भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1076, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२५ यहाँ 'ऊषकादिप्रतीवापाः' पद का 'ऊषकादि गणोक्त चूर्ण का प्रक्षेप' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५७॥ अथ बृंहणबस्तिमाह- बृहंणद्रव्यनिक्वाथैः कल्कैर्मधुरकैर्युताः । सर्पिर्मांसरसोपेता बस्तयो बृंहणाः स्मृताः ।। १५८ ।। बृंहणबस्ति—धातुओं के बढ़ाने वाले द्रव्यों के क्वाथों से तथा मधुर पदार्थों के कल्क, घी एवं मांलरस से जो बस्ति दी जाती है उसे बृंहण बस्ति कहते हैं। इस बस्ति से धातुओं की वृद्धि होती है ॥१५८॥ अथ पिच्छिलबस्तमाह- बदर्यैरावतीशेलुशाल्मलीपुष्पजाङ्कुराः । क्षीरसिद्धाः क्षौद्रयुक्ता नाम्ना पिच्छिलसंज्ञिताः ।। १५९ ।। अजोरभ्रैणरुधिरैर्युक्ता देया विचक्षणैः । मात्रा पिच्छिलवस्तीनां पलैर्द्वादशभिर्मता ।। १६० ।। पिच्छिलबस्ति—बेर, नारङ्गी, लिसोरा, सेमर के फूलों के अङ्कुर इनको दूध में पकाकर मधु डाल कर बकरा, भेड़ तथा काले मृग के रक्त के साथ जो बस्ति दी जाती है उसे पिच्छिल बस्ति कहते हैं। पिच्छिल बस्ति की मात्रा बारह पल की कही गई है ॥१५९-१६०॥ ❖ अजः=छागः, उरभ्रः=मेषः, एणः=कृष्णमृगः ।। १५९-१६०।। यहाँ 'अज' से 'बकरा', 'उरभ्र' से 'भेड़ा', 'एण' से 'काले मृग' का बोध करना चाहिये ॥ अथ निरूहमात्राविधिमाह- दत्त्वादौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतिद्वयम् । विनिर्मथ्य ततो दद्यात्स्नेहस्य प्रसृतित्रयम् ।।१६१।। एकीभूते ततः स्नेहे कल्कस्य प्रसृतिं क्षिपेत् । सम्मूर्च्छिते कषायन्तु चतुःप्रसृतिसम्मितम् ।। १६२ ।। गृह्णीयाञ्च तदा वाऽल्पमन्ते द्विपसृतोन्मितम् । क्षिप्त्वा विमथ्य दद्याञ्च निरूहं कुशलो भिषक् ।।१६३।। एवं प्रकल्पितो बस्तिर्द्वादशप्रसृतिर्भवेत् । वाते चतुष्पलं क्षौद्रं दद्यात् स्नेहस्य षट्पलम् ।। १६४ ।। पित्ते चतुष्पलं क्षौद्रं स्नेहं दद्यात्पलत्रयम् । कफे तु षट्पलं क्षौद्रं क्षिपेत् स्नेहं चतुष्पलम् ।।१६५।। निरूह बस्ति की मात्रा—पहले एक तोला सेंधा नमक लेकर दो प्रसृति (१६ तोला) मधु डालकर खूब घोटे। इसके बाद उसमें तीन प्रसृति (२४ तोला) स्नेह देकर सबको मर्दन करके खूब मिलाले जब सब एक में मिल जाय तो उसमें एक प्रसृति (८ तोला) ओषधि कल्क डालकर घोटे फिर चार प्रसृति (३२ तोला) क्वाथ और उसके बाद दो प्रसृति (१६ तोला) प्रक्षेप्य द्रव्य का उत्तम चूर्ण डालकर तथा सबको भलीभाँति मर्दन, कर विद्वान् वैद्य निरूह बस्ति दे। इस प्रकार तैयार की हुई बस्ति परिमाण में बारह प्रसृति (९६ तोला) होती है। विशेष वक्तव्य यह है कि—वातरोग में चार पल (१६ तोला) मधु और छः पल (२४ तोला) स्नेह डाले। पित्तजन्य विकार में चार पल (१६ तोला) मधु और तीन पल (१२ तोला) स्नेह डाले। यदि कफसम्बन्धी रोग हो तो छः पल (२४ तोला) मधु और चार पल (१६ तोला) स्नेह डालना चाहिये ॥१६१-१६५॥ अथ मधुतैलकबस्तिमाह- एरण्डक्वाथतुल्यांशं मधुतैलं पलाष्टकम् । शतपुष्पापलार्द्धेन सैन्ध