भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1055

१००४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अल्पा (कनिष्ठा) मात्रा अग्निदीपक तथा वीर्यवर्धक होती है और अल्प दोष वाले पुरुषों के लिये उत्तम होती है, ‘मध्यमा’ मात्रा स्नेहन करने वाली, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा भ्रमरोग नाशक होती है एवं ‘ज्येष्ठा’ मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहबाधा तथा मिर्गी को दूर करने वाली होती है ॥८-९॥ सुश्रुतः पुनरेवमाह- या मात्रा प्रथमे यामे गते जीर्यति वासरे। सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥१०॥ या मात्रा वासरस्यार्द्धे व्यतीते परिजीर्यति। सा वृष्या बृंहणी च स्यान्मध्यदोषे प्रपूजिता ॥११॥ या मात्रा चरमे यामे स्थितेऽह्नः परिजीर्यति। सा मात्रा स्नेहनी ज्ञेया बहुदोषेषु पूजिता ॥१२॥ केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम्। देयं बहुकफे वह्निव्योषक्षारसमन्वितम् ॥१३॥ मात्रा के विषय में सुश्रुत का मत-जो स्नेह की मात्रा दिन का एक प्रहर बीत जाने पर ही पच जाने वाली होती है, वह अग्नि को प्रदीप्त करने वाली तथा अल्प दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। जो मात्रा दिन के आधा भाग बीत जाने पर पच जाने वाली होती है वह वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा मध्यम दोष वालों के लिये उत्तम होती है। और जो मात्रा दिन के अन्तिम प्रहर में पचने वाली होती है वह स्नेहन करने वाली तथा अधिक दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। पित्त की अधिकता में केवल घृत-पान करने को देना चाहिये, वात की अधिकता में सेंधा नमक मिला कर घी देना चाहिये और कफ की अधिकता में चीता, सोंठ, पीपर, क्षार (जवाखार आदि) मिला कर घी पीने के लिये देना चाहिये ॥१०-१३॥ अथ सर्पिष्पानार्हजनानाह- रूक्षक्षतविषार्त्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिष्पानं प्रशस्यते ॥१४॥ घी पिलाने योग्य लोग-जो रूक्षता, क्षत (घाव) तथा विष से आर्त हों तथा जो वात और पित्तसम्बन्धी रोग से पीड़ित हों एवं जिनकी मेधा (धारण) शक्ति तथा स्मरण शक्ति हीन हो गई हो, ऐसे लोगों के लिये घी पिलाना उत्तम है ॥१४॥ अथ वसापानार्हजनानाह- कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धकफमेदसः। पिबेयुस्तैलसात्म्याश्च तलं दार्ढार्थिनस्तु ये ॥१५॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः। महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१६॥ तेल पिलाने योग्य लोग-जिनके कोष्ठ में कृमि पड़ गये हों या जो वातपीड़ित हों वा जिनका कफ तथा मेदा बढ़ गया हो अथवा जिन्हें तेल पीना सात्म्य (प्रकृति के अनुकूल) हो या शरीर को दृढ़ रखने की इच्छा हो ऐसे लोगों को तेल पिलाना (पीना) उचित है। वसा (चर्बी) पिलाने योग्य लोग-जो लोग व्यायाम (कसरत आदि) करने से कृश हो गये हों या जिनका वीर्य तथा रक्त सूख रहा हो या जो बड़े रोगी हों या जिनका जठराग्नि या वायु प्रबल हो या प्राण (बल) अधिक हो तो ऐसे लोग वसा पिलाने योग्य होते हैं ॥१५-१६॥ अथ मज्जः सर्पिषोऽपि पानार्हजनानाह- क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्त्ता दीप्तवह्नयः। मज्जानञ्च पिबेयुस्ते सर्पिर्वा सर्वतो हितम् ।। मज्जा तथा घी पिलाने योग्य लोग-जो क्रूर कोष्ठ वाले या क्लेश सहने वाले या वायु रोग से पीड़ित रहने वाले हैं, कि वा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हो ऐसे लोगों को अन्य सभी स्नेहों से अधिक हितकर समझ कर मज्जा या घी पिलाना उचित है ॥१७॥ क्रूराशयाः=क्रूरकोष्ठाः। सर्वतः=सर्वस्मात्स्नेहात् ॥१७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA