भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1043

१९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पारा मारने की दूसरी विधि—प्रथम चिचिड़ा के बीजों को पीस कर उसके दो मूषे (घरिया) बना ले, फिर पारा को कठूमर (कठगूलर) के दूध में खूब खरल करके उसे उक्त मूषा के सम्पुट के अन्दर नीचे गूमा के फूल, बायविडङ्ग अरिमेद (दुर्गन्ध खैर) इन सबों का चूर्ण रख कर उसके ऊपर रख कर पुनः उसी चूर्ण को ऊपर से भी रखकर मूषा का मुख बन्द कर दे। पुनः एक दूसरे मिट्टी के मूषा के अन्दर उक्त मूषा के सम्पुट को रख कर मुख बन्द कर तथा सुखा कर अग्नि की पुट देवे। इस तरह एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है। फिर जब जहाँ आवश्यकता हो वहाँ विधि के अनुसार यथोचित मात्रा में उस भस्म का प्रयोग करे ॥१७५-१७८॥ ❖ मलयूः=काकोडुम्बरिका ।।१७५-१७८।। यहाँ 'मलयू' पद से 'कठूमर' का बोध करना चाहिये ॥१७५-१७८॥ अथ पारदमारणे तृतीयं विधिमाह- काकोडुम्बरिकादुग्धै रसं किञ्चिद्विमर्दयेत् । तद्दुग्धघृष्टहिङ्गोश्च मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ।।१७९।। क्षिप्त्वा तत्संुपुटे सूतं तत्र मुद्रां प्रदापयेत् । धृत्वा तद् गोलकं प्राज्ञो मृन्मूषासम्पुटेऽधिके ।। पचेद् गजपुटेनैव सूतकं याति भस्मताम् ।।१८०।। पारा मारने की तीसरी विधि—प्रथम कठूमर के दूध के साथ पारे को किञ्चित् खरल कर ले पश्चात् उसी के दूध के साथ हींग को पीस कर उसकी दो मूषा बना कर उसी के सम्पुट के अन्दर उक्त पारे को रख कर सन्धि भली-भाँति से बन्द कर दे फिर एक दूसरे मिट्टी के बने मूषे (घरिया) के सम्पुट के अन्दर उक्त मूषा-सम्पुट को रखकर कपड़मिट्टी द्वारा मुख दृढ़ता से बन्द कर तथा सुखाकर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इस भाँति एक ही पुट देने से पारा भस्म हो जाता है ॥१७९-१८०॥ अथ पारदमारणे चतुर्थ विधिमाह- नागवल्लीरसैर्घृष्टः कर्कोटीकन्दगर्भितः । मृन्मूषासम्पुटे पक्वं सूतो यात्येव भस्मताम् ।।१८१।। पारा मारने की चौथी विधि—प्रथम पारे को पान के रस में खरल कर ले पश्चात् उसे बाँझककोड़ा के कन्द के अन्दर रख दे पुनः उक्त कन्द को मिट्टी के मूषा (घरिया) के सम्पुट के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर सुखा दे पश्चात् गजपुट की आँच में पका डाले। इस भाँति एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है ॥१८१॥ अथ रसकर्पूरनिर्माणविधिमाह- तत्र पारदस्य संक्षिप्तं शोधनं कर्त्तव्यम्। शुद्धसूतसमं कुर्यात्प्रत्येकं गैरिकं सुधीः । इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ।।१८२।। वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् । सर्वाण्येतानि संचूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ।।१८३।। एभिश्चूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् । तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालमध्ये परिक्षिपेत् ।।१८४।। तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् । सवस्त्रकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ।।१८५।। संशोष्य मुद्रयेद्भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् । सम्यग्विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ।।१८६।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् । अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्रादहर्निशम् ।।१८७।। शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्ध्वस्थालीगतं रसम् । कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ।।१८८।। तद्देवकुसुमचन्दनकस्तूरीकुङ्कुमैर्युक्तम् । खादन् हरति फिरङ्गं व्याधिं सोपद्रवं सपदि ।।१८९।। बिन्दति वह्नेर्दीप्ति पुष्टिं वीर्य बलं विपुलम् । रमयति रमणीशतकं रसकर्पूरस्य सेवकः सततम् ।।१८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA