भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०११ व्यावृत्तेऽक्षिण घृताम्यक्तेपीडनञ्च शनैः शनैः । हनुमोक्षे स्मृतः स्वेदो नस्यञ्च श्लेष्मवातहृत् ।। २७ ।। रक्तपित्तविधानेन रक्तष्ठीवमुपाचरेत् । धात्रीरसाञ्जनोशीरलाजाचन्दनवारिभिः ।। २८ ।। मन्थं कृत्वा पाययेच्च सघृतं क्षौद्रशर्करम् । शाम्यन्त्यनेन तृष्णाऽऽढ्या रोगाश्छर्दिसमुद्भवाः ।। २९ ।। हृत्कण्ठशिरसां शुद्धिर्दीप्ताग्नित्वञ्च लाघवम् । कफपित्तविनाशश्च सम्यग्वान्तस्य लक्षणम् ।। ३० ।। ततोऽपराह्ने दीप्ताग्निं मुद्गषष्टिकशालिभिः । हृद्यैश्च जाङ्गलरसैः कृत्वा यूषञ्च भोजयेत् ।। ३१ ।। तन्द्रा निद्राऽऽस्यदौर्गन्ध्यं कण्डूश्च ग्रहणी विषम् । सुवान्तस्य न पीडायै भवन्त्येते कदाचन ।। ३२ ।। अजीर्णं शीतपानीयं व्यायामं मैथुनं तथा । स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।। ३३ ।। यदि आँख की पुतलियाँ ऊपर की ओर चढ़ गई हों तो आँखों में घी लगाकर धीरे-धीरे भीतर को दबाना चाहिये । यदि दोनों जबड़े एक में न मिलते हों अर्थात् मुख फैल गया हो तो स्वेदन कराना चाहिये तथा कफ और वातनाशक ओषधियों का नास देना चाहिये अर्थात् नाक में डालना चाहिये । यदि थूक के साथ रक्त दिखाई पड़ता हो तो रक्तपित्त वाले रोगी की जैसी चिकित्त्स्र की जाती है वैसी करनी चाहिये । आमला, रसवत, खस ओर धान का लावा इन सबों को सफेद चन्दन मिश्रित जल के साथ खूब मथ कर उस में घी, शक्कर तथा शहद डाल कर पिलाया जाय तो इससे अति वमन होने से उत्पन्न हुये पूर्वोक्त प्यास आदि रोग (उपद्रव) शान्त हो जाते हैं। उत्तम रीति से वमन होने पर—हृदय, गला तथा सिर की शुद्धि (हल्का तथा साफ होना), अग्नि का प्रदीप्त होना, शरीर हल्का मालूम पड़ना और कफ तथा पित्त का दोष नष्ट हो जाना ये जब लक्षण उत्पन्न होते हैं। उसके बाद (उत्तम रीति से वमन हो जाने के बाद) अपराह्न (२ बजे के बाद) में प्रदीप्त अग्नि वाले पुरुष को मूँग की दाल, साठी या अगहनी धान का चावल तथा हृदय के लिये हितकर (रुचकारी) जङ्गली जीवों का मांस का रस (सुरुवा) इन सबों का जूस बनाकर भोजन के लिये देना चाहिये । जिसे भलीभाँति वमन हुआ है उसके लिये तन्द्रा, मुख से दुर्गन्ध निकलना, खुजली, संग्रहणी और विष ये सब कभी पीड़ा देने वाले नहीं होते । बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वमन करने पर एक दिन तक अजीर्ण भोजन, शीतल जल, व्यायाम (कसरत आदि), मैथुन (स्त्रीसङ्ग) तेल की मालिश और क्रोध इन सबों को छोड़ दे ।।२७-३३।। इति वमनाधिकारः अथ विरेचनम् तत्रादौ विरेचनार्हसमयजनानाह- स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय दद्यात्सम्यग्विरेचनम् । अवान्तस्य त्वधःस्रस्तो ग्रहणीं छादयेत्कफः ।।३४।। मन्दाग्निं गौरवं कुर्याज्जनयेद्वा प्रवाहिकाम् । अथ वा पाचनैरामं बलासं परिपाचयेत् ।।३५।। ऋतौ वसन्ते शरदि देहशुद्धौ विरेचयेत् । अन्यदाऽऽत्ययिके कार्ये शोधनं शीलयेद् बुधः ।।३६।। विरेचन के योग्य समय तथा व्यक्ति का निर्देश—प्रथम मनुष्य को स्नेहपान तथा स्वेदन करा कर वमन करा चुकने पर उत्तम रीति से विरेचन दे क्योंकि बिना वमन कराये ही विरेचन देने पर उस मनुष्य का कफ नीचे खिसक कर ग्रहणी को ढक लेता है और उससे मन्दाग्नि तथा शरीर में गुरुता उत्पन्न हो जाती है अथवा प्रवाहिका रोग हो जाता है । यदि वमन न कराया हो तो प्रथम अपरिपक्व कफ का पाचन ओषधियों के द्वारा करावे । वसन्त तथा शरद् ऋतु में ही देहस्थित दोषों की शुद्धि के लिये विरेचन लेना उचित है । यदि प्राण सङ्कट में हो अर्थात् शोधन करना उस समय अत्यावश्यक हो तो बुद्धिमान मनुष्य वसन्तादि से अन्य ऋतुओं में भी विरेचनादि द्वारा देहशोधन कर ले ।।३४-३६।। ❖ आत्ययिके=प्राणसंकटे ।। ३४- ३६ ।। यहाँ 'आत्ययिके' पद का 'प्राण-सङ्कट में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४-३६।। पित्ते विरेचनं युञ्ज्यादामोद्भूते गदे तथा । उदरे च तथाऽऽध्माने कोष्ठशुद्धौ विशेषतः ।।३७।। दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । शोधनैः शोधिता ये तु न तेषां पुनरुद्भवः ।।३८।।