भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूर्च्छन विधि-सोंठ, पीपल, मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, बाँझककोड़े का कन्द, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, चीता, भेड़ की ऊन, हरदी, जवाखार, घीकुवार, आक के पत्तों का रस, धतूरे के पत्तों का रस इन सबों के क्वाथ से सात बार मर्दन करने से पारा मूर्च्छित हो जाता है तथा सात प्रकार के कञ्चुक दोषों से रहित हो जाता है ॥१५९-१६०॥ ❖ बन्ध्याकन्दः=बान्दु खेखसाकन्दः (बाँझ काँकूड)। (छोटीकटाई, बड़ी कटाई)। ऊर्णा (मेषकी ऊन)। निशा=हरिद्रा। क्षारः=यवक्षारः। कन्या=कुमारिका। अर्कः=अर्कपत्ररसः। कनकद्रवः=धत्तूर- पत्ररसः ॥१५९-१६०॥ यहाँ 'बन्ध्याकन्द' से 'बाँझककोड़े का कन्द' । 'क्षुद्राद्वयम्' से 'छोटी तथा बड़ी कटेरी' । 'ऊर्णा' से 'मेष (भेड़) की ऊन' । 'निशा' से 'हरदी' । 'क्षार' से 'जवाखार' । 'कन्या' से 'घीकुवार' । 'अर्क' 'आक' से 'आक के पत्तों का रस' । 'कनकद्रव' से 'धतूरे के पत्तों का रस' समझना चाहिये ॥ अथोर्ध्वपातनविधिमाह- मयूरग्रीवताप्याभ्यां नष्टपिष्टीकृतस्य च। यन्त्रे विद्याधरे कुर्याद्रसेन्द्रस्योर्ध्वपातनम् ॥१६१॥ ऊर्ध्वपातन विधि-नीलाथोथा तथा सोनामाखी इन दोनों के साथ पारे को मिलाकर घीकुवार के रस के साथ तब खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े। पश्चात् उसे डमरूयन्त्र में रख कर भाफ द्वारा पारे को उड़ा ले। इसी को पारे का ऊर्ध्वपातन (ऊपर उड़ाना) कहते हैं ॥१६१॥ ❖ ताप्यम्=सुवर्णमाक्षिकम्। नष्टपिष्टीकृतस्य=कुमारिकाद्रवयोगेन तावन्मर्दनं कर्तव्यं यावत् पारदः पृथङ् न दृश्यत इत्यर्थः । विद्याधरयन्त्रे=डमरूयन्त्रे ॥१६१॥ यहाँ 'ताप्य' पद का 'सोनामाखी' तथा 'नष्टपिष्टीकृतस्य' पद का 'घीकुमार के रस के साथ तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े' एवं 'विद्याधरयन्त्र' पद का 'डमरूयन्त्र' अर्थ समझना चाहिये ॥१६१॥ अथाधःपातनविधिमाह- त्रिफलाशिग्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः । नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥१६२॥ ततो दीप्तैरधः पातमुपलैस्तस्य कारयेत्। यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतो विशुद्ध्यति ॥१६३॥ स्वेदनादिक्रियाभिस्तु शोधितोऽसौ यदा भवेत्। तदा कार्याणि कुरुते प्रयोज्यः सर्वकर्मसु ॥१६४॥ अधःपातन विधि-त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), सहिजना, चीता, सेंधा नमक और राई इन सबों को पारे के साथ घीकुवार के रस में तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न दिखाई पड़े। पश्चात् उन सबों को ऊपर की हाँड़ी में लेप कर भूधरयन्त्र में रख ऊपर से दहकते हुए उपलों को रख कर पारे को नीचे की हाँड़ी में गिरावे। इसी को पारे का अधः पातन कहते हैं। इससे पारा शुद्ध हो जाता है और स्वेदन आदि (स्वेदन, मूर्च्छन, ऊर्ध्वपातन, अधःपातन) क्रियाओं से जब पारा का शोधन हो जाय तब पारे को सब कामों में लेवे। अन्यथा वह अनिष्टकर होता है ॥१६२-१६४॥ अथ मुख्यदोषहरणार्थं शोधनविधिणमाह- गृहकन्या हरति मलं त्रिफलाऽग्निं चित्रको विषं हन्ति। तस्मादेभिर्मिश्रैर्वारान् संमूर्च्छयेत्सप्त ।। पारा के मुख्य दोषों को दूर करने की विधि-घीकुवार-पारा के मलदोष को दूर करता है, त्रिफला- अग्निदोष को तथा चीता-विषदोष को दूर करता है। अतः इन सबों को एकत्र कर इनमें ७ बार पारे को खरल कर मूर्च्छित करे अर्थात् एक बार का डाला रस जब खरल करते-करते सूख जाय तब पुनः रस डालकर खरल करे। इस भाँति ७ बार करे ॥१६५॥