भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1040, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम्. १८९ मोटा लेप करके उसी के अन्दर पारे को बाँध कर कांजी भरे हुये दोलायन्त्र में लटका कर तीन दिन तक पकावे, ऐसा करने से पारे का स्वेदन होता है ॥१५०-१५३॥ ❖ मेघनादः= 'चौलाई' इति शाकविशेषः । मेषशृङ्गी (मेढ़ाशृङ्गी), तदभावे 'कर्कटशृङ्गी' ग्राह्या । नवसारं=नवसादरम् ।।१५०-१५३।। यहाँ 'मेघनाद' पद का 'चौलाई (शाकविशेष)' तथा 'मेषशृङ्गी' पद का 'मेढ़ाशृङ्गी' अर्थ समझना चाहिये। इसके अभाव में 'काकड़ाशिंगी' लेना चाहिये एवं 'नवसारम्' पद से 'नवसादर' समझना चाहिये ॥१५०-१५३॥ अन्यच्च- मूलकानलसिन्धूत्थत्र्यूषणार्द्रकराजिकाः । रसस्य षोडशांशेन द्रव्यं युञ्ज्यात् पृथक्पृथक् ।। द्रव्येष्वनुक्तमानेषु मतं मानमितं बुधैः । पट्टावृतेषु चैतेषु सूतं प्रक्षिप्य काञ्जिके ।।१५५।। स्वेदयेद्दिनमेकञ्च दोलायन्त्रेण बुद्धिमान् । स्वेदात्तीव्रो भवेत्सूतौ मर्दनाच्च सुनिर्मलः ।। १५६ ।। अन्य प्रकार - मूली, चीता, सेंधा नमक, सोंठ, पीपर, मिर्च, अदरख और राई इनमें से प्रत्येक पदार्थ पारे से सोलहवाँ भाग लेकर कल्क (चटनी) के समान बना डाले, 'जहाँ द्रव्यों का मान (तौल) न लिखा हो वहाँ जितने मान में द्रव्य लेने से कार्य ठीक हो उतना लेना चाहिये' यह परिभाषा सर्वत्र समझनी चाहिये, विशेषतः रसकर्म में तो अवश्य ही । पश्चात् उक्त कल्क का एक वस्त्र के ऊपर लेप करके उसके अन्दर पारा को रख कर और पोटली बना कर एक पात्र में कांजी रख कर उसी में दोला की भाँति उक्त पोटली को लटका कर दोलायन्त्र से एक दिन तक बुद्धिमान वैद्य स्वेदन करे । इस प्रकार स्वेदन कर्म करने से पारा तीव्र हो जाता है तथा आगे लिखी हुई रीति से मर्दन करने से अति निर्मल हो जाता है ।।१५४-१५६।। ❖ मूलकम् 'मुरई, मूली' वा इति लोके । अनलं=चित्रकम् । त्र्यूषणं=त्रिकुट । राजिका (राई) ।।१५४- १५६।। यहाँ 'मूलकम्' पद से 'मुरई या मूली' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वस्तु तथा 'अनल' से चित्रक (चीता)' । 'त्र्यूषणम्' से 'त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च)' और 'राजिका' से 'राई' का ग्रहण करना चाहिये ॥१५४-१५६॥ अथ मर्दनविधिमाह- इष्टिकाचूर्णचूर्णाभ्यामादौ मर्द्यो रसस्ततः । दध्ना गुडेन सिन्धूत्थराजिकागृहधूमकैः ।।१५७।। मर्दन की विधि स्वेदन के पश्चात् ईंट का चूर्ण तथा चूना से प्रथम पारे का खूब मर्दन करे उसके बाद जल से धोकर दही, गुड़, सेंधा नमक, राई और घर का धूआँ इन सबों से अलग-अलग क्रम से मर्दन करे ।।१५७।। अन्यच्च- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १५८ ।। अथवा—घीकुवार, चीता, लाल सरसों, कटेरी इनके क्वाथ से तथा त्रिफला के क्वाथ से तीन दिन तक पारे का खूब मर्दन करने से वह सम्पूर्ण मलों से छूटकर स्वच्छ हो जाता है ॥१५८॥ अथ मूर्च्छनविधिमाह- त्र्यूषणत्रिफलाबन्ध्याकन्दैः क्षुद्राद्वयान्वितैः । चित्रकोर्णानिशाक्षारकन्याऽर्ककनकद्रवैः ।।१५९।। सूतं कृतेन यूषेण वारान्सप्त विमर्दयेत् । इत्थं संमूर्च्छितः सूतस्त्यजेत्सप्तापि कञ्चुकान् ।।१६०।।