भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1072

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०२१ ❖ अनन्तययः=अबाधः ।।१२३।। यहाँ 'अनत्यय' पद का 'अबाध' अर्थात् कोई हानिकारक नहीं होती है—यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२३।। तथा निरूहः स्निग्धानामलपंमात्रः प्रशस्यते । अथ वा यस्य तत्कालं स्नेहो निर्याति केवलः । तस्याप्यल्पतरो देयो न हि स्निग्धेऽवतिष्ठते. ।।१२४।। स्निग्ध शरीर वालों के लिये थोड़ी मात्रा में निरूहबस्ति देना उचित होता है। अथवा जिस रोगी को स्नेह बस्ति देने पर तत्काल ही केवल स्नेह (तेल) गुदा के मार्ग से बाहर निकल आता हो उसके लिये अत्यन्त थोड़ी मात्रा स्नेह की बस्ति देने में लेनी चाहिये। क्योंकि स्निग्ध शरीर में बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह नहीं ठहरता ।।१२४।। ❖ अवतिष्ठते दत्तः स्नेह इति शेषः ।।१२४।। यहाँ 'बस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह' यह ऊपर से समझ लिया जाता है ।।१२४।। अशुद्धस्य मलोन्मिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः । तदाऽङ्गसदनाध्माने शूलं श्वासश्च जायते ।।१२५।। पक्वाशये गुरुत्वञ्च तत्र दद्यान्निरूहणम् । तीक्ष्णं तीक्ष्णौषधैर्युक्तं फलवर्त्तिमथापि वा ।।१२६।। यथाऽनुलोमनो वायुर्मलः स्नेहश्च जायते । तथा विरेचनं दद्यात्तीक्ष्णं नस्यञ्च शस्यते ।।१२७।। यस्य नोपद्रवं कुर्यात्स्नेहवस्तिरनिःसृतः । सर्वोऽल्पो व्यावृत्तो रौक्ष्यादुपेक्ष्यः स विजानता ।।१२८।। अनायातं त्वहोरात्रे स्नेहं संशोधनैर्हरेत् । स्नेहबस्तावनायाते नान्यः स्नेहो विधीयते ।।१२९।। जिसकी अच्छी तरह से शुद्धि नहीं हुई है ऐसे मनुष्य का मल से मिला हुआ स्नेह जब पुनः बाहर नहीं निकलता तब उसके अङ्गों में शिथिलता आ जाती है तथा अफारा, शूल और श्वास उत्पन्न हो जाता है और पक्वाशय में गुरुता होती है। ऐसी अवस्था होने पर तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण निरूह बस्ति देनी चाहिये । अथवा वस्त्रादि में औषध लपेट कर उसकी बत्ती बनाकर गुदा में देनी चाहिये जिससे कि वायु का अनुलोमन होकर मल के सहित स्नेह बाहर निकल आवे। उक्त अवस्था में विरेचन एवं नस्य भी देना उत्तम होता है। स्नेहबस्ति देने पर यदि वह बाहर न निकलने से कोई उपद्रव न करे तो यह समझना चाहिये कि उसके शरीर में रूक्षता होने से सम्पूर्ण अथवा थोड़ा स्नेह शरीर ने सोख लिया है अतः चतुर वैद्य उसकी उपेक्षा कर दे। अर्थात् उस स्नेह को बाहर निकालने का यत्न न करे । यदि एक दिन एक रात्रि व्यतीत हो जाने पर भी स्नेह बाहर न निकले तो उसे संशोधन के उपाय द्वारा बाहर निकाले । न कि उसे निकालने के लिये पुनः दुबारा स्नेह बस्ति का प्रयोग करे ।।१२५-१२९।। गुडूच्येरण्डपूतीकभार्ङ्गीवृषकरौहिषम् । शतावरीसहचरौ काकनासां पलोन्मिताम् ।।१३०।। यवमाषातसीकोलकुलत्थान्प्रसृतोन्मितान् । चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा द्रोणशेषेण तेन च ।।१३१।। पचेत्तैलाढकं सर्वैर्जीवनीयैः पलोन्मितैः । अनुवासनमेतद्धि सर्ववातविकारनुत् ।।१३२।। सभी प्रकार के वातसम्बन्धी विकारों को दूर करने वाली अनुवासन बस्ति—गिलोय, एरण्ड, (रेंड़ी), करञ्ज, भारङ्गी, अडूसा, रोहिस घास, शतावर, कटसरैया, काकनासा, इन सबों को एक-एक पल (चार-चार तोले) लेकर और जौ, उड़द, अलसी, बेर की गुठली, कुलथी इन सबों को दो-दो पल लेकर ४ द्रोण जल में पकावे जब एकं द्रोण जल शेष रह जाय तब उतार ले पुनः इस क्वाथ में जीवनीयं१ गण की ओषधियाँ एक-एक लेकर उनका कल्क पीस कर डाल दे और एक आढक (६४ पल) तेल के साथ पकावे जब केवल स्नेह भाग शेष रह जाय तब उतार ले। इस स्नेह से अनुवासन बस्ति देने से सभी प्रकार के वातरोगों का नाश होता है ।।१३०-१३२।। १. जीवनीयगणे यथा चरके—जीवकर्षभकौ, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती, मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्तीति । अर्थ—जीवक, ऋषभक, भेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलेठी ये १० ओषधियां जीवनीय होती हैं अतः ये जीवनीयगण की कहलाती हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA