भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1063, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 1063

१०१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बालो वृद्धो भृशं स्निग्धः क्षतक्षीणे भयान्वितः। श्रान्तस्तृषाऽऽर्त्तः स्थूलश्च गर्भिणी च नवज्वरी ।।३९।। नवप्रसूता नारी च मन्दाग्निश्च मदात्ययी। शल्यार्दितश्च रूक्षश्च न विरेच्या विजानता ।।४०।। जीर्णज्वरी गरव्याप्तो वातरोगी भगन्दरी। अर्शः पाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः ।।४१।। योनिरोगप्रमेहार्त्ता गुल्मप्लीहव्रणार्दिताः। विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्ठसंयुताः ।।४२।। कर्णनासाशिरोवक्त्रगुदमेढ्रामयान्विताः। प्लीहशोथाक्षिरोगार्त्ताः कृभिक्षारानिलार्दिताः ।।४३।। शूलिनो मूत्राघातात्र्त्ता विरेकाहाँ नरा मताः ।।४४।। पित्त की अधिकता, आमसम्बन्धी रोग, उदररोग तथा आध्मान (अफारा) होने पर एवं विशेषतः कोष्ठ की शुद्धि के लिये विरेचन अवश्य लेना चाहिये। केवल लङ्घन तथा पाचनद्वारा ही शान्त किये गये वातादि दोष सम्भव है कि किसी समय पुनः कुपित हो जायें, किन्तु जो शोधन (विरेचनादि) द्वारा किये गये हैं उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् पुनः वे प्रकुपित नहीं होते हैं। बालक, वृद्ध, स्नेहपानद्वारा अत्यन्त स्निग्ध हुये, क्षत (घाव) से क्षीण, भय से युक्त, परिश्रम करने से थके हुये, प्यास से दुःखी, स्थूल शरीर वाले, गर्भिणी स्त्री, नवीन ज्वर वाले रोगी, तत्काल प्रसव जिसे हुआ हो ऐसी स्त्री, मन्दाग्निवाले, मदात्यय रोग युक्त, शल्य (बाण आदि) लगने से पीड़ित तथा रूक्ष शरीर वाले जो हों उन्हें बुद्धिमान वैद्य कभी विरेचन न देवे। पुराने ज्वर वाले, विष से व्याप्त शरीर वाले, वातरोगी, भगन्दर, अर्श, पाण्डु, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), हृद्रोग तथा अरुचि से पीड़ित, योनिसम्बन्धी रोग से पीड़ित स्त्री, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा तथा व्रण से पीड़ित, विद्रधि, वमन, विस्फोट, हैजा तथा कुष्ठ से युक्त, कान, नाक, सिर, मुख, गुदा तथा शिश्न (मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी रोग वाले, प्लीहाजन्य शोथ तथा नेत्रसम्बन्धी रोग से युक्त, कृमि, क्षार तथा वायु से पीड़ित, शूल रोग वाले तथा मूत्राघात से दुःखी जो हों वें विरेचन देने के योग्य माने गये हैं ।।३७-४४।। अथ मृदुमध्यमक्रूरकोष्ठँस्तद्योग्यमात्राद्रव्यादीनि चाह- बहुपित्तो मृदुः कोष्ठो बहुश्लेष्मा च मध्यमः। बहुवातः क्रूरकोष्ठो दुर्विरेच्यः स कथ्यते ।।४५।। मृद्वी मात्रा मृदौ कोष्ठे मध्यकोष्ठे च मध्यमा। क्रूरे तीक्ष्णा मता द्रव्यैर्मृदुमध्यमतीक्ष्णकैः ।।४६।। मृदुर्द्राक्षापयश्चञ्चुतैलैरिप विरिच्यते। मध्यमस्त्रिवृतातिक्राराजवृक्षैर्विंरिच्यते। क्रूरः स्नुक्पयसा हेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः ।।४७।। मृदु, मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ वाले मनुष्यों तथा उनके योग्य मात्रा एवं द्रव्यों का वर्णन-अधिक पित्त वालों का कोष्ठ मृदु, अधिक कफ वालों का मध्यम तथा अधिक वात वालों का क्रूर होता है और इनका विरेचन बड़ी कठिनता से होता है। अतएव यह दुर्विरेच्य कहलाते हैं। मृदु कोष्ठ होने पर रोगी के लिये विरेचन द्रव्यों की मात्रा मृदु, मध्यम कोष्ठ होने पर मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ होने पर तीक्ष्ण मात्रा देनी उचित है। मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले रोगियों को क्रम से मृदु, मध्यम तथा तीक्ष्ण वीर्य वाले द्रव्यों से विरेचन कराना उचित है। मृदु कोष्ठ वालों को दाख, दूध तथा एरण्ड के तेल के द्वारा, मध्यम कोष्ठ वालों को निशोथ, कुटकी तथा धनबहेरा (अमलतास) के द्वारा और क्रूर कोष्ठ वालों को थूहर का दूध, चोक तथा बड़ी दन्ती के फल (जमालगोटा) के द्वारा विरेचन कराना उचित होता है ।।४५-४७।। ❖ चञ्चुतैलम्=एरण्डतैलम् । राजवृक्षः=धनबहेरा । हेमक्षीरी(चोक) । दन्तीफलं=बृहद्दन्तीफलम्, जयपालेति प्रसिद्धम् ।।४५-४७।। यहाँ 'चञ्चुतैल' से 'एरण्ड का तैल', 'राजवृक्ष' से 'धनबहेरा' (अमलतास), 'हेमक्षीरी' से 'चोक' तथा 'दन्तीफल' से 'बड़ी दन्ती का फल लोकप्रसिद्ध जमालगोटा' का बोध करना चाहिये ।।४५-४७।। मात्रोत्तमा विरेकस्य त्रिंशद्वेगैः कफान्तिका। वेगैर्विंशतिभिर्मध्या हीनोक्ता दशवेगिका ।।४८।। द्विपलं श्रेष्ठमाख्यातं मध्यमं च पलं भवेत्। पलार्द्धं च कषायाणां कनीयस्तु विरेचनम् ।।४९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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