भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००५ यहाँ 'क्रूराशयाः' पद का 'क्रूर कोष्ठ वाले' तथा 'सर्वतः' पद का 'सभी स्नेहों से अधिक' अर्थ समझना चाहिये ॥१७॥ अथ शीतादिकालवातादिदोषभेदाभ्यां स्नेहपानसमयभेदानाह- शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिके रात्रौ वातश्लेष्माधिके दिवा ॥ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद से स्नेह पीने के समयों में भेद—शीत काल में दिन के समय और ग्रीष्म काल में रात्रि के समय स्नेह पिलाना (पीना) उचित है। वात-पित्त की अधिकता रहने पर रात्रि में तथा वात-कफ की अधिकता रहने पर दिन में स्नेह पिलाना उचित है ॥१८॥ अथ नस्यादिषु तैलघृतयोः प्रयोगे नियममाह- नस्याभ्यञ्जनगण्डूषमूर्ध्वकर्णाक्षितर्पणे । तैलं घृतं वा युञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ॥१९॥ नस्य (नास) आदि लेने में तैल तथा घृत का प्रयोग—नस्य (नास) लेना, शरीर में मालिस करना