भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1042, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९१ अथ सर्वदोषहरसंक्षिप्तशोधनविधिमाह- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १६६ ।। कुमार्या च निशाचूर्णेर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढो भवति निश्चितम् ।। १६७ ।। बह्वौषधिकषायेण स्वेदितः स बली भवेत् । सर्पाक्षीचिञ्चिकाबन्ध्याभृङ्गाब्दैः स्वेदितो बली । ततः स पावकद्रावैः स्विन्नः स्यादतिदीप्तिमान् ।। १६८ ।। पारा के सम्पूर्ण दोषों को दूर करने के लिये संक्षिप्त शोधन विधि-घीकुवार, चीता, लाल सरसों और कटेरी के क्वाथ के साथ तीन दिन तक खरल करने से तथा त्रिफला के क्वाथ में भी तीन दिन तक खरल करने से पारा सब मलों से रहित हो जाता है । तत्पश्चात् घीकुवार का रस और हरदी के चूर्ण के साथ एक दिन खरल करने से पारा निश्चय नपुंसक हो जाता है । उसके बाद बहुत सी ओषधियों के क्वाथ से पारे का स्वेदन करने से वह बली हो जाता है जैसे- नागफनी, इमली, बाँझककोड़ा, भाँगरा और नागरमोथा इन सबों के क्वाथ से दोलायन्त्र में रख कर स्वेदन करने से पारा बली हो जाता है । चीता के क्वाथ से पुनः स्वेदन करने से पारा अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ।। १६६-१६८ ।। ❖ सर्पाक्षी (नागफनी), चिञ्चिका (इमली), बन्ध्या (बाँझ ककोड़ा), भृङ्गः=भृङ्गराज, अब्दः=मुस्ता, पावकः=चित्रकम् ।। १६६-१६८ ।। यहाँ 'सर्पाक्षी' से 'नागफनी' । 'चिञ्चिका' से 'इमली' । 'बन्ध्या' से 'बाँझ ककोड़ा' । 'भृङ्ग' से 'भृङ्गराज (भाँगरा)' । 'अब्द' से 'मुस्ता (नागरमोथा) और 'पावक' से 'चीता' का बोध करना चाहिये ।। १६६-१६८ ।। अथ पारदस्य मारणविधिमाह- धूमसारं रसं तोरीं गन्धकं नवसादरम् । यामैकं मर्दयेदम्लैर्भागं कृत्वा समं समम् ।। १६९ ।। काचकूप्यां विनिक्षिप्य ताञ्च मृद्वस्त्रमुद्रया । विलिप्य परितो वक्त्रे मुद्रां दत्त्वा विशोषयेत् ।। १७० ।। अधः सच्छिद्रपिठरीमध्ये कूपीं निवेशयेत् । पिठरीं बालुकापूरैर्भृत्वा चाकूपिकागलम् ।। १७१ ।। निवेश्य चुल्ल्यां तदधो वह्निं कुर्याच्छनैः शनैः । तस्मादत्यधिकं किञ्चित्पावकं ज्वालयेत्क्रमात् ।। १७२ ।। एवं द्वादशभिर्यामैर्म्रियते रस उत्तमः । स्फोटयेत्स्वाङ्गशीतं तमूर्ध्वगं गन्धकं त्यजेत् ।। १७३ ।। अधःस्थञ्च मृतं सूतं गृह्णीयातं तु मात्रया । यथोचितानुपानेन सर्वकर्मसु योजयेत् ।। १७४ ।। पारा के मारने की विधि-घर का धुआँ, पारा, फिटकिरी, गन्धक, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस में एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करे । तत्पश्चात् काँच की कूपी के चारो तरफ कपरोटी (मिट्टी लिपटे वस्त्र द्वारा लपेट) कर और उसे धूप में रख कर सुखा डाले । फिर उसी काँच की कूपी में उपर्युक्त खरल किये द्रव्यों को रख कर कूपी का मुख बन्द करके सुखा लेने के बाद एक मिट्टी के पात्र के तल भाग में छिद्र करके उसी छिद्र के ऊपर उक्त कूपी को रख उसके गले तक उक्त पात्र में बालू भर कर उसे चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे धीरे-धीरे आँच अधिक करता जाय अर्थात् प्रथम मृदु पुनः मध्यम तदनन्तर तीव्र आँच करे । इस तरह १२ प्रहर (३६ घण्टे) तक आँच देने से उत्तम रीति से पारा भर जाता है । पुनः स्वयं शीतल हो जाने पर सावधानी से कूपी को फोड़ कर ऊपर लगे हुये गन्धक को छोड़ कर शेष नीचे स्थित मरे हुये पारे को निकाल ले और उसे मात्रानुसार यथोचित अनुपान से जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ प्रयोग में लेवे ।।१६९-१७४।। अथ पारदमारणेऽपरं विधिमाह- अपामार्गस्य बीजानां मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् । तत्सम्पुटे क्षिपेत्सूतं मलयूदुग्धमिश्रितम् ।। १७५ ।। द्रोणपुष्पीप्रसूनानि विडङ्गमरिमेदकः । एतच्चूर्णमध्यश्चोर्ध्वं दत्त्वा मुद्रा प्रदीयते ।। १७६ ।। तद्गोलं स्थापयेत्सम्यङ् मृन्मूषासम्पुटे पचेत् ।। १७७ ।। एवमेकपुटेनैव सूतकं भस्म जायते । तत्प्रयोज्यं यथास्थाने यथामात्रं यथाविधि ।। १७८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA