भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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अथ तृतीयं धातवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९५ अथाशुद्धगन्धकस्य दोषानाह- अशुद्धो गन्धकः कुर्यात्कुष्ठं पित्तरुजां भ्रमम्। हन्ति वीर्यं बलं रूपं तस्माच्छुद्धः प्रयुज्यते ॥२०४॥ अशुद्ध गन्धक के दोष-अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तसम्बन्धी रोग तथा भ्रमरोग को उत्पन्न-करने वाला एवं वीर्य, बल, तथा रूप को नष्ट करने वाला होता है। अतः शुद्ध गन्धक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥२०४॥ अथ गन्धकस्य शोधनविधिमाह- लौहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत्। तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः ॥२०५॥ विद्रुतं गन्धक दृष्ट्वा तनुवस्त्रे विनिक्षिपेत्। यथा वस्त्राद्विनिःस्रुत्य दुग्धमध्येऽखिलं पतेत् । एवं स गन्धकः शुद्धः सर्वकर्मोचितो भवेत् ॥२०६॥ गन्धक के शोधने की विधि-लोहे की कढ़ाई में घी डाल कर आग पर रख कर तपावे, जब घी खूब तप जाय तब उसी के बराबर गन्धक का चूर्ण उसमें डाल दे और गन्धक को पिघला हुआ देख कर पतले वस्त्र के ऊपर उसे उड़ेल दे और दूध भरे पात्र में उस पिघले गन्धक को चुवावे, जब वस्त्र से सारा गन्धक छन कर दूध में गिर जाय तब उसे निकाल ले। इस प्रकार गन्धक को शुद्ध करके सम्पूर्ण कार्यों में प्रयोग करे ॥२०५-२०६॥ अथ शुद्धगन्धकस्य गुणानाह- गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्य्योष्णस्तुवरः सरः ।।२०७।। पित्तलः कटुकः पाके कण्डूवीसर्पजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।२०८।। शुद्ध गन्धक के गुण-शुद्ध गन्धक-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन एवं खुजली, वीसर्प, कृमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ॥२०७-२०८॥ अथाशुद्धाभ्रकस्य दोषानाह- पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुर्य्यात् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यसह्यामशुद्धमभ्रं गुरु वह्निहन्त्यात् ।।२०९।। अशुद्ध अभ्रक के दोष-अशुद्ध अभ्रक-मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा देने वाला, कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, हृदय तथा पसलियों में असह्य पीड़ा उत्पन्न करने वाला, गुरु तथा जठराग्नि को नष्ट करने वाला होता है ॥२०९॥ अथाभ्रकस्य शोधनविधिमाह- कृष्णाभ्रकं धमेद्वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत् । भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः । भावयेदष्टयामं तदेवमभ्रं विशुद्ध्यति ।।२१०।। अभ्रक के शोधने की विधि-काले अभ्रक को प्रथम आग में डाल कर खूब तपावे जब लाल हो जाय तब उसे दूध में डाल कर बुझावे, तत्पश्चात् उसके प्रत्येक पत्र (पत्तर) अलग-अलग करके उन सबों को चौलाई तथा अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से आठ पहर तक भावना दे। ऐसा करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥२१०॥ अथाभ्रकस्य मारणविधिमाह- कृत्वा धान्याभ्रकं तथा शोषयित्वाऽथ मर्दयेत् । अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत् ।।२११।। वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारान् पुनः पुनः ।।२१२।। ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः प्रयोज्यं सर्वकर्मसु ।।२१३।। तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे तदभ्रन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ।।२१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA