भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१००६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ स्नेहाजीर्णशङ्कायां कर्तव्यकर्मण्याह- स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः। तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा ।।२५।। स्नेह के न पचने की आशङ्का होने पर कर्त्तव्य कर्म-यदि किसी मनुष्य को स्नेह के न पचने की आशङ्का हो तो वह गर्म जल पीवे, इससे शुद्ध उद्गार (डकार) होता है तथा अन्न खाने की रुचि उत्पन्न होती है ।।२५।। अथ स्नेहपानजतृष्णायाः प्रशमोपायमाह- स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः। तदाऽस्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य पाययेत्। शीतलं पायसं तेन तृष्णा तस्य प्रशाम्यति ।।२६।। स्नेह पीने से उत्पन्न हुई प्यास की शान्ति का उपाय-स्नेह पीने से पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की जब जठराग्नि अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाती है तब उसे अधिक प्यास लगती है, ऐसी अवस्था में उसे शीतल खीर खिलानी चाहिये जिससे कि प्यास शान्त हो जाय ।।२६।। अथ स्नेहपानायोग्यजनानाह- अजीर्णी वर्जयेत्स्नेहमुदरी तरुणज्वरी। दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छालो मेहपीडितः ।।२७।। दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः। अकालप्रसवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।।२८।। स्नेह पीने के अयोग्य लोग-जिन लोगों को अजीर्ण अथवा उदरसम्बन्धी रोग हो या जो नवीन ज्वर के रोगी हों या दुर्बल हों कि वा जिन्हें अरुचि हो वा जो मोटे हों कि वा मूर्च्छा या मेहरोग से पीड़ित हों अथवा जिन्हें बरित या विरेचन दिया गया हो वा वमन कराया गया हो या प्यास लगी हो अथवा जो परिश्रम से थक गये हों और जिस स्त्री को असमय में प्रसव हुआ हो ऐसे लोगों को स्नेह पिलाना या पीना उचित नहीं है। दुर्दिन अर्थात् जिस दिन आकाश मेघों से घिरा हो उस दिन भी स्नेहपान कराना अनुचित होता हैं ।।२७-२८।। अथ स्नेहपानयोग्यजनानाह- स्वेद्यासंशोध्यमद्यास्त्रीव्यायामासक्तचित्तकाः ।।२९।। वृद्धबालकृशा रूक्षाः क्षीणास्त्राः क्षीणरेतसः। वातार्त्तास्तिमिरार्त्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम् ।। स्नेहपान के योग्य लोग-जिन्हें स्वेद देना हो या जिनका विरेचनादि द्वारा शोधन करना हों अथवा जो मद्य (शराब), स्त्री, व्यायाम (कसरत आदि) में आसक्त चित्तवाले हों कि वा वृद्ध, बालक, दुर्बल या रूक्ष शरीर वाले हों अथवा जिनका रक्त या वीर्य क्षीण हो गया हों और जो वातरोग या तिमिररोग से पीड़ित हों ऐसे लोगों को स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना उत्तम होता है ।।२९-३०।। अथ सम्यक्स्निग्धस्य लक्षणान्याह- वातानुलोम्यं दीप्ताग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम्। मृदुस्निग्धाङ्गताऽग्लानिः स्नेहद्वेषोऽथ लाघवम् ।।३०।। विमलेन्द्रियता सम्यक्स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।।३१।। स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुये लोगों के लक्षण-वायु का अनुलोमन होना (अधोवायु आदि का यथोक्त रीति से होना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, चिकनाई लिये मल का अलग-अलग निकलना, शरीर का कोमल तथा स्निग्ध होना, ग्लानि न मालूम पड़ना, स्नेह पीने से द्वेष होना, शरीर में हल्कापन, इन्द्रियों में निर्मलता ये सब लक्षण स्नेहपान से भलीभाँति स्निग्ध होने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं और रूक्षता रहने पर इससे विपरीत लक्षण रहते हैं ।।३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA