भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९३ 'रसकर्पूर' बनाने की विधि-रसकर्पूर बनाने के समय प्रथम पारे का संक्षिप्त शोधन विधि के अनुसार शोधन करे तत्पश्चात् शुद्ध पारा के समान भाग में गेरू, ईंटा, खड़ी, फिटकिरी, सेंधा नमक, वमई की मिट्टी, खारीनोन, बर्तन रँगने की मिट्टी (काबिस) इन सबों को पृथक्-पृथक् लेकर सबों का चूर्ण कर कपड़े से छान कर उसके साथ उक्त पारे को एक प्रहार तक खरल करे, पश्चात् उसे एक मिट्टी की हँड़िया के अन्दर रख कर ऊपर से दूसरी हाँड़ी औंधा कर दोनों का मुख कपड़ा या रूई डाल कर कुटी हुई मिट्टी से बन्द कर धूप में सुखा दे पश्चात् पुनः उक्त मिट्टी का लेप कर सुखा डाले इसके बाद फिर मिट्टी का लेप कर और सुखा कर उसे चूल्हे पर चढ़ा दे और चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। जब तक आग पर रखा रहे तब तक दिन-रात बलपूर्वक उसकी रक्षा करता रहे। स्वयं शीतल हो जाने पर धीरे से हाँड़ी का मुख खोल कर ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये अत्यन्त गुणकारी कपूर के समान परम उज्ज्वल पारे को निकाल ले और उसे लौंग, सफेद चन्दन, कस्तूरी तथा केशर के साथ मिला कर यदि खाया जाय तो उपद्रव से युक्त बढ़ा हुआ फिरङ्ग नामक रोग शीघ्र नष्ट हो जाता है और अग्नि प्रदीप्त होता है तथा शरीर की पुष्टि, वीर्य एवं बल की वृद्धि होती है। इस रसकर्पूर का निरन्तर सेवन करने वाला पुरुष १०० स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है ॥१८४-१९०॥ ❖ खटिका [खड़ी]। स्फटिका [फिट्किरी]। सिन्धुजन्म=सैन्धवम्। वल्मीकम्='बमई' इति लोके। क्षारलवणम् [खारीनोन]। भाण्डरञ्जकमृत्तिका [काविस] ॥१८४-१९०॥ यहाँ 'खटिका' का 'खड़ी', 'स्फटिका' का 'फिट्किरी', 'सिन्धुजन्म' का 'सेंधानमक' 'वस्मीक' का लोक- प्रसिद्ध 'बमई की मिट्टी', 'क्षारलवण' का 'खारी नोन' और 'भाण्डरञ्जक मृत्तिका' का 'काविस' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८४-१९०॥ अथ सिन्दूररसविधिमाह- शुद्धसूतस्य गृह्णीयाद्द्विषड्भागचतुष्टयम्। शुद्धगन्धस्य भागैकं तावत्कृत्रिमगन्धकम् ।।१९१।। अथवा पारदस्यार्द्धं शुद्धगन्धकमेव हि। तयोः कज्जलिकं कुर्याद्दिनमेकं विमर्दयेत् ।।१९२।। मृत्तिकां वाससा सार्द्धं कुट्टयेदतियत्नतः। तथा वारत्रयं सम्यक्काचकूपीं प्रलेपयेत् ।।१९३।। मृत्तिकां शोषयित्वा तु कूप्यांकज्जलिकं क्षिपेत्। तां कूपीं बालुकायन्त्रे स्थापयित्वा रसं पचेत् ।।१९४।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम्। गृह्णीयादूर्ध्वसंलग्नं सिन्दूरसदृशं रसम् ।।१९५।। सिन्दूररस बनाने की विधि-सिन्दूररस बनाने के समय वैद्य को चाहिये कि वह शुद्ध पारा ४ भाग, शुद्ध गन्धक १ भाग तथा बनाया हुआ गन्धक १ भाग अथवा शुद्ध पारा आधा भाग तथा शुद्ध गन्धक आधा भाग ले और इनकी कज्जली एकदिन तक खरल करके बना ले। पश्चात् कपड़ा या रूई डाल कर मिट्टी को खूब कूट-कूट कर सान ले और उसको एक बार काँच की शीशी के चारों तरफ सर्वत्र लेप कर सुखा डाले, इस भाँति तीन लेप चढ़ा कर सुखावे। फिर उक्त कज्जली को उक्त शीशी के अन्दर रख दे और शीशी को बालुकायन्त्र के अन्दर रख कर रस (पारा) को पकावे। चार दिन तक बराबर आँच देता रहे। पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर ऊपर लगे हुये सिन्दूर के सदृश दिखाई पड़ते हुये रस को धीरे से युक्तिपूर्वक निकाल ले। यही सिन्दूररस कहलाता है ॥१९१-१९५॥ इति सिन्दूररसः। अथ मारितमूर्च्छितपारदयोर्गुणानाह- पारदः कृमिकुष्ठघ्नो जयदो दृष्टिकृत्सरः। मृत्युहृच्च महावीर्यो योगवाही ज्वरापहः ।।१९६।। स्मृतौजोरूपदो वृष्यो वृद्धिकृद्धातुवर्द्धनः। षण्ढत्वनाशनः शूरः खेचरः सिद्धिदः परः ।।१९७।। पारदः सकलरोगहा स्मृतः षड्रसो निखिलयोगवाहकः। पञ्चभूतमय एष कीर्त्तितस्तेन तद्गुणगणैर्विराजते ।।१९८।। ६६ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA