शो द्विबिन्दुकः ।।२२७।। प्रतिमर्श की मात्रा-प्रत्येक नासापुट में स्नेह की दो, तीन बूँद डाले इसको प्रतिमर्श कहते हैं। तर्जनी अंगुली को स्नेह में दो पोर तक डुबो कर निकाल ले, उस अंगुली से जो बूंद टपके वह बिन्दुरूप मात्रा कहलाती है। इसी प्रकार आठ बूँदों से शाण नामक मात्रा होती है जिसका मर्श संशक नस्य में उपयोग होता है। दो-दो बूँद की मात्रा जिस नस्य में दी जाय वह प्रतिमर्श कहलाता है ॥ अथ प्रतिमर्शस्य समयमाह- समयाः प्रतिमर्शस्य बुधैः प्रोक्ताश्चतुर्दश । प्रभाते दन्तकाष्ठान्ते गृहान्निर्गमने तथा ।।२२८।। व्यायामाध्वव्यवायान्ते विण्मूत्रान्तेऽञ्जने कृते। कवलान्ते भोजनान्ते दिवास्वप्नोत्थिते तथा ।। वमनान्ते तथा सायं प्रतिमर्शः प्रयुज्यते ।।२३०।। प्रतिमर्श का समय-विद्वानों ने प्रतिमर्श नस्य देने के निम्नलिखित चौदह समय कहे हैं- (१) प्रभात काल, (२) दतौन के पश्चात् (३) घर से बाहर निकलते समय, (४) व्यायाम करने के बाद, (५) मार्ग चलकर आने के पश्चात्, (६) मैथुन के बाद, (७) मल त्यागने के पश्चात्, (८) मूत्र के पश्चात्, (९) अञ्जन लगाने के पश्चात्, (१०) कवल खाने के पश्चात्, (११) भोजन के पश्चात्। (१२) दिन में सोने के पीछे (१३) वमन करने के पीछे और (१४) सायंकाल ॥२२८-२३०॥ ईषदुच्छिक्कनात्स्नेहो यथा वक्त्रं प्रपद्यते। नस्ये निषिक्तं तं विद्यात्प्रतिमर्शप्रमाणतः ।।२३१।। उच्छिष्टं न पिबेन्नैव निष्ठीवेन्मुखमागतम् ।।२३२।। कुछ छींक आजाने पर नाक में डाला हुआ पदार्थ यदि मुख में आजाय तो जानना चाहिये कि प्रतिमर्श की उचित मात्रा हो चुकी है। नाक से मुख में आये हुए पदार्थ को पीना नहीं चाहिये बल्कि तुरन्त थूक देना चाहिये ॥२३१-२३२॥ ❖ प्रमाणतः=मात्रायुक्तम्। उच्छिष्टम्=नस्यावशिष्टम् ।।२३१-२३२।। यहाँ 'प्रमाणतः' पद का 'उचित मात्रा हो चुकी है' और 'उच्छिष्टम्' पद का 'नस्य लेने पर नाक में बचा हुआ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२३१-२३२॥ अथ प्रतिमर्शस्य विषयान् गुणांश्चाह- क्षीणे तृष्णाऽऽस्यशोषार्त्ते बाले वृद्धे च पूज्यते । प्रतिमर्शात्न जायन्ते रोगाश्चैवोर्ध्वजत्रुजाः । बलीपलितनाशश्च बलमिन्द्रियजं भवेत् ।।२३३।। प्रतिमर्श के विषय तथा गुण-क्षीण, प्यास तथा मुखशोष से व्याकुल रोगी, बालक तथा वृद्ध को प्रतिमर्श हितकर होता है। प्रतिमर्श के उपयोग करते रहने से ऊर्ध्व जत्रुगत रोग नहीं उत्पन्न होते, देह में झुर्रियों का पड़ना तथा पलित का नाश होता है और इन्द्रियों की शक्ति उत्तम होती है ॥