भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1065, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1065

१०१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाभयादिमोदकः- अभया मरिचं शुण्ठीविडङ्गामलकानि च। पिप्पलो पिप्पलीमूलं त्वक्पत्रं मुस्तमेव च ।।५९।। एतानि समभागानि दन्ती तु त्रिगुणा भवेत्। त्रिवृताऽष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ।।६०।। मधुना मोदकान्कृत्वा कर्षमात्रान्प्रमागतः। एकैकं भक्षयेत् प्रातः शीतञ्चानु पिबेज्जलम् ।।६१।। तावद्विरिच्यते जन्तुर्यावदुष्णं न सेवते। पानाहार विहारेषु भवेन्नियन्त्रणः सदा ।।६२।। विषमज्वरमन्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामिकुष्ठगुल्मार्शोगलगण्डोदरभ्रमान् ।।६३।। विदाहप्लीहमेहांश्च यक्ष्माणं नयनामयान्। वातरोगांस्तथाऽऽध्मानं मूत्रकृच्छादि चाश्मरीम् ।।६४।। पृष्ठपार्श्वोरुजघनजङ्घोदररुजं जयेत्। स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।।६५।। सततं शीलनादेव पलितानि प्रणाशयेत्। अभयामोदका होते रसायनवराः स्मृताः ।।६६।। अभयादिमोदक-बड़ी हर्रें, मरिच, सोंठ, वायविडङ्ग, आमला, पीपर, पिपरामूल, तज, तेजपात और नागरमोथा इन सबों का चूर्ण सम भाग एकत्र कर उसमें ३ गुना दन्ती के जड़ का चूर्ण, ८ गुना निसोध का चूर्ण और ६ गुना साफ शक्कर मिला कर शहद के साथ १ कर्ष (१ भर) के बराबर-बराबर लड्डू बनाकर रख ले, उसमें से एक-एक लड्डू प्रतिदिन प्रातः काल खाकर ऊपर से शीतल जल पी ले, इससे तब तक विरेचन होता रहेगा जब तक गर्म जल का गर्म अन्न न खावे। इसके सेवन करने के समय सदा खाने, पीने तथा चलने-फिरने आदि में किसी तरह का नियम नहीं करना पड़ता है। सेवन करने से यह निष्मज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डु, कास, भगन्दर, बवासीर, कुष्ठ, गुल्म, गलगण्ड, उदररोग, भ्रमरोग, विदाह, प्लीहा, मेह्रोग, यक्ष्मा, नेत्र तथा वातसम्बन्धी रोग, अफरा, मूत्रकृच्छादि मूत्रसम्बन्धी रोग, पथरी एवं पीठ, पंसुली, ऊरु, जङ्घा तथा उदर की पीड़ा को दूर करता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वह जिस दिन इसका सेवन करे उस दिन तेल की मालिश और क्रोध करना छोड़ दे। इसका निरन्तर सेवन करने से पलित (अकाल में वाल पक जाना) रोग नष्ट हो जाता है। अतएव यह अभयामोदक रसायनों में उत्तम रसायन माना गया है ।।५९-६६।। अथ विरेकोत्तरकर्माणयाह- पीत्वा विरेचनं शीतजलैः संसिच्य चक्षुषी। सुगन्धि किञ्चिदाघ्राय ताम्बूलं शीलयेद् बुधः ।।६७।। निर्वातस्थो न वेगांश्च धारयेन्न शयीत च। शीताम्बु न स्पृशेत्क्वापि कोष्र्णानीरं पिबेन्मुहुः ।।६८।। बलासौषधपित्तानि वायुर्वान्ते यथा व्रजेत्। रेकात्तथा मलं पित्तं भेषजञ्च कफो व्रजेत् ।।६९।। विरेचन लेने के बाद कर्त्तव्य कर्म-विरेचन ओषधि पीने के बाद दोनों आँखों में शीतल जल का छींटा देकर और कोई सुगन्धित पदार्थ इत्र आदि थोड़ा सूंघ कर पान खाना चाहिये और वायुरहित स्थान में बैठना चाहिये। शौच का वेग रोकना, सोना तथा शीतल जल का स्पर्श कभी भी नहीं करना चाहिये बल्कि किञ्चित् गर्म जल बारम्बार पीना चाहिये। वमन करने पर जिस तरह से कफ, औषध, पित्त तथा वायु मुख की राह से निकलता है, उसी तरह से विरेचन ❖ लेने पर गुदा की राह से मल, पित्त, औषध तथा कफ निकलता है ।।६७-६९।। अथ दुर्वरिक्तातिविरिक्तयोर्लक्षणानि भेषजं चाह- दुर्वरिक्तस्य नाभेस्तु स्तबन्द्यता कुक्षिशूलरुक्। पुरीषवातसङ्गश्च कण्डूमण्डलगौरवम् ।।७०।। विदाहोऽरुचिराध्मानं भ्रमश्छर्दिश्च जायते। तं पुनः पाचनैः स्नेहैः पक्त्वा स्निग्धं तु रेचयेत् ।। तेनास्योपद्रवा यान्ति दीप्ताग्निर्लघुता भवेत् ।।७१।। विरेकस्यातियोगेन मूर्च्छा भ्रंशो गुदस्य च। शूलं कफात्तियोगः स्यान्मांसाधावनसन्निभम् ।।७२।। मेदोनिभं जलाभासं रक्तञ्चापि विरिच्यते। तस्य शीताम्बुभिः सिक्त्वा शरीरं तण्डुलाम्बुधि ।।७३।। मधुमिश्रैस्तथा शीतैः कारयेद्वमनं मृदु। सहकारत्वचः कल्को दध्ना सौवीरकेण वा ।।७४।। पिष्ट्वा नाभिप्रलेपेन हन्त्यतीसारमुल्वणम्। सौवीरं तु यवैरामैः पक्वौर्वा निस्तुषीकृतैः ।।७५।।