भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1066, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१५ जिसे भलीभाँति विरेचन नहीं हुआ या अधिक विरेचन हुआ है उसके क्रम से लक्षण तथा औषध— जिसे भली- भाँति विरेचन नहीं हुआ है उसकी नाभि का स्तब्ध होना, कोख में शूल तथा पीड़ा होना, मल तथा अधोवायु का रुक जाना, देह में खुजली होना तथा चकत्ते पड़ जाना, गुरुता (शरीर भारी मालूम पड़ना), दाह, अरुचि, अफारा, भ्रम तथा वमन का होना ये सब लक्षण होते हैं। उपचार—ऐसे लक्षण वाले को पाचन ओषधि द्वारा प्रथम आम का पाचन करके पश्चात् स्नेहपान द्वारा स्निग्ध करके पुनः विरेचन औषध देकर रेचन करावे, ऐसा करने से पूर्वोक्त सब उपद्रव शान्त हो जाते हैं एवं अग्नि प्रदीप्त होती है तथा शरीर में लघुता उत्पन्न होती है। जिसे आवश्यकता से अधिक विरेचन हुआ है उसके मूर्च्छा, गुदभ्रंश (काँच का निकल आना), शूल, कफ का अधिक निकलना और मांस के धोवन के समान या भेद के समान अथवा जल के समान गुदा से रक्त का निकलना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। उपचार—उक्त लक्षणयुक्त मनुष्य को उस समय उसके शरीर को शीतल जल से सींचकर शीतल चावल के धोवन में शहद मिलाकर पिलाने के द्वारा मृदु (थोड़ा) वमन करावे और आम के पेड़ की छाल को दही अथवा सौवीर के साथ चटनी के समान पीस कर नाभि पर लेप करावे, इससे उग्र अतीसार भी नष्ट हो जाता है और कच्चे तथा पक्के भूसी रहित जौ के द्वारा सौवीर बनता है ॥७०-७५॥ ❖ सौवीरं=सन्धानवम् ।।७०-७५।। यहाँ 'सौवीर बनता है' इसका अर्थ 'सन्धान करने से सौवीर बनता है' यह समझना चाहिये ॥७०-७५॥ अजाक्षीरं रसञ्चापि वैष्किरं हारिणं तथा। शालिभिः षष्टिकैस्तुल्यैर्मसूरैर्वापि भोजयेत् ।।७६।। शालि (जड़हन) या साठी धान के चावल के साथ उसके बराबर बकरी का दूध, विष्किर पक्षियों के या हरिण के मांस का रस अथवा मसूर के जूस के साथ भोजन के लिये देना चाहिये ॥७६॥ ❖ वर्त्तकालावविकिरकपिञ्जलकतित्तिराः । चकोरक्रकराद्याश्च विष्किराः समुदाहृताः । कपिञ्जल इति ख्यातो लोके कपिशतित्तिरः ।। क्रकरः 'कराट' इति लोके । हरिणस्ताम्रवर्णः स्याद् मृगः ।।७६।। यहाँ 'विष्किर पक्षियों' से बटेर, लवा, तीतर, कपिञ्जले, (कबरा-काला मिश्रित पीले वर्ण का) तीतर, चकोर, क्रकर (लोकप्रसिद्ध कराट) इन सबों का बोध करना चाहिये और 'हरिण' से 'तामे के समान वर्ण वाले मृग' को समझना चाहिये ॥७६॥ शीतैः संग्राहिभिर्द्रव्यैः कुर्यात्संग्रहणं भिषक् । लाघवे मनसस्तुष्टावनुलोमं गतेऽनिले ।।७७।। सुविरिक्तं नरं ज्ञात्वा पाचनं पाययेन्निशि । इन्द्रियाणां बलं बुद्धेः प्रसादो वह्निदीप्तता ।।७८।। धातुस्थैर्यं वयःस्थैर्यं भवेद्वेचनसेवनात् । प्रवातसेवां शीताम्बुस्नेहाभ्यङ्गमजीर्णताम् ।।७९।। व्यायामं मैथुनञ्चैव न सेवेत विरेचितः । शालिषष्टिकमुद्गाद्यैर्युवागू भोजयेत्कृताम् ।।८०।। वैद्य को चाहिये कि वह अधिक दस्त आने पर रोकने वाली शीतल ओषधियों से दस्त बन्द करे और जब रोगी के शरीर में लघुता मालूम पड़ने लगे तथा मन में प्रसन्नता एवं वायु का अनुलोमन अर्थात् अधोवायु यथावत् रीति से होने लगे तब उसका विरेचन बहुत अच्छी रीति से हुआ है यह समझ कर उसे रात्रि में पाचन ओषधि देवे। उचित विरेचन लेने से मनुष्य की इन्द्रियों में बल आता है, बुद्धि स्वच्छ होती है, अग्नि प्रदीप्त होती है, धातुओं की तथा आयु की स्थिरता है। विरेचन लेने वाला मनुष्य—अधिक वायु में रहना, शीतल जल, तेल की मालिश, अजीर्ण पैदा करने वाला भोजन, व्यायाम (कसरत आदि), मैथुन (स्त्री-सहवास) नकरे न करे और शालि (जड़हन) या साठी धान का चावल, मूँग आदि की दाल से बनाई गई युवागु का सेवन करे ॥७७-८०॥