भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे उक्त प्रकार से मारे हुए तथा मूर्च्छित किये हुए पारा के गुण-उक्त प्रकार का पारा-कृमि तथा कुष्ठ नाशक, जय देने वाला (कार्य सिद्ध करने वाला), दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला, सारक, अकाल मृत्यु को दूर करने वाला, महावीर्यशाली, योगवाही (जिसके साथ दिया जाय उसके गुण को बढ़ाने वाला), ज्वरनाशक, स्मृति, ओज तथा रूप को देने वाला, कामी पुरुषों के लिये हितकर, वृद्धिकारक, धातुवर्धक, नपुंसकता को दूर करने वाला, शूरता, आकाश में उड़ने की शक्ति तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों को देने वाला होता है। शुद्ध पारा सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, मधुरादि ६ रसों से युक्त, तथा निखिल योगवाहक (सभी रोगों के सभी ओषधियों के साथ योग कर देने से उसकी शक्ति को बढ़ाने वाला) है एवं पञ्च महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) मय होने से उन सबों के प्रत्येक गुणों से युक्त होता है ।।१९६-१९८।। उक्तञ्च रसामृते- यस्य रोगस्य यो योगस्तेनैव सह योजितः । रसेन्द्रो हन्ति तं रोगं नरकुञ्जरवाजिनाम् ।।१९९।। 'रसामृत' में भी कहा हुआ है कि जिस रोग का जो भी योग (औषध) हो, उसके साथ योग कर देने से पारा मनुष्य, हाथी तथा घोड़ा इन सभी के रोगों को दूर करने वाला होता है। अथोपरसानां शोधनविधिमाह- तत्र हिङ्गुलस्य गुणानाह- मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारान्नयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ।।२००।। हिङ्गुल (सिंगरफ) की शोधन विधि-भेड़ का दूर और १अम्लवर्गोक्त अमलवेंत, जम्बीरी नींबू आदि पदार्थों के रस की यत्नपूर्वक ७ बार भावना देने से सिंगरफ निश्चय शुद्ध हो जाता है ।। अथ शोधितहिङ्गुलस्य गुणानाह- तिक्तं कषायं कटु हिङ्गुलं स्यान्नेत्रामयघ्नं कफपित्तहारि । हल्लासकण्डूज्वरकामलाश्च प्लीहामवातौ च गरं निहन्ति ।।२०१।। शुद्ध किये हुये सिंगरफ के गुण-शुद्ध सिंगरफ-तिक्त, कषाय तथा कटुरसयुक्त, नेत्ररोगनाशक, कफ तथा पित्त को दूर करने वाला एवं हल्लास (उबकाई), खुजली, ज्वर, कामला, प्लीहा, आमवात तथा गरसंज्ञक विष (कृत्रिम विष) को नष्ट करने वाला होता है ।।२०१।। अथ हिङ्गुलात्पारदनिष्कर्षणविधिमाह- निम्बूरसैर्निम्बपत्ररसैर्वा याममात्रकम् । घृष्ट्वा दरदमूर्ध्वन्तु पातयेत्सूतयुक्तिवत् ।।२०२।। तत्रोर्ध्वपिठरीलग्नं गृह्णीयाद्रसमुत्तमम् । शुद्धमेव हि तं सूतं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।२०३।। सिंगरफ से पारा निकालने की विधि-नीबू के रस के अथवा नीम के पत्तों के रस के साथ सिंगरफ को एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करके ऊर्ध्वपातन यन्त्र में पारे की भांति रख कर उड़ाने से ऊपर की हाँड़ी में लगे हुये उत्तम पारे को निकाल लेना चाहिये । यह पारा स्वयं शुद्ध होता है अतः इसे हर एक कार्यों में लेना चाहिये ।।२०२-२०३।। १. अम्लवेतसजम्बीरलुङ्गाम्लचणकाम्लकाः । नागरङ्गं तिन्तिडी च चिञ्चापत्रं च निम्बुकम् ।। चाङ्गेरी दाडिमं चैव करमर्दं तथैव च । एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ।। अर्थ-अम्लवेत, जम्बीरी नींबू, बिजौरा नींबू, चनाखार, नारङ्गी (खट्टी), इमली के फल और पत्ते, नींबू, चांगेरी, अनार (खट्टा), करौंदा ये सब अम्लगण (अम्लवर्ण) कहलाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA