भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1084, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1084

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०३३ बिभीतनिम्बौ गाम्भारी शिवा शेलुश्च काकिनी । एकैकतैलनस्येन पलितं नश्यति ध्रुवम् ।।२३४।। बहेड़ा, नीम, खंभार, हरड़, लिसोड़ा और मालकांगनी में से हर एक पदार्थ के तेल का नस्य लेने के अभ्यास से अवश्य पलित (अकाल में बालों का श्वेत होना) नष्ट हो जाता है ।।२३४।। अथ नस्यविधिं वक्ष्ये नस्यग्रहणहेतवे । देशे वातरजोमुक्ते कृतदन्तनिघर्षणम् ।।२३५।। विशुद्धं धूमपानेन स्विन्नभालगलं तथा । उत्तानशायिनं किञ्चित्प्रलम्बशिरसं नरम् ।।२३६।। आस्तीर्णहस्तपादञ्च वस्त्राच्छादितलोचनम् । समुन्नामितनासाग्रं वैद्यो नस्येन योजयेत् ।। नस्य की सामान्य विधि-वायु तथा धूल से रहित प्रदेश में दतौन कराने के पश्चात्, धूम्रपान करने से विशुद्ध होने के पीछे, कपाल तथा गले को स्वेदित कराने के बाद चित्त सुला कर मस्तक को कुछ नीचा कर दे तथा हाथ और पैरों को लम्बा फैलवा दे, तत्पश्चात् नेत्रों को वस्त्र से ढक कर नाक की नोक को ऊँची करके वैद्य रोगी को नस्य देवे ।।२३५-२३७।। कोष्णोनाच्छिन्नधारेण हेमतारादिशुक्तिभिः । शुक्त्या वा यन्त्रयुक्त्वा वा प्लोतैर्वा नस्यमाचरेत् ।।२३८।। सुवर्ण अथवा चाँदी आदि की चमची या सींप या किसी यन्त्र से या कपड़े अथवा रूई के फोहे से बीच में धार न टूटे इस प्रकार कुछ गर्म नस्य नाक में डाले ।।२३८।। ❖ प्लोतैर्वस्त्रैस्तदुपलक्षितैस्तूलैरपि ।।२३८।। यहाँ 'प्लोतैः' पद का 'कपड़े अथवा उससे उपलक्षित रूई के फोहे से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२३८।। नस्येष्वासिच्यमानेषु शिरो नैव प्रकम्पयेत् । न कुप्येन्न प्रभाषेत नोच्छिक्केन्न हसेत्तथा ।। एतैर्हि विहितः स्नेहो नैवान्तं सम्प्रपद्यते । ततः कासप्रतिश्यायशिरोऽक्षिगदसम्भवः ।।२४०।। नस्य जिस समय नाक में डाला जाता है उस समय रोगी को शिर हिलाना, क्रोध करना, किसी से बोलना, छींकना तथा हँसना वर्जित है। क्योंकि ऐसा करने से नस्य भीतर नहीं पहुँचता है और कास, प्रतिश्याय, शिरःशूल तथा नेत्रपीड़ा उत्पन्न हो जाती है ।।२३९-२४०।। शृङ्गाटकमभिव्याप्य स्थापयेन्न गिलेद् द्रवम् । पञ्च सप्त दशैव स्युर्मात्राः स्नेहस्य धारणे ।।२४१।। उपविश्याथ निष्ठीवेन्नासावक्त्रागतं द्रवम् । वामदक्षिणपार्श्वाभ्यां निष्ठीवेत्संमुखं न हि ।।२४२।। नस्य को शृङ्गाटक पर्यन्त पहुँच जाने तक स्थिर रखे जिससे नस्य निकल न जाय। पाँच, सात, अथवा दश गुरु अक्षरों के उच्चारण काल तक नस्य को धारण करना चाहिये। तत्पश्चात् बैठ कर नाक से मुख में आये हुये द्रव को दाहिनी अथवा बाईं ओर थूक दे, किन्तु सामने न थूके ।। अथ नस्यदानान्तरमकर्त्तव्यानि कर्माण्याह- नीते नस्ये मनस्तापं रजःक्रोधञ्च सन्त्यजेत् । शयीत निद्रां त्यक्त्वा च प्रोत्तानो वाक्छतं नरः ।।२४३।। नस्य दान के पश्चात् निषिद्ध कर्म-नस्य देने के पश्चात् मनस्ताप, धूल तथा क्रोध का त्याग कर देना चाहिये । जब तक सौ गुरु अक्षरों का उच्चारण काल हो तब चित्त लेटा रहे नींद से नहीं सोये ।।२४३।। तथा शिरोविरेकान्ते धूमो वा कवलो हितः । नस्ये त्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।। २४४।। शुद्धहीनात्तियोगा हि विज्ञेयाः शास्त्रचिन्तकैः । लाघवं मलसंशुद्धिः स्रोतसां व्याधिसंक्षयः ।। चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ।।२४५।। शिरोविरेचन के पश्चात् धूम्रपान करना चाहिये या कवल खाना चाहिये यह हितकारक है।