भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1075, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1075

१०२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहां 'विविक्ता' का 'दी हुई ओषधियों का बाहर निकल जाना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ अनेन विधिना युञ्ज्यान्निरूहं बस्तिदानवित् । द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थ वा यथोचितम् ।। १४९ ।। सस्नेह एकः पवने पित्ते द्वौ पयसा सह । कषायकटुमूत्राद्याः कफेऽत्युष्णास्त्रयो हिताः ।। १५० ।। पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयूषरसैः क्रमात् । निरूढं भोजयित्वा च ततस्तमनुवासयेत् ।। १५१ ।। सुकुमारस्य वृद्धस्य बालस्य च मृदुर्हितः । बस्तिस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु तेषां हन्याद्बलायुषी ।। १५२ ।। दद्यादुत्क्लेशनं पूर्वं मध्य दोषहरं ततः । पश्चात्संशमनीयञ्च दद्याद्वस्तिं विचक्षणः ।। १५३ ।। बस्ति देने में चतुर वैद्य इस प्रकार से निरूह बस्ति दे, यदि उचित हो तो दूसरी बार, तीसरी बार और चौथी बार भी दे । वात रोग में स्नेह वाली एक बस्ति, पित्त रोग में दूध के साथ दो बस्ति तथा कफ रोग हो तो गर्म कषाय तथा कटु रसयुक्त पदार्थ तथा गोमूत्र आदि पदार्थों की तीन बस्ति देनी उत्तम होती है । पित्त, कफ तथा वायु से आक्रान्त हुये मनुष्य को क्रम से दूध की, मूँग के रस तथा मांसरस की वस्ति देनी चाहिये । जिसको निरूह बस्ति दी गई हो उसे भोजन के पश्चात् अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । सुकुमार शरीर वाले को, वृद्ध को तथा बालक को मृदु बस्ति हितकर है । यदि इन्हें तीक्ष्ण बस्ति दी जाय तो इनके बल तथा आयु का नाश होता है । चतुर वैद्य प्रथम उत्क्लेशन बस्ति तत्पश्चात् दोषहर बस्ति पुनः संशमनीय बस्ति दे ।। १४९-१५३।। अथोत्क्लेशनबस्तिमाह- एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा । हवुषाफलकल्कश्च बस्तिरुत्क्लेशनः स्मृतः ।। १५४।। उत्क्लेशन वस्ति-रेंड के बीज, मुलेठी, पीपल, सेंधानमक, वच और हाऊबेर के फल का कल्क, इनकी बस्ति को उत्क्लेशन (दोषों को बहिर्गमनोन्मुख करने वाली) बस्ति कहते हैं ।। १५४ ।। अथ दोषहरबस्तिमाह- शताह्वा मधुकं बिल्वं कौटजं फलमेव च । सकाञ्जिकः सगोमूत्रो बस्तिर्दोषहरः स्मृतः ।। दोषहर बस्ति-शतावरी, मुलेठी, बेल का गूदा, इन्द्रजौ इनको कांजी तथा गोमूत्र में पीस कर उससे जो बस्ति दी जाती है उसे दोषहर बस्ति कहते हैं ।। १५५ ।। अथ शमनबस्तिमाह- प्रियङ्गुर्मधुकं मुस्ता तथैव च रसाञ्जनम् । सक्षीरः शस्यते बस्तिर्दोषाणां शमनः स्मृतः ।। शमन बस्ति-फूल प्रियङ्गु, मुलेठी, नागरमोथा और रसौत इन सबको दूध में पीस कर जो बस्ति दी जाती है उसे संशमनीय बस्ति कहते हैं । इस बस्ति से दोषों का शमन होता है ।। १५६ ।। अथ लेखनबस्तिमाह- त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमायुतः । १ऊषकादिप्रतीवापैर्बस्तयो लेखनाः स्मृताः ।। १५७ ।। लेखन बस्ति-हरड़, बहेड़ा, आँवला के क्वाथ, गोमूत्र, शहद, जवाखार, ऊषकादि गणोक्त (खारी मिट्टी, तूतिया, हींग, दो प्रकार के कसीस, सेंधानमक, शिलाजीत) चूर्ण के प्रक्षेप युक्त जो बस्ति दी जाती है वह लेखन बस्ति कहलाती है ।। १५७।। ❖ ऊषकादिप्रतीवापाः=ऊषकादिगणविशेषचूर्णप्रक्षेपाः ।। १५७ ।। १. ऊषकादिगणस्तु-ऊषकस्तुत्थको हिङ्गुकाशीसद्वयसैन्धवम् । सशिलाजतु (वा.सू.अ. १५) ।

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 1075, कुल 1167 में से · BharatKosha