भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1085, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1085

१०३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य प्रयोग करने के पश्चात् वैद्यक शास्त्र के चिन्तक वैद्यों को शुद्धयोग, हीनयोग और अतियोग की परीक्षा करनी चाहिये। उत्तम शुद्धि हो जाने पर शरीर में लघुता होती है, स्रोतों के मल साफ हो जाते हैं, शिरसम्बन्धी व्याधि का नाश और चित्त तथा इन्द्रियों में प्रसन्नता होती है ॥२२४-२४५॥ कण्डूः प्रदेहो गुरुता स्रोतसां कफसंस्रवः । मूर्ध्नि हीनाविशुद्धेस्तु लक्षणं परिकीर्तितम् ।।२४६।। नस्य के अल्प प्रयोग से सिर की उत्तम शुद्धि न होने पर खुजली, शरीर में चिकनापन तथा गुरुता होती है और स्रोतो में कफ बढ़ता है ॥२४६॥ ❖ हीनाविशुद्धे=हीननस्येनाविशुद्धेः ।।२४६।। यहां 'हीनाविशुद्धेः' पद का 'हीनयोग होने से अर्थात् नस्य के अल्प प्रयोग से सिर की उत्तम शुद्धि न होने पर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२४६॥ मस्तुलुङ्गागमो वातवृद्धिरेन्द्रियविभ्रमः । शून्यता शिरसश्चापि मूर्ध्नि गाढं विरेचिते ।।२४७।। यदि शुद्धि का अतियोग हो गया हो तो नासिका से सिर की बसा गिरने लगती है और वात की वृद्धि, इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों को भली भाँति ग्रहण न करना और मस्तक का शून्य हो जाना ये सब होते हैं ॥२४७॥ ❖ मस्तुलुङ्गम्=मस्तकान्तःस्नेहः । इन्द्रियविभ्रमः=इन्द्रियाणामयथाविषयग्रहः ।।२४७।। यहाँ 'मस्तुलुङ्ग' पद का 'सिर की वसा अर्थात् अन्दर का स्नेह' और 'इन्द्रियविभ्रम' पद का 'इन्द्रियों का अपने- अपने विषयों को भलीभाँति ग्रहण न करना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२४७॥ अथ नस्यहीनयोगचिकित्सामाह- हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातघ्नमाचरेत् । तत्र हीनेन शुद्ध वातघ्नमाचरेत् ।।२४८।। सम्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिर्नस्येन दीयते । कफप्रसेकः शिरसो गुरुतेन्द्रियविभ्रमः ।।२४९।। लक्षणंतदतिस्निग्धे तत्र रूक्षं प्रदापयेत् । भोजयेच्चानभिष्यन्दि नस्ये वातिकमादिशेत् ।।२५०।। नस्य के हीनयोग तथा अतियोग की चिकित्सा-यदि नस्य का हीनयोग तथा अतियोग हो गया हो तो कफ- वातघ्न और केवल नस्य का हीनयोग हुआं हो तो वातघ्न उपचार करना चाहिये । यदि रेचन नस्य से सिर बहुत शून्य हो गया हो तो फिर घी का नस्य देना चाहिये । स्नेहन नस्य से सिर बहुत स्निग्ध हो गया हो तो कफ का स्राव होता है, शिर में गुरुता तथा इन्द्रियों में भ्रम होता है । यदि इस प्रकार अतिस्निग्ध के लक्षण प्रतीत हों तो रूक्ष पदार्थों का नस्य देना चाहिये । अभिष्यन्दी पदार्थों का सेवन न करे तथा वात-वर्द्धक क्रियाओं का नस्य में उपयोग करे ॥२४८-२५०॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषाऽऽदि- प्रकरणे पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।५।। अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् ।।६।। तत्रादौ धूमपानविधिमाह- धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा । रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः ।।१।। शमनस्य तु पर्यायौ मध्यः प्रायोगिकस्तथा । बृंहणस्य च पर्यायौ स्नेहनो मृदुरेव च ।।२।।