भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३५ रेचनस्यापि पर्यायौ शोधनस्तीक्ष्ण एव च। अधूमार्हाश्च खल्वेते श्रान्तो भीतश्च दुःखितः ॥३॥ दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च रात्रौ जागरितस्तथा। पिपासितश्च दाहार्त्तस्तालुशोषी तथोदरी ॥४॥ शिरोऽभितापी तिमिरी च्छर्द्द्याध्मानप्रपीडितः। क्षतोरस्कः प्रमेहार्त्तः पाण्डुरोगी च गर्भिणी ॥५॥ रूक्षः क्षीणोऽभ्यवहतक्षीरक्षौद्रघृतासवः। भुक्तान्नदधिमत्स्यश्च बालो वृद्धः कृशस्तथा ॥६॥ अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान्। तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम् ॥७॥ सर्पिरिक्षुरसं द्राक्षां पयो वा शर्कराऽम्बु वा। मधुराम्लौ रसौ वाऽपि वमनाय प्रदापयेत् ॥८॥ धूमस्तु द्वादशाद्वर्षाद् गृह्यतेऽशीतिकान्न च। कासश्वासप्रतिश्यायान् मन्याहनुशिरोरुजः ॥९॥ वातश्लेष्मविकारांश्च हन्याद्धूमः सुयोजितः। धूमोपयोगात्पुरुषः प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः ॥ दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिवदनो भवेत् ॥१०॥ धूमपान की विधि धूम छः प्रकार के होते है—(१) शमन (दोषों को शान्त करने वाला), (२) बृंहण (धातुओं को बढ़ाने वाला), (३) रेचन (दोषों को निकालने वाला), (४) कासहा (कासनाशक), (५) वामन (वमन कराने वाला) और ६ व्रणधूपन (व्रण को धूपित करने वाला)। इनमें शमन के मध्य तथा प्रायोगिक और बृंहण के स्नेहन तथा मृदु एवं रेचन के शोधन तथा तीक्ष्ण ये पर्याय हैं। धूमपान के अयोग्य व्यक्ति—जो व्यक्ति थका हुआ या डरा हुआ किंवा दुःखित हो अथवा जिसे बस्ति दी गई हो या विरेचन दिया गया हो या जो रात्रि में जागा हुआ हो या प्यासा हुआ वा दाह से दुःखी हो या जिसका तालु सूखता हो किंवा जो उदर रोगी हो या जिसका शिर तप्त हो रहा हो वा तिमिर, वमन या अफारा से जो पीड़ित हो अथवा उरःक्षत, प्रमेह या पाण्डु रोग से युक्त हो और गर्भिणी स्त्री, रूक्ष तथा क्षीण शरीर वाला एवं दूध, शहद, घी या आसव का जिसने पान किया हो अथवा अन्न, दही या मछली जिसने खाई हो किंवा जो बालक, वृद्ध या कृश शरीर वाला हो तो वे सभी निश्चय धूमपान के अयोग्य समझे जाते हैं। असमय में तथा अधिक मात्रा में धूमपान करना अनेक उपद्रवों को उत्पन्न करने वाला होता है। ऐसे समय में उपद्रवों को शान्त करने के लिये घी पिलाना, नस देना, आँखों में अञ्जन लगाना, सन्तर्पण करना उत्तम होता है। घी, ऊख का रस, मुनक्का, दूध, चीनी का शर्बत, मधुर या अम्ल पदार्थों का रस वमन कराने में देना चाहिये। धूम्रपान बारह वर्ष की अवस्था से लेकर अस्सी वर्ष की अवस्था तक करना चाहिये, बारह से पहले और अस्सी के बाद नहीं करना चाहिये। यदि धूमपान का प्रयोग उत्तम रीति से किया जाय तो खाँसी, दमा, जुखाम, मन्या (गर्दन की शिरा का) स्तम्भ, हनु (जबड़े का) स्तम्भ, सिर की पीड़ा, वात तथा कफसम्बन्धी विकार ये सब नष्ट हो जाते हैं। धूम का उपयोग करने वाले पुरुष की इन्द्रियाँ तथा मन प्रसन्न रहता है और वाणी स्वच्छ होती है। सिर, दाढ़ी तथा मूछ के बाल एवं दाँत दृढ़ होते हैं और मुख सुगन्धित रहता है ॥१-१०॥ अथ धूमपाननलिकामानमाह— धूमनाडी भवेत्तत्र त्रिखण्डा च त्रिपर्विका। कनिष्ठिकापरीणाहा राजमाषागमान्तरा ॥११॥ धूमपान की नली का मान—धूमपान करने में उसकी नली तीन टुकड़ों तथा तीन पर्व वाली एवं कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटी और राजमाष (बोड़ा) जाने योग्य छिद्र वाली होनी चाहिये ॥११॥ ❖ राजमाषागमा समस्ता नाडी ॥११॥ यहाँ ‘राजमाषागमा' पद से 'राजमाष (बोड़ा) जाने योग्य छिद्रवाली सम्पूर्ण नली' का बोध करना चाहिये ॥११॥ धूमपानी भवेद्दीर्घा शमने रोगिणोऽङ्गुलैः। चत्वारिंशन्मितैस्तद्वद् द्वात्रिंशद्भिर्मृदौ मता ॥१२॥ शमनसंज्ञक धूमपान में उसकी नली की लम्बाई रोगी के अंगुल से ४० अंगुल की होनी चाहिये और बृंहणसंज्ञक धूमपान में नली की लम्बाई ३२ अंगुल की होनी चाहिये ॥१२॥ ❖ मृदौ=बृंहणे ॥१२॥