भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०१० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'राठफल' पद का 'मयन फल' अर्थ समझना चाहिये ॥१७-२०॥ सश्लेष्मवातपीडायां सक्षीरं मदनं पिबेत् । अजीर्णे कोष्णपानीयं सिन्धुं पीत्वा वमेत्सुधीः ॥२१॥ कफयुक्त-वातसम्बन्धी पीड़ा में मयनफल के चूर्ण के साथ दूध पिलाकर तथा अजीर्ण होने पर किंचित् गर्म जल में सेंधा नमक छोड़कर उसे पिलाकर वमन करावे ॥२१॥ ❖ मदनं=मयनफलम् ॥२१॥ यहाँ 'मदन' पद का 'मैनफल' अर्थ समझना चाहिये ॥२१॥ वमनं पाययित्वा तु जानुमात्रासने स्थितम् । कण्ठमेरण्डनालेन स्पृशन्तं वामयेद्भिषक् ॥२२॥ प्रसेको हृद्ग्रहः कोठः कण्डूर्दुश्छर्दिते भवेत् । अतिवान्ते भवेत्तृष्णा हिक्कोद्गारो विसंज्ञिता ॥२३॥ जिह्वानिःसरणं चाक्ष्णोर्व्यावृत्तिर्हनुसंहतिः । रक्तच्छर्दिः ष्ठीवनञ्च कण्ठपीडा च जाय