भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२३ ❖ अक्लिष्टदोषः = अदत्तोत्क्लेशन इति यावत् । क्षतोरस्कः = उरःक्षतवान् ।। १३८-१३९।। यहाँ 'अक्लिष्टदोषः' पद का 'उत्क्लेशजनक आहारादि द्वारा जिसके दोष बाहर निकलने के लिये उन्मुख न हुये हों' और 'क्षतोरस्कः' पद का 'उरःक्षत का रोगी' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३८-१३९।। वातव्याधावुदावर्त्ते वातासृग्विषमज्वरे । मूर्च्छा तृष्णोदरानिाहमूत्रकृच्छ्राश्मरीषु च ।।१४०।। वृद्ध्यसृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेषु निरूहणम् । शूलेऽम्लपित्ते हृद्रोगे योजयेद्विधिवद् बुधः ।।१४१।। वातसम्बन्धी व्याधि, उदावर्त्त, वातरक्त, विषम ज्वर, मूर्च्छा, तृष्णा, उदर रोग, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, अण्डवृद्धि, रक्तप्रदर, मन्दाग्नि प्रमेह, शूल, अम्लपित्त और हृद्रोग इन सबों में बुद्धिमान वैद्य को विधिपूर्वक निरूह बस्ति देनी चाहिये ।।१४०-१४१।। उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं स्निग्धं स्विन्नमभोजितम् । मध्याह्ने गृहमध्ये च यथायोग्यं निरूहयेत् ।। जो अधोवायु तथा मल-मूत्र को त्याग कर चुका हो, जो स्निग्ध तथा स्विन्न हो चुका हो एवं जो बिना भोजन किये हुये हो ऐसे मनुष्य को घर के अन्दर दो पहर के समय यथायोग्य निरूह बस्ति देनी चाहिये ।।१४२।। ❖ स्निग्धम् = स्वभ्यक्तम् । स्विन्नम् = उष्णाम्बुस्नापितम् ।।१४२।। यहाँ 'स्निग्ध' का 'स्नेह द्वारा जिसका स्नेहन हुआ हो' तथा 'स्विन्न' का 'गर्म जल से जिसे स्नान कराया गया हो' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१४२।। स्नेहबस्तिविधानेन बुधः कुर्यान्निरूहणम् ।।१४३।। जाते निरूहे च ततो भवेदुत्कटकासनः । तिष्ठेन्मुहूर्त्तमात्रन्तु निरूहागमनेच्छया ।।१४४।। बुद्धिमान् वैद्य स्नेहबस्ति के विधान से निरूहबस्ति दे और निरूहण हो जाने पर निरूह द्रव के बाहर निकालने की इच्छा से रोगी मुहूर्त्तमात्र उत्कटकासन (उकरूँ) बैठे ।।१४३-१४४।। ❖ अत्र मुहूर्त्तमात्रशब्देनैतदपि बोधितम् । निरूहप्रत्यागमनकालो मुहूर्त्तमात्रः ।।१४३-१४४।। यहाँ 'मुहूर्त्तमात्र' पद से यह समझना चाहिये कि जितने समय में निरूह द्रव बाहर निकलता है उतने समय का नाम मुहूर्त्तमात्र है ।।१४३-१४४।। अनायातं मुहूर्त्त तु निरूहं शोधनैर्हरेत् । निरूहैरेव मतिमाञ्क्षारमूत्राम्लसैन्धवैः ।।१४५।। यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः । लाघवं चोपजायेत सुनिरूहं तमादिशेत् ।।१४६।। मुहूर्त्त भर प्रतीक्षा करने पर यदि निरूह बस्ति में प्रयुक्त द्रव्य बाहर न निकले तो जवाखार, गोमूत्र, अम्ल, सेंधा नमक के निरूहण द्वारा निरूह बस्ति के द्रव्य को बाहर निकाले । जिस मनुष्य के क्रमानुसार मल, पित्त, कफ तथा वायु निकलते हैं तथा शरीर में लघुता मालूम होती है उस मनुष्य को सुनिरूह (भलीभांति निरूहण हुआ) कहते हैं ।।१४५-१४६।। यस्य स्याद्वस्तिरत्यल्पवेगो हीनमलानिलः । मूर्च्छाऽऽर्त्तिजाड्यारुचिमान्दुर्निहं तमादिशेत् ।।१४७।। जिस मनुष्य को बस्ति बहुत धीरे निकले, मल तथा तथा वायु बहुत कम निकले और जो मूर्च्छा, पीड़ा, जड़ता और अरुचि से युक्त हो उसे दुर्निह (खराब निरूहण हुआ) कहते हैं ।।१४७।। ❖ विविक्तता मनस्तुष्टिः स्निग्धता व्याधिनिग्रहः । आस्थापनस्नेहबस्त्योः सम्यग्दाने तुलक्षणम् ।।१४८।। दी हुई औषधियों का बाहर निकल जाना, मन की प्रसन्नता, स्निग्धता, व्याधिनिग्रह (रोग में कमी) ये सब आस्थापन तथा स्नेह बस्ति के भलीभाँति दिये जाने के लक्षण हैं ।।१४८।। ❖ विविक्तता = दत्तौषधनिःसरणम् ।।१४८।।