भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ पूतीकः=करञ्जः । रौहिषम्=ईषत्सुगन्ध्यतृणविशेषः । काकनासा (कौआठोडी) प्रसृतम्=पल- द्वयम् ।।१३०-१३२।। यहाँ 'पूतीक' से 'करञ्ज' । 'रौहिष' से 'किञ्चित् सुगन्ध युक्त तृण विशेष (रोहिसघास)' । 'काकनासा' से 'कौआ ठोडी' । 'प्रसृत' से 'दो पल' का ग्रहण करना चाहिये ।।१३०-१३२।। षट्सप्ततिव्यापदस्तु जायन्ते बस्तिकर्मणः । दूषितात् समुदायेन तांश्चिकित्स्यास्तु सुश्रुतात् ।। बस्तिकर्म का ठीक-ठीक उपयोग यदि न हो तो दूषित हो जाने से उससे छिहत्तर रोग उत्पन्न होते हैं, अतः समुचित नली आदि सामग्री से सुश्रुतोक्त रीति के अनुसार उन रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये ।।१३३।। ❖ समुदायेन=समुचितनेत्रादिसामग्रया ।।१३३।। यहाँ 'समुदायेन' पद का-समुचित नली आदि सामग्री से-यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३३।। पानाहारविहाराश्च परिहाराश्च कृत्स्नशः । स्नेहपानसमाः कार्या नात्र कार्या विचारणा ।। स्नेहपान विधि में जैसा जो कुछ पान (पीना), आहार (खाना), बिहार (रहन-सहन) तथा परिहार (परहेज) कहा हुआ है ठीक वैसा ही सब कुछ स्नेहबस्ति में भी करना चाहिये, इस विषय में कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं ।।१३४।। अथ निरूहः । अथ निरूहबस्तिविधिमाह- निरूहबस्तिर्बहुधा भिद्यते कारणान्तरैः । तरेव तस्य नामानि कृतानि मुनिपुङ्गवैः ।।१३५।। निरूह बस्ति की विधि-समवायि कारण के भेद से (पृथक्-पृथक् ओषधियों द्वारा कराने से) निरूह बस्ति के अनेक भेद होते हैं । इसीलिये ऋषियों ने उन बस्तियों के अलग-अलग नामकरण किये हैं ।।१३५।। ❖ कारणान्तरैः=समवायिकारणभेदैः ।।१३५।। यहाँ 'कारणान्तरैः' पद का समवायिकारण के भेद से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३५।। निरूहस्यापरं नाम प्रोक्तमास्थापनं बुधैः । स्वस्थाने स्थापनाद्दोषाधातूनां स्थापनं मतम् ।।१३६।। निरूहस्य प्रमाणं तु प्रस्थं पादोत्तरं परम् । मध्यमं प्रस्थमुद्दिष्टं हीनञ्च कुडवास्त्रयः ।।१३७।। विद्वानों ने निरूह बस्ति का दूसरा नाम आस्थापन बस्ति कहा है क्योंकि आस्थापन से दोषों तथा धातुओं का अपने- अपने स्थान में स्थापन होता है । निरूह बस्ति की मात्रा का प्रमाण सवाप्रस्थ (१ सेर) का श्रेष्ठ होता है । एक प्रस्थ (१२ छ. ४ भर) की मात्रा मध्यम तथा तीन कुडव (९ छ. ३ भर) की मात्रा निकृष्ट समझनी चाहिये ।।१३६-१३७।। ❖ पर=श्रेष्ठम् ।।१३६-१३७।। यहाँ 'पर' का 'श्रेष्ठ' अर्थ समझना चाहिये ।।१३६-१३७।। अतिस्निग्धोऽक्लिष्टदोषः क्षतोरस्कः कृशस्तथा । आध्मानच्छर्दिहिक्काऽर्शःकासश्वासप्रपीडितः ।।१३८।। गुदशोफातिसारार्त्तो विसूचीकुष्ठसंयुतः । गर्भिणी मधुमेही च नास्थाप्यश्च जलोदरी ।।१३९।। अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाला, उत्क्लेशजनक आहारादि द्वारा जिसके दोष बाहर निकलने के लिये उन्मुख न हुए हों, उरःक्षत का रोगी, दुर्बल मनुष्य, अफारा, वमन, हिचकी, बवासीर, खाँसी और दमा से पीड़ित, गुदासम्बन्धी शोथ, अतिसार, विसूचिका तथा कुष्ठरोग से युक्त मनुष्य, गर्भिणी स्त्री, मधुमेह का रोगी और जलोदर वाले रोगी को आस्थापन बस्ति नहीं देनी चाहिये ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA