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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

अथ तृतीयं धातवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९५ अथाशुद्धगन्धकस्य दोषानाह- अशुद्धो गन्धकः कुर्यात्कुष्ठं पित्तरुजां भ्रमम्। हन्ति वीर्यं बलं रूपं तस्माच्छुद्धः प्रयुज्यते ॥२०४॥ अशुद्ध गन्धक के दोष-अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तसम्बन्धी रोग तथा भ्रमरोग को उत्पन्न-करने वाला एवं वीर्य, बल, तथा रूप को नष्ट करने वाला होता है। अतः शुद्ध गन्धक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥२०४॥ अथ गन्धकस्य शोधनविधिमाह- लौहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत्। तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः ॥२०५॥ विद्रुतं गन्धक दृष्ट्वा तनुवस्त्रे विनिक्षिपेत्। यथा वस्त्राद्विनिःस्रुत्य दुग्धमध्येऽखिलं पतेत् । एवं स गन्धकः शुद्धः सर्वकर्मोचितो भवेत् ॥२०६॥ गन्धक के शोधने की विधि-लोहे की कढ़ाई में घी डाल कर आग पर रख कर तपावे, जब घी खूब तप जाय तब उसी के बराबर गन्धक का चूर्ण उसमें डाल दे और गन्धक को पिघला हुआ देख कर पतले वस्त्र के ऊपर उसे उड़ेल दे और दूध भरे पात्र में उस पिघले गन्धक को चुवावे, जब वस्त्र से सारा गन्धक छन कर दूध में गिर जाय तब उसे निकाल ले। इस प्रकार गन्धक को शुद्ध करके सम्पूर्ण कार्यों में प्रयोग करे ॥२०५-२०६॥ अथ शुद्धगन्धकस्य गुणानाह- गन्धकः कटुकस्तिक्तो वीर्य्योष्णस्तुवरः सरः ।।२०७।। पित्तलः कटुकः पाके कण्डूवीसर्पजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठक्षयप्लीहकफवातान् रसायनः ।।२०८।। शुद्ध गन्धक के गुण-शुद्ध गन्धक-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, पित्तजनक, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन एवं खुजली, वीसर्प, कृमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ॥२०७-२०८॥ अथाशुद्धाभ्रकस्य दोषानाह- पीडां विधत्ते विविधां नराणां कुष्ठं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुर्य्यात् । हृत्पार्श्वपीडां च करोत्यसह्यामशुद्धमभ्रं गुरु वह्निहन्त्यात् ।।२०९।। अशुद्ध अभ्रक के दोष-अशुद्ध अभ्रक-मनुष्यों को अनेक प्रकार की पीड़ा देने वाला, कुष्ठ, क्षय, पाण्डुरोग, हृदय तथा पसलियों में असह्य पीड़ा उत्पन्न करने वाला, गुरु तथा जठराग्नि को नष्ट करने वाला होता है ॥२०९॥ अथाभ्रकस्य शोधनविधिमाह- कृष्णाभ्रकं धमेद्वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत् । भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः । भावयेदष्टयामं तदेवमभ्रं विशुद्ध्यति ।।२१०।। अभ्रक के शोधने की विधि-काले अभ्रक को प्रथम आग में डाल कर खूब तपावे जब लाल हो जाय तब उसे दूध में डाल कर बुझावे, तत्पश्चात् उसके प्रत्येक पत्र (पत्तर) अलग-अलग करके उन सबों को चौलाई तथा अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से आठ पहर तक भावना दे। ऐसा करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥२१०॥ अथाभ्रकस्य मारणविधिमाह- कृत्वा धान्याभ्रकं तथा शोषयित्वाऽथ मर्दयेत् । अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत् ।।२११।। वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारान् पुनः पुनः ।।२१२।। ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः प्रयोज्यं सर्वकर्मसु ।।२१३।। तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे तदभ्रन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ।।२१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१९६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अभ्रक के मारने की विधि-प्रथम शुद्ध अभ्रक को लेकर उससे आगे लिखी विधि के अनुसार धान्याभ्रक तैयार कर उसे सुखा कर एक दिन तक आक के दूध के साथ खल में रख खरल करे पश्चात् उसकी चक्के के आकार की गोल टिकिया बना कर उन सबों के ऊपर आक के पत्ते अच्छी तरह से लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। पुनः निकाल कर पूर्वोक्त रीति से आक के दूध के साथ खरल करके टिकिया बना कर आक के पत्ते लपेट कर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इसी प्रकार जब सात पुट हो जाय तब बरगद की जटा (बरोह) के क्वाथ के साथ खरल करके और टिकिया बना कर पूर्वोक्त रीति की भाँति गजपुट की आग में रख कर पकावे इसी भाँति तीन पुट हो जाने पर अभ्रक निःसन्देह मर जाता है और सभी कार्यों में प्रयोग करने योग्य हो जाता है। उक्त रीति से मारे हुये अभ्रक को समान भाग घी में डाल कर लोहे की कढ़ाई में रख कर पकावे, जब घी जल जाय तब उतार कर उस अभ्रक को हर एक योगों में मिलावे ॥२१४॥ अथ धान्याभ्रकस्य विधिमाह- पादांशशालिसंयुक्तमभ्रं बद्ध्वाऽथ कम्बले। त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेत्करैः ।। २१५ ।। कम्बलाद्गलितं सूक्ष्मं बालुकारहितञ्च यत्। तद् धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमार्मारणसिद्धये ।। २१६ ।। धान्याभ्रक बनाने की विधि-अभ्रक का चतुर्थांश शालि (जड़हन) धान्य मिला कर अभ्रक को कम्बल में बाँध कर जल में तीन दिन तक भींगा रहने दे, पश्चात् उसे निकाल कर हाथों में खूब रगड़े और कम्बल से छन २ कर सूक्ष्म जो बालू से रहित अभ्रक के कण गिरे हों उन्हें एकत्र करले वे ही 'धान्याभ्र' कहलाते हैं तथा अभ्रक के मारण के समय कार्य में आते हैं ॥२१५-२१६॥ अथ मारिताभ्रकस्य गुणानाह- अभ्रं कषायं मधुरं सुशीतमायुष्करं धातुविवर्द्धनञ्च । हन्यात् त्रिदोषं व्रणमेहकुष्ठं प्लीहोदरं ग्रन्थिविषक्रिमींश्च ।। २१७ ।। रोगान् हन्ति द्रढयति वपुर्वीर्यवृद्धिं विधत्ते, तारुण्याढयं रमयति शतं योषितां नित्यमेव । दीर्घायुष्काञ्जनयति सुतान् सिंहतुल्यप्रभावान्, मृत्योर्भीतिं हरति सुतरां सेव्यमानं मृताभ्रम् ।। १८ ।। मारे हुये अभ्रक के गुण-मारा हुआ अभ्रक-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतल, आयु को बढ़ाने वाला, धातुवर्धक एवं त्रिदोष, व्रण मेह, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, ग्रन्थि (गाँठ), विष तथा क्रिमि को नष्ट करने वाला होता है। यह सेवन करने से रोगों को दूर करता है, शरीर को दृढ़ रखता है, वीर्य की वृद्धि करता है और सौ १०० युवती स्त्रियों के साथ रमण करने की शक्ति देता है तथा सिंह के समान पराक्रमी और दीर्घ आयु वाले पुत्रों को उत्पन्न करता है एवं अपमृत्यु के भय को दूर करता है ॥२१७-२१८॥ अथाशुद्धहरितालस्य दोषानाह- अशुद्धं तालमायुर्हत्कफमारुतमेहकृत् । तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ।। २१९ ।। अशुद्ध हरताल के दोष-अशुद्ध हरताल-आयु नाशक, कफ, वायु तथा मेहयोग कारक एवं शरीर में ताप, स्फोट तथा अङ्ग को संकुचित करने वाला होता है। अतः इस का शोधन करना आवश्यक है ॥२१९॥ अथ हरितालस्य शोधनविधिमाह- तालकं कणशः कृत्वा तच्चूर्णं काञ्जिके पचेत् । दोलायन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजद्रवैः ।। २२० ।। तिलतैले पचेद्यामं यामञ्च त्रिफलाजले । एवं यन्त्रे चतुर्यामं पक्वं शुद्ध्यति तालकम् ।। २२१ ।। हरताल शोधने की विधि-तबकिया हरताल का मोटा चूर्ण कर उसे कांजी से भरे दोलायन्त्र में रख १ प्रहर (३ घण्टा) तक पकावे, उसके बाद क्रम से पेठा का रस, तिल का तेल तथा त्रिफला का जल भरे दोलायन्त्र में उक्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १९७ हरताल को रख अलग एक-एक प्रहर तक पकावे, इस भाँति चार प्रहर तक दोलायन्त्र में रख कर पकाने से हरताल शुद्ध हो जाता है ॥२२०-२२१॥ अथ हरितालस्य मारणविधिमाह- सदलं तालकं शुद्धं पौनर्नवरसेन तु। खल्वे विमर्दयेदेकं दिनं पश्चाद्विशोधयेत् ।।२२२।। ततः पुनर्नवाक्षारैः स्थाल्यामर्द्धं प्रपूरयेत्। तत्र तद्गोलकं कृत्वा पुनस्तेनैव पूरयेत् ।।२२३।। आकण्ठं पिठरं तस्य पिधानं धारयेन्मुखे। स्थालीं चुल्ल्यां समारोप्य क्रमाद्वह्निं विवर्धयेत् ।।२२४।। दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेत् ।।२२५।। एवं तन्म्रियते तालं मात्रा तस्यैकरक्तिका। अनुपानान्यनेकानि यथायोग्यं प्रयोजयेत् ।।२२६।। हरताल मारने की विधि-शुद्ध किये हुये दलयुक्त तबकिया हरताल को लेकर पुनर्नवा (सफेद) के रस के साथ खल में रख कर एक दिन तक खरल करे पश्चात् गोला बना कर तथा सुखा कर एक हाँड़ी में आधे दूर तक सफेद पुनर्नवा का खार भर कर उसके ऊपर उक्त हरताल के गोले को रख कर ऊपर से पुनः सफेद पुनर्नवा का खार हाँड़ी के गले तक भर रख दे और ऊपर से हाँड़ी का मुख बन्द कर चूल्हे पर रख कर नीचे आग जला दे और आँच धीरे-धीरे तेज करता जाय, इस तरह पाँच दिन तथा पाँच रात तक अखण्ड आँच देने से हरताल मर जाता है। इसकी मात्रा १ रत्ती की होती है तथा अनेक प्रकार के अनुपानों में जहाँ जिसकी योग्यता हो रोगादि के अनुसार उस अनुपान के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये ॥२२२-२२६॥ अथ शोधितमारितहरितालयोर्गुणानाह- हरितालं कटु स्निग्धं कषायोष्णं हरेद्विषम्। कण्डूकुष्ठास्यरोगास्रकफपित्तकचव्रणान् ।।२२७।। शुद्ध किये हुये और मारे हुये हरताल के गुण-उक्त प्रकार का हरताल-कटु तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, उष्ण एवं विष, खुजली, कुष्ठ, मुख सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, कफ, पित्त, बाल तथा व्रण को नष्ट करने वाला होता है ॥२२७॥ अन्यच्च- तालकं हरते रोगान्कुष्ठमृत्युज्वरापहम्। शोधितं कुरुते कान्तिं वीर्यवृद्धिं तथाऽऽयुषम् ।।२२८।। और भी कहा है कि-शोधित हरताल-रोगनाशक, शरीर की कान्ति तथा वीर्य की वृद्धि करने वाला, आयु को बढ़ाने वाला एवं कुष्ठ, अकाल मृत्यु तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२२८॥ अथाशुद्धमनःशिलाया दोषानाह- तालकस्यैव भेदोऽस्ति मनोगुप्तैतदन्तरम्। तालकं त्वतिपीतं स्याद्भवेद्रक्ता मनःशिला ।।२२९।। मनःशिला मन्दबलं करोति जन्तुं ध्रुवं शोधनमन्तरेण। मलस्य बन्धं किल मूत्ररोधं सशर्करं कृच्छ्रगदञ्च कुर्यात् ।।२३०।। अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप-हरताल के एक भेद को ही मैनसिल कहते हैं। क्योंकि इन दोनों में केवल यही अन्तर है कि हरताल का रङ्ग अत्यन्त पीला होता है और मैनसिल का रङ्ग लाल होता है। अशुद्ध मैनसिल के दोष- बिना शोधा हुआ मैनसिल सेवन करने से मनुष्य को मन्द बलवाला कर देती है और दुर्बलता, क्रिमि, मल का विबन्ध, मूत्र का अवरोध तथा शर्करा युक्त मूत्रकृच्छ्र करने वाली होती है ॥२२९-२३०॥ अथ मनःशिलायाः शोधनविधिमाह- पचेत्त्र्यहमजामूत्रे दोलायन्त्रे मनःशिलाम्। भावयेत्सप्तधा पित्तैरजायाः सा विशुद्ध्यति ।।२३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मैनसिल शोधने की विधि-मैनसिल को ३ दिन तक बकरी के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकावे, पश्चात् बकरी के पित्त से सात बार भावना देनेसे मैनसिल शुद्ध हो जाती है ॥२३१॥ अथ शोधितमनःशिलाया गुणानाह- गुर्वी मनःशिला वर्ण्या सरोष्णा लेखनी कटुः । तिक्ता स्निग्धा विषश्वासकासभूतकफास्रनुत् ।। शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण-शुद्ध मैनसिल-गुरु, वर्ण को उत्तम करने वाली, सारक, उष्ण, लेखन गुण युक्त, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध एवं विष, श्वास, कास, भूतबाधा, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है ॥२३२॥ अथ खर्परस्तुत्थभेदस्तस्य शोधनविधिमाह- नरमूत्रे च गोमूत्रे सप्ताहं रसकं पचेत् । दोलायन्त्रेण शुद्धः स्यात्ततः कार्येषु योजयेत् ।।२३३।। तूतिया का भेद जो खपरिया है उसके शोधन की विधि-खपरिया को मनुष्य के मूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे फिर गोमूत्र से भरे दोलायन्त्र में रख कर सात दिन तक पकावे । ऐसा करने से वह शुद्ध हो जाती है और इसके बाद कार्य में लेने योग्य होती है ॥२३३॥ अथ शुद्धखर्परस्य गुणानाह- खर्परं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु । लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत् ।। विषाश्मकुष्ठकण्डूनां नाशन परम मतम् ।।२३४।। शुद्ध खपरिया के गुण-शुद्ध खपरिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारी, वमन कराने वाली, लघु, लेखनगुणयुक्त, मलभेदक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली एवं विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को अत्यन्त नष्ट करने वाली होती है ॥२३४॥ अथ सर्वोपरसानां साधारणशोधनविधिमाह- सूर्यावर्त्तो वज्रकन्दः कदली देवदालिका । शिग्रुः कोषातकी बन्ध्या काकमाची च बालकम् ।।२३५।। एषामेकरसेनैव त्रिक्षारैर्लवणैः सह । भावयेदम्लवर्गैश्च दिनमेकं प्रयत्नतः ।।२३६।। ततः पचेच्च तद्द्वावैर्दोलायन्त्रे दिनं सुधीः । एवं शुद्ध्यन्ति ते सर्वे प्रोक्ता उपरसा हि ये ।।२३७।। सम्पूर्ण उपरसों के शोधने की साधारण विधि-हुरहुर, वज्रकन्द (जंगली सूरन), केला, देवदाली (सनैया), सहंजना, तोरई, बाँझककोड़ा, मकोय, सुगन्धबाला इन सबों में से किसी एक का रस, क्षारत्रय१ (जवाखार, सुहागा, सज्जीखार), पाँचो२ नोन तथा अम्लवर्गोक्त (अमलवेत, जम्बीरी नींबू आदि) पदार्थों का रस इन सबों से एक दिन तक भावना दे उसके बाद उपर्युक्त इन्हीं रसों से भरे दोलायन्त्र में उपरसों को रख कर एक दिन तक पकावे । ऐसा करने से जितने उपरस कहे हुए हैं वे सभी शुद्ध हो जाते हैं ॥२३५-२३७॥ अथ विशेषशुद्धिमाह- कङ्कुष्ठं गैरिकं शङ्खः कासीसं टङ्कणं तथा । नीलाञ्जनं शुक्तिभेदाः क्षुल्लकाः सवराटकाः ।।२३८।। जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा । शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ।।२३९।। १. स्वर्जिका च यवक्षारष्टङ्कणक्षार एव च । क्षारत्रयं समाख्यातं त्रिक्षारः स च कथ्यते ।। अर्थ-सज्जीखार, जवाखार, सुहागा ये तीनों मिलकर क्षारत्रय या त्रिक्षार कहलाते हैं। २. सैन्धवं रुचकं चैव विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रेण समायुक्तं ज्ञेयं लवणपञ्चकम् ।। अर्थ-सेंधा नमक, कालानोन, विरिया सञ्चर नोन, औद्भिद (रेहगवा नोन), समुद्रीनोन इन सबों के योग को लवणपञ्चक कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९९ विशेष शुद्धि-मुरदासंग, गेरू, शङ्ख, कासीस, सुहागा, काला सुरमा, सितुही के सभी भेद, छोटे शङ्ख, कौड़ी ये सब जम्बीरी नींबू से भरे दोलायन्त्र में रख कर पकाने के बाद किंचित् गर्म जल से धो लेने पर शुद्ध हो जाते हैं। उसके बाद हर एक योगों में इन सबों का प्रयोग करना वैद्यों के लिये उचित है ।।२३८-२३९।। ❖ एवं शोधितानामुपरसानां पृथग्गुणा गुणग्रन्थे द्रष्टव्याः ।।२३८-२३९।। इस प्रकार शुद्ध किये हुये उपरसों के पृथक् पृथक् गुण जहाँ पर इनके गुण लिखे हुये हैं वहाँ देखना चाहिये ।।२३८-२३९।। अथ रत्नानां शोधनमारणविधिमाह तत्राशुद्धवज्रस्य दोषानाह- अशुद्धं कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथां तथा। पाण्डुत्वं पङ्गुलत्वञ्च तस्मात्संशोध्य मारयेत् ।। अशुद्ध (बिना शोधे हुए) हीरे के दोष-

१००० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ मारितवज्रस्य गुणानाह- आयुः पुष्टिं बलं वीर्यं वर्णं सौख्यं करोति च। सेवितं सर्वरोगघ्नं मृतं वज्रं न संशयः ।। २४७ ।। मारे हुये हीरे के गुण-मरा हुआ हीरा (भस्म)-सेवन करने से आयु, पुष्टि, बल, वीर्य, सुन्दर वर्ण तथा सुख की वृद्धि करता है और सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है। इसमें कोई संशय नहीं है ।। २४७ ।। अथ शेषरत्नानां शोधनमारणविधिमाह- वज्रवत्सर्वरत्नानि शोधयेन्मारयेत्तथा। शुद्धानां मारितानाञ्च तेषां शृणु गुणानपि ।। २४८ ।। मणयो वीर्यतः शीता मधुरास्तुवरा रसात्। चक्षुष्या लेखनाश्चापि सारका विषहारकाः ।। धारणात्ते तु भङ्गल्या ग्रहदृष्टिहरा अपि ।। २४९ ।। शेष अन्य रत्नों के शोधन तथा मारण की विधि-हीरे के समान ही शेष सभी रत्नों का भी शोधन तथा मारण करना चाहिये। शोधन तथा मारण किये हुये सभी रत्न-शीतवीर्य, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, सारक, विष को हरण करने वाले, धारण करने से मङ्गल को देने वाले और ग्रह के दोषों को दूर करने वाले होते हैं ।। २४८-२४९ ।। ❖ उपरत्नानां शोधनमारणविधिश्चिन्त्यः ।। २४८ - २४९ ।। यहाँ उपरत्नों के शोधन तथा मारण की विधि विचार करके स्थिर कर लेनी चाहिये। अथ विषोपविषाणां शोधनविधिमाह- तत्र वत्सनाभस्य स्वरूपमाह- सिन्धुवारसहक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा। यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।। २५० ।। वत्सनाभ विष के लक्षण-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार में जो बछड़े की नाभि के समान हो एवं जिसके समीप में अन्य वृक्षों की वृद्धि न होती हो उसे वत्सनाभ विष कहते हैं ।। २५० ।। अथ विषस्य शोधनविधिमाह- गोमूत्रे त्रिदिनं स्थाप्यं विषं तेन विशुद्ध्यति। रक्तसर्षपतैलाक्ते तथा धार्यञ्च वाससि ।। २५१ ।। ये गुणा गरले प्रोक्तास्ते स्युर्हीना विशोधनात्। तस्माद्विषं प्रयोगे तु शोधयित्वा प्रयोजयेत् ।। २५२ ।। विष शोधने की विधि-तीन दिन तक विष को गोमूत्र में भिगो कर रखने के बाद उसे लाल सरसों के तेल में भीगे हुये कपड़े के अन्दर रख दे, ऐसा करने से विष शुद्ध हो जाता है। जो प्राण हरण करना आदि दोष विष के कहे हुये हैं वे सब शोधन करने से ही (कम) हो जाते हैं। अतः विष को शोधन करके ओषधियों के काम में लायें ।। २५१-२५२ ।। अथ विषस्य गुणानाह- विषं प्राणहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च। आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् ।। २५३ ।। विष के गुण-विष-प्राणनाशक, व्यवायी, विकाशी, आग्नेय, वात-कफ नाशक, योगवाही तथा मदावह होता है ।। २५३ ।। ❖ व्यवायि=सकलकायगुणव्यापनपूर्वकं पाकगमनशीलम्। विकाशि=ओजः शोषणपूर्वकं सन्धि- बन्धशिथिलीकरणशीलम्। आग्नेयम्=अधिकाग्न्यंशम्। योगवाहि=सङ्गिगुणग्राहकम्। मदावहम्=- तमोगुणप्राधान्येन बुद्धिविध्वंसकम् ।। २५३ ।।

अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १००१ यहाँ ‘व्यवायि’ पद कां ‘प्रथम सम्पूर्ण शरीर में अपने गुणों को व्याप्त करके पश्चात् पचने वाला’, ‘विकाशि’ पद का ‘ओज को सुखाता हुआ सन्धि के बन्धनों को शिथिल करने वाला’, ‘आग्नेय’ पद का ‘अग्नि के अधिक अंशों से युक्त’, ‘योगवाहि’ पद का ‘जिसके साथ योग हो उसके गुणों को ग्रहण करने वाला’ और ‘मदावह’ पद का ‘तमोगुण की प्रधानता से बुद्धि को विध्वंस करने वाला’ अर्थ समझना चाहिये ।। २५३ ।। तदेव युक्तियुक्तन्तु प्राणदायि रसायनम्। योगवाहि परं वातश्लेष्मजित्सन्निपातहृत् ।। २५४।। इस प्रकार प्राणनाशक आदि दुर्गुणों से युक्त होता हुआ भी विष यदि युक्तिपूर्वक सेवन किया जाय तो प्राणशक्ति को देने वाला, रसायन, परम योगवाही, वात-कफनाशक एवं सन्निपात को दूर करने वाला होता है ।। २५४।। अथोपविषाणां निरूपणमाह- अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकः। गुञ्जाऽहिफेनो धत्तूरः सप्तोपविषजातयः ।। २५५ ।। उपविषों का निरूपण—आक का दूध, थूहर का दूध, कलिहारी, कनेर, गुञ्ज, अफीम, धतूर ये सात उपविष की जातियां हैं ।। २५५ ।। ❖ एतेषां शोधनं चिन्त्यम्। गुणास्तत्र द्रष्टव्याः ।। २५५ ।। यहाँ इन सबों के शोधन करने की विधि स्वयं विचार लेना चाहिये। जहाँ-जहाँ इनका द्रव्यगुण प्रकरण में उल्लेख है, वहाँ-वहाँ इनके गुण देख लेने चाहिये ।। २५५।। अथ द्रव्याणां गुणवत्तामवधिमाह- गुणहीनं भवेद्वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम्। मासद्वयात्तथा चूर्णं लभते हीनवीर्यताम् ।। २५६ ।। हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरं यदि। हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकास्तथा ।। २५७ ।। द्रव्यों के पूर्ण गुणयुक्त रहने की अवधि—जिस काष्ठौषधि का जैसा आकार है, उसी रूप में यदि वह रखा रह जाय तो १ वर्ष के बाद, यदि चूर्ण रूप में हो तो दो मास के बाद, गोली तथा अवलेह के रूप में हो तो एक वर्ष के बाद और घृत तथा तेल आदि के रूप में हो तो १ वर्ष ४ मास के बाद गुणहीन हो जाता है ।। २५६-२५७।। ❖ घृततैलाद्या इति योगविशेषणम्। चतुर्मासाधिकाः=वत्सरादुपरि चत्वारो मासाअधिकायेषु ते ।। २५६- २५७।। यहाँ ‘घृततैलाद्याः’ यह योग विशेषण है अर्थात् जो ओषधि डालकर घी वा तेल बनाये जाते हैं, उनका ग्रहण करना चाहिये। न कि केवल घी या तेल का तथा ‘चतुर्मासाधिकाः’ इस पद का ‘एक वर्ष से ऊपर ४ मास अधिक हो गये हैं जिसमें अर्थात् एक वर्ष चार मास के बाद’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। २५६-२५७।। अथ ग्रन्थान्तराद् घृततैलयोर्विशेषमाह- घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्। तैलं पक्वमपक्वञ्च चिरस्थायि गुणाधिकम् ।। २५८ ।। ग्रन्थान्तर से घी तथा तेल के विषय में विशेषता—एक वर्ष के बाद पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है और तेल चाहे पकाया या न पकाया हुआ हो जैसे-जैसे अधिक दिन का होता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है ।।२५८।। ❖ तदपि षोडशमासाभ्यन्तरीणं पक्वं तैलं गुणाधिकं बोद्धव्यम् ।। २५८ ।। यहाँ तेल के विषय में इतना और समझ लेना चाहिये कि— १६ मास के अन्दर तक ही पकाया हुआ तैल उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होता है, बाद में नहीं ।। २५८ ।। ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निंवीर्या वत्सरात्परम्। पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः ।। २५९।।

१००२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जल्दी ही पक कर तैयार हो जाने वाले धान्यादि एक वर्ष के बाद निर्वीर्य हो जाते हैं और आसव, धातु (सोना आदि) तथा रस (रससिन्दूरादि) जितने ही अधिक पुराने होते जाते हैं, उतने ही अधिक गुणकारी होते हैं ।।२५९।। ❖ ओषध्यः=धान्यादयः । लघुपाकाः=शीघ्रपाकाः । निर्वीर्याः स्युः ।।२५९।। यहाँ 'ओषध्यः' पद का 'धान्यादि' । 'लघुपाकाः' पद का 'शीघ्र पक कर तैयार हो जाने वाले, हीनवीर्य हो जाते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२५९।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणं समाप्तम् ।।३।। अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् ।।४।। तत्र स्नेहस्य भेदान् विशेषनामानि चाह- स्नेहश्चतुर्विधः प्रोक्तो घृतं तैलं वसा तथा ।। मज्जा च तं पिबेन्मर्त्यः किञ्चिदभ्युदिते रवौ ।।१।। स्थावरो जङ्गमश्चैव द्वियोनिः स्नेह उच्यते । तिलतैलं स्थावरेषु जङ्गमेषु घृतं वरम् ।। द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा यमकस्त्रिवृतो महान् ।।२।। स्नेह के भेद तथा विशेष नाम-स्नेह चार प्रकार का होता है । (१) घी, (२) तेल, (३) चर्बी और (४) मज्जा । स्नेह को थोड़ा सूर्य उदय हो जाने पर पीना चाहिये । इनकी दो योनियाँ हैं । एक स्थावर, दूसरी जङ्गम अर्थात् तेल स्थावर स्नेह और घी, चर्बी तथा मज्जा ये सब जङ्गम स्नेह कहलाते हैं । इससे स्नेह द्वियोनि कहलाता है । स्थावर स्नेहों में तिल का तेल और जङ्गम स्नेहों में घी उत्तम होता है । दो स्नेहों के मिलने से यमक, तीन के मिलने से त्रिवृत और चार के मिलने से महान् संज्ञक स्नेह होता है ।।१-२।। ❖ अस्यायमर्थः-द्वाभ्यां स्नेहाभ्यां घृततैलाभ्यां यमकाख्यः स्नेहः स्यात् । त्रिभिः-स्नेहैर्घृततैलव- सारूपैस्त्रिवृताख्यः स्यात् । चतुर्भिर्घृततैलवसामज्जभिर्महान्=महास्नेह स्यादित्यर्थः ।।१-२।। यहाँ 'द्वाभ्याम्' इत्यादि पदों का यह अर्थ समझना चाहिये कि-'दो स्नेह अर्थात् घी और तेल के मिलने से 'यमक' नामक स्नेह होता है। तीन स्नेह अर्थात् घी, तेल तथा चर्बी के मिलने से 'त्रिवृत्' अर्थात् 'महास्नेह' कहलाते हैं' १-२।। पिबेत् त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि वा ।।३।। तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन या छः दिन तक स्नेह पीना चाहिये ।।३।। ❖ मृदुमध्यक्रूरकोष्ठापेक्षया त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहानि चेति ।।३।। यहाँ 'मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ की अपेक्षा से तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन तथा छः दिन पीने को कहा है अर्थात् मृदुकोष्ठ वाला पुरुष तीन दिन तक, मध्य कोष्ठ वाला चार दिन तक इत्यादि क्रम से पीवे' । यदुक्तम्- मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निग्धस्नेहोपसेवया। मध्यकोष्ठश्चतुर्भिंश्च दिवसैः स्निह्यति ध्रुवम् ।।१।। पञ्चभिर्वाऽथ षड्भिर्वा दिनैः क्रूरो विशुद्ध्यति । सप्तरात्रात्परं स्नेहः सात्मीभवति सेवितः ।।२।।

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००३ क्योंकि कहा भी है कि-तीन रात्रि तक स्नेह का सेवन करने (पीने) से मृदुकोष्ठ वाला पुरुष स्निग्ध होता है। मध्य कोष्ठ वाला पुरुष चार दिन तक स्नेह सेवन करने से निश्चय स्निग्ध होता है और क्रूर कोष्ठवाला पाँच या छ दिन तक स्नेह सेवन करने से शुद्ध होता है। स्नेह का सेवन करते हुए जब सात रात्रि बीत जाती है, तब वह सात्म्य (शरीर के अनुकूल) हो जाता है। मृदुमध्यक्रूरकोष्ठानां सर्वेषां सप्तरात्रात्परं सात्मीभवति। वातानुलोम्यवह्निदीप्तिकोष्ठशुद्धिमृदु- स्निग्धाङ्गलाघवधातुपुष्टिद्विजदार्ढ्यनिर्जरताबलवर्णकारी भवति। न तु भक्तद्वेषग्लान्यादीन् करोति ।।३।। यहाँ यह भी समझना चाहिये कि-मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले सभों को ही सात रात्रि के बाद स्नेहसेवन सात्म्य हो जाता है। इससे वायु का अनुलोमन (अपने स्वाभाविक स्थिति पर रहना), अग्नि प्रदीप्त होना, कोष्ठ की शुद्धि, अङ्ग, स्वर आदि की मृदुता तथा स्निग्धता, अङ्गों की लघुता, धातुओं की पुष्टि, दाँतों की दृढ़ता, वृद्धावस्था से रहित होना, बल की वृद्धि तथा वर्ण की उज्ज्वलता होती है। किन्तु अन्न से द्वेष होना तथा ग्लानि आदि नहीं करता है ॥१-२॥३॥ दोषकालयोवह्निबलान्यालोक्य योजयेत्। हीनाञ्च मध्यमां ज्येष्ठां मात्रां स्नेहस्य बुद्धिमान् ।।४।। अमात्रया तथाऽकाले मिथ्याऽऽहारविहारतः। स्नेहः करोति शोथार्शस्तन्द्रानिद्राविसंज्ञताः ।।५।। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह-दोष (वातादि), काल (वसन्तादि ऋतु तथा प्रातः, मध्याह्न आदि), रोगों की अवस्था, अग्नि तथा बल को देख कर तदनुसार हीन, मध्यम तथा ज्येष्ठ मात्रा स्नेह की दे। बिना मात्रा के तथा असमय में एवं मिथ्या आहार-विहार करने के साथ-साथ स्नेह का सेवन करना मनुष्य को शोष, अर्श, तन्द्रा, निद्रा तथा बेहोशी उत्पन्न करने वाला होता है ॥४-५॥ द्वेया दीप्ताग्नये मात्रा स्नेहस्यैकपलोन्मितः । मध्यमाय त्रिकर्षा स्याज्जघन्याय द्विकार्षिकी ।।६।। दीप्त अग्नि वाले पुरुषों के लिये स्नेह पीने की मात्रा १ पल (चार तोले) की देनी चाहिये। मध्यम अग्नि वालों के लिये ३ कर्ष (३ तोले) की मात्रा और हीन अग्नि वालों के लिये दो कर्ष (२ तोले) की मात्रा स्नेह पीने को देनी चाहिये ॥६॥ ❖ मध्यमाय=मध्यमाग्नये। जघन्याय=हीनाग्नये ।।६।। यहाँ 'मध्यमाय' पद का 'मध्यम अग्नि वालों के लिये' तथा 'जघन्याय' पद का 'हीन अग्नि वालों के लिये' यह अर्थ समझना चाहिये ॥६॥ अथवा स्नेहमात्राः स्युस्तिस्रोऽन्याः सर्वसम्मताः। अहोरात्रेण महती जीर्यत्यह्नि तु मध्यम ।। जीर्यत्यल्पा दिनाद्धेन सा विज्ञेया सुखावहा ।।७।। अथवा सभी वैद्यों को अभिमत इनसे अन्य तीन प्रकार की मात्रायें और होती हैं-एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली जो स्नेहमात्रा होती है वह 'महती', दिन भर में पचने वाली मात्रा 'मध्यमा' और आधे दिन में ही पचने वाली मात्रा 'अल्पा (कनिष्ठा)' कहलाती है और वह (अल्प मात्रा) सुख देने वाली भी होती है ॥७॥ अयमर्थः-याऽहोरात्रेण जीर्यति सा मात्रा महती। एवं मध्यमा कनिष्ठा च ज्ञेया ।।७।। यहाँ यह अर्थ समझना चाहिये कि-जो एक दिन तथा एक रात्रि में पचने वाली होती है वह 'महती' नामक मात्रा होती है। इसी भाँति से मध्यमा तथा कनिष्ठा मात्रा को भी समझ लेना चाहिए ॥७॥ अल्पा स्याद्दीपनी वृष्या स्वल्पदोषे प्रपूजिता ।।८।। मध्यमा स्नेहनी ज्ञेया बृंहणी भ्रमहारिणी। ज्येष्ठा कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ।।९।।

१००४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अल्पा (कनिष्ठा) मात्रा अग्निदीपक तथा वीर्यवर्धक होती है और अल्प दोष वाले पुरुषों के लिये उत्तम होती है, ‘मध्यमा’ मात्रा स्नेहन करने वाली, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा भ्रमरोग नाशक होती है एवं ‘ज्येष्ठा’ मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहबाधा तथा मिर्गी को दूर करने वाली होती है ॥८-९॥ सुश्रुतः पुनरेवमाह- या मात्रा प्रथमे यामे गते जीर्यति वासरे। सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥१०॥ या मात्रा वासरस्यार्द्धे व्यतीते परिजीर्यति। सा वृष्या बृंहणी च स्यान्मध्यदोषे प्रपूजिता ॥११॥ या मात्रा चरमे यामे स्थितेऽह्नः परिजीर्यति। सा मात्रा स्नेहनी ज्ञेया बहुदोषेषु पूजिता ॥१२॥ केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम्। देयं बहुकफे वह्निव्योषक्षारसमन्वितम् ॥१३॥ मात्रा के विषय में सुश्रुत का मत-जो स्नेह की मात्रा दिन का एक प्रहर बीत जाने पर ही पच जाने वाली होती है, वह अग्नि को प्रदीप्त करने वाली तथा अल्प दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। जो मात्रा दिन के आधा भाग बीत जाने पर पच जाने वाली होती है वह वीर्यवर्धक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा मध्यम दोष वालों के लिये उत्तम होती है। और जो मात्रा दिन के अन्तिम प्रहर में पचने वाली होती है वह स्नेहन करने वाली तथा अधिक दोष वाले रोगियों के लिये उत्तम होती है। पित्त की अधिकता में केवल घृत-पान करने को देना चाहिये, वात की अधिकता में सेंधा नमक मिला कर घी देना चाहिये और कफ की अधिकता में चीता, सोंठ, पीपर, क्षार (जवाखार आदि) मिला कर घी पीने के लिये देना चाहिये ॥१०-१३॥ अथ सर्पिष्पानार्हजनानाह- रूक्षक्षतविषार्त्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिष्पानं प्रशस्यते ॥१४॥ घी पिलाने योग्य लोग-जो रूक्षता, क्षत (घाव) तथा विष से आर्त हों तथा जो वात और पित्तसम्बन्धी रोग से पीड़ित हों एवं जिनकी मेधा (धारण) शक्ति तथा स्मरण शक्ति हीन हो गई हो, ऐसे लोगों के लिये घी पिलाना उत्तम है ॥१४॥ अथ वसापानार्हजनानाह- कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धकफमेदसः। पिबेयुस्तैलसात्म्याश्च तलं दार्ढार्थिनस्तु ये ॥१५॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः। महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१६॥ तेल पिलाने योग्य लोग-जिनके कोष्ठ में कृमि पड़ गये हों या जो वातपीड़ित हों वा जिनका कफ तथा मेदा बढ़ गया हो अथवा जिन्हें तेल पीना सात्म्य (प्रकृति के अनुकूल) हो या शरीर को दृढ़ रखने की इच्छा हो ऐसे लोगों को तेल पिलाना (पीना) उचित है। वसा (चर्बी) पिलाने योग्य लोग-जो लोग व्यायाम (कसरत आदि) करने से कृश हो गये हों या जिनका वीर्य तथा रक्त सूख रहा हो या जो बड़े रोगी हों या जिनका जठराग्नि या वायु प्रबल हो या प्राण (बल) अधिक हो तो ऐसे लोग वसा पिलाने योग्य होते हैं ॥१५-१६॥ अथ मज्जः सर्पिषोऽपि पानार्हजनानाह- क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्त्ता दीप्तवह्नयः। मज्जानञ्च पिबेयुस्ते सर्पिर्वा सर्वतो हितम् ।। मज्जा तथा घी पिलाने योग्य लोग-जो क्रूर कोष्ठ वाले या क्लेश सहने वाले या वायु रोग से पीड़ित रहने वाले हैं, कि वा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हो ऐसे लोगों को अन्य सभी स्नेहों से अधिक हितकर समझ कर मज्जा या घी पिलाना उचित है ॥१७॥ क्रूराशयाः=क्रूरकोष्ठाः। सर्वतः=सर्वस्मात्स्नेहात् ॥१७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ स्नेहपानविधिप्रकरणम् १००५ यहाँ 'क्रूराशयाः' पद का 'क्रूर कोष्ठ वाले' तथा 'सर्वतः' पद का 'सभी स्नेहों से अधिक' अर्थ समझना चाहिये ॥१७॥ अथ शीतादिकालवातादिदोषभेदाभ्यां स्नेहपानसमयभेदानाह- शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिके रात्रौ वातश्लेष्माधिके दिवा ॥ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद से स्नेह पीने के समयों में भेद—शीत काल में दिन के समय और ग्रीष्म काल में रात्रि के समय स्नेह पिलाना (पीना) उचित है। वात-पित्त की अधिकता रहने पर रात्रि में तथा वात-कफ की अधिकता रहने पर दिन में स्नेह पिलाना उचित है ॥१८॥ अथ नस्यादिषु तैलघृतयोः प्रयोगे नियममाह- नस्याभ्यञ्जनगण्डूषमूर्ध्वकर्णाक्षितर्पणे । तैलं घृतं वा युञ्जीत दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ॥१९॥ नस्य (नास) आदि लेने में तैल तथा घृत का प्रयोग—नस्य (नास) लेना, शरीर में मालिस करना

१००६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ स्नेहाजीर्णशङ्कायां कर्तव्यकर्मण्याह- स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः। तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा ।।२५।। स्नेह के न पचने की आशङ्का होने पर कर्त्तव्य कर्म-यदि किसी मनुष्य को स्नेह के न पचने की आशङ्का हो तो वह गर्म जल पीवे, इससे शुद्ध उद्गार (डकार) होता है तथा अन्न खाने की रुचि उत्पन्न होती है ।।२५।। अथ स्नेहपानजतृष्णायाः प्रशमोपायमाह- स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः। तदाऽस्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य पाययेत्। शीतलं पायसं तेन तृष्णा तस्य प्रशाम्यति ।।२६।। स्नेह पीने से उत्पन्न हुई प्यास की शान्ति का उपाय-स्नेह पीने से पित्त प्रकृति वाले मनुष्य की जब जठराग्नि अत्यन्त तीक्ष्ण हो जाती है तब उसे अधिक प्यास लगती है, ऐसी अवस्था में उसे शीतल खीर खिलानी चाहिये जिससे कि प्यास शान्त हो जाय ।।२६।। अथ स्नेहपानायोग्यजनानाह- अजीर्णी वर्जयेत्स्नेहमुदरी तरुणज्वरी। दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छालो मेहपीडितः ।।२७।। दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः। अकालप्रसवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।।२८।। स्नेह पीने के अयोग्य लोग-जिन लोगों को अजीर्ण अथवा उदरसम्बन्धी रोग हो या जो नवीन ज्वर के रोगी हों या दुर्बल हों कि वा जिन्हें अरुचि हो वा जो मोटे हों कि वा मूर्च्छा या मेहरोग से पीड़ित हों अथवा जिन्हें बरित या विरेचन दिया गया हो वा वमन कराया गया हो या प्यास लगी हो अथवा जो परिश्रम से थक गये हों और जिस स्त्री को असमय में प्रसव हुआ हो ऐसे लोगों को स्नेह पिलाना या पीना उचित नहीं है। दुर्दिन अर्थात् जिस दिन आकाश मेघों से घिरा हो उस दिन भी स्नेहपान कराना अनुचित होता हैं ।।२७-२८।। अथ स्नेहपानयोग्यजनानाह- स्वेद्यासंशोध्यमद्यास्त्रीव्यायामासक्तचित्तकाः ।।२९।। वृद्धबालकृशा रूक्षाः क्षीणास्त्राः क्षीणरेतसः। वातार्त्तास्तिमिरार्त्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम् ।। स्नेहपान के योग्य लोग-जिन्हें स्वेद देना हो या जिनका विरेचनादि द्वारा शोधन करना हों अथवा जो मद्य (शराब), स्त्री, व्यायाम (कसरत आदि) में आसक्त चित्तवाले हों कि वा वृद्ध, बालक, दुर्बल या रूक्ष शरीर वाले हों अथवा जिनका रक्त या वीर्य क्षीण हो गया हों और जो वातरोग या तिमिररोग से पीड़ित हों ऐसे लोगों को स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना उत्तम होता है ।।२९-३०।। अथ सम्यक्स्निग्धस्य लक्षणान्याह- वातानुलोम्यं दीप्ताग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम्। मृदुस्निग्धाङ्गताऽग्लानिः स्नेहद्वेषोऽथ लाघवम् ।।३०।। विमलेन्द्रियता सम्यक्स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।।३१।। स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुये लोगों के लक्षण-वायु का अनुलोमन होना (अधोवायु आदि का यथोक्त रीति से होना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, चिकनाई लिये मल का अलग-अलग निकलना, शरीर का कोमल तथा स्निग्ध होना, ग्लानि न मालूम पड़ना, स्नेह पीने से द्वेष होना, शरीर में हल्कापन, इन्द्रियों में निर्मलता ये सब लक्षण स्नेहपान से भलीभाँति स्निग्ध होने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं और रूक्षता रहने पर इससे विपरीत लक्षण रहते हैं ।।३१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १००७ अथातिस्निग्धस्य लक्षणान्याह- भक्तद्वेषो मुखस्रवो गुदे दाहः प्रवाहिका। तन्द्राऽतीसारपाण्डुत्वं भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।। अधिक मात्रा में स्निग्ध हुए लोगों के लक्षण-अन्न से द्वेष होना, मुख से स्राव होना (लार गिरना), गुदा में दाह, प्रवाहिका (मल का पतला होकर बहना), तन्द्रा तथा अतीसार का होना एवं शरीर का पीला पड़ जाना ये सब लक्षण अधिक मात्रा में स्निग्ध हो जाने पर लोगों में उत्पन्न होते हैं ॥३२॥ अथ रूक्षातिस्निग्धयोर्जनयोः कर्त्तव्यकर्माण्याह- रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम्। श्यामाकचणकाद्यैश्च तक्रपिण्याकसक्तुभिः ।।३३।। रूक्ष तथा अत्यन्त स्निग्ध हुए लोगों के लिये कर्तव्य कर्म-जो लोग रूक्ष हों उन्हें स्नेहपान द्वारा स्नेहन कराना चाहिये और जो अधिक स्निग्ध हो गये हों तो उन्हें साँवा, चना आदि तथा तक्र (चतुर्थांश जलयुक्त छाछ), खली और सत्तू आदि खिला कर रूक्ष बनाना चाहिये ॥३३॥ अथ स्नेहसेवनस्य गुणानाह- दीप्ताग्निः शुद्धकोष्ठश्च पुष्टधातुर्दृढेन्द्रियः। निर्जरो बलवर्णाढ्यः स्नेह सेवी भवेन्नरः ॥३४॥ स्नेह सेवन करने के गुण-स्नेह का सेवन करने वाले मनुष्य की अग्नि प्रदीप्त होती है, कोष्ठ शुद्ध रहता है तथा धातु पुष्ट होता है, इन्द्रियाँ दृढ़ होती हैं एवं वह वृद्धावस्था से रहित तथा बल से युक्त होता है। उसके शरीर की कान्ति उत्तम होती है ॥३४॥ अथ स्नेहसेवने त्याज्यकर्माण्याह- स्नेहे व्यायामसंशीतवेगाघातप्रजागरान्। दिवास्वप्नमभिष्यन्दि रूक्षान्नञ्च विवर्जयेत् ॥३५॥ स्नेह का सेवन करने के समय त्याग करने योग्य कार्य-स्नेह सेवन करने के समय मनुष्य को उचित है कि व्यायाम (कसरत आदि) करना, अधिक शीत में रहना, मल-मूत्रादि के वेगों का रोकना, रात में अधिक जागना, दिन में सोना, अभिष्यन्दी (दही आदि) पदार्थ तथा रूक्ष अन्न का खाना इन सब कार्यों को छोड़ दे ॥३५॥ इति श्रीमिश्रलकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे चतुर्थं स्नेहपानविधिप्रकरणं समाप्तम् ॥४॥ अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् ॥५॥ अथ पञ्चकर्मनामान्याह- प्रथमं वमनं पश्चाद्विरेकश्चानुवासनम्। एतानि पञ्चकर्माणि निरूहो नावनं तथा ॥१॥ पञ्चकर्म के नाम-(१) वमन, (२) विरेचन, (३) अनुवासन, (४) निरूह, (५) नावन ये पाँच कर्म हैं और पञ्चकर्म से इन्हीं पाँचों का बोध होता है ॥१॥ अथ वमनम् । तत्रादौ वमनार्हसमयजनानाह- शरत्काले वसन्ते च प्रावृट्काले च देहिनाम्। वमनं रेचनं चैव कारयेत्कुशलो भिषक् ॥२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१००८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बलवन्तं कफव्याप्तं हल्लासादिनिपीडितम् । तथा वमनसात्म्यञ्च धीरचित्तञ्च वामयेत् ।। ३ ।। विषदोषे स्तन्यरोगे मन्देऽग्नौ श्लीपदेऽर्बुदे । हृद्रोगे कुष्ठवीसर्पमेहाजीर्णभ्रमेषु च ।। ४ ।। विदारिकाऽपचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु । अपस्मारे ज्वरोन्मादे तथा रक्तातिसारिषु ।। ५ ।। नासाताल्वोष्ठपाकेषु कर्णस्रावेऽधिजिह्वके । गलशुण्ड्यामतीसारे पित्तश्लेष्मगदे तथा ।। मेदोगदेऽरुचौ चैव वमनं कारयेद्भिषक ।। ६ ।। वमन कर्म में प्रथम वमन के योग्य समय और रोगियों का निर्देश-चतुर वैद्य को चाहिये कि वह शरत् (क्वार, कार्तिक) ऋतु, वसन्त (चैत, वैशाख) ऋतु तथा वर्षा (सावन, भादो) ऋतु इन समयों में मनुष्यों को वमन करावे तथा रेचन (जुलाव) दे । जो मनुष्य बलवान हो या कफ से व्याप्त हो वा हल्लास (उबकाई) आदि रोग से पीड़ित हो तथा धीर चित्त बाला हो और जिसे वमन कराना प्रकृति के अनुकूल पड़ता हो उसे वमन करावे । विषदोष (विषसम्बन्धी दोष), स्तन्य रोग (दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग) तथा अग्नि मन्द होने पर एवं श्लीपद (फीलपाँव), अर्बुद, हृद्रोग, कुष्ठ, वीसर्प, मेदरोग, अजीर्ण, भ्रम, विदारिका, अपची, खाँसी, श्वास (दमा), पीनस, वृद्धि (अण्डकोश वृद्धि), मिर्गी, ज्वर, उन्माद, रक्तातिसार इन रोगों में नासिका (नाक) तालु तथा ओष्ठ के पकने पर, कर्णस्राव (कान बहना), अधिजिह्वक, गलशुण्डी, अतीसार, पित्त तथा कफ सम्बन्धी रोग, मेदरोग और अरुचि इन सब रोगों में रोगी को वमन करावे ।।२-६।। ❖ स्तन्यरोगे=दुष्टदुग्धजनिते बालस्य रोगे ।। २-६।। यहाँ 'स्तन्यरोग' पद का 'दूषित दुग्ध पीने से उत्पन्न हुआ बालकों का रोग' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२-६।। अथ वमनानर्हजनानाह- न वामनीयस्तिमरी न गुल्मी नोदरी कृशः । नातिवृद्धो गर्भिणी च न स्थूलो न क्षतातुरः ।। मदात्त बालको रूक्षः क्षुधितश्च निरूहितः । उदावर्त्तूर्ध्वरक्ती च दुश्छर्द्यः केवलानिली ।। पाण्डुरोगी कृमिव्याप्तः पवनात्स्वरघातवान् ।। ९ ।। एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाग्या ये विषपीडिताः । कफव्याप्ताश्च ते वाभ्या मधुकक्वाथपानतः ।। वमन कराने के अयोग्य लोगों का निर्देश-जो लोग तिमिर, गुल्म तथा उदर रोग वाले हों या कृश (दुर्बल) शरीर तथा अत्यन्त वृद्ध हों एवं गर्भिणी स्त्री, स्थूल शरीर वाले, क्षत (घाव) से व्याकुल, मद से पीड़ित, बालक, रूक्ष शरीरवाले या भूखे हों और जिन्हें निरूहण बस्ति दी गई हो या जो उदावर्त्त रोग वाले हों या जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो या जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों अथवा जो केवल वातरोग से पीड़ित हों या पाण्डुरोगी हों वा जिनके उदर में क्रिमि पड़ गये हों तथा वायु से जिनका स्वरभङ्ग हो गया हो ऐसे लोगों को वमन कराना उचित नहीं है । किन्तु ऐसे लोग भी यदि अजीर्ण होने से या विष से पीड़ित हों अथवा कफ से व्याप्त हों अर्थात् कफ की अधिकता हो तो मुलेठी का क्वाथ पिलाने के द्वारा वमन कराने के योग्य होते हैं ।। ❖ ऊर्ध्वरक्ती=यस्य नासाक्षिकर्णारस्यमार्गै रक्तं प्रवर्त्तते सः । भक्त रूक्षकर्कशद्रव्यो-'दुश्छर्द्यः' । मधुकस्थाने मधूकेति द्वितीयः पाठः ।।७-१०।। यहाँ 'ऊर्ध्वरक्ती' पद का 'जिनके नाक, आँख, कान तथा मुख की राह से रक्त गिरता हो' 'दुश्छर्द्यः' पद का 'जो रूक्ष तथा कठिन द्रव्य खा लिये हों' यह अर्थ तथा 'मधुक' पद के स्थान में मधूक (महुआ) यह दूसरा पाठ है यह भी समझना चाहिये ।।७-१०।।

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १००९ अथ वमनविधिमाह- सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुञ्च वामयेत्। पाययित्वा यवागूं वा क्षीरतक्रदधीनि च ।।११।। असात्म्यैः श्लेष्मलैर्भोज्यैर्दोषानुत्क्लेश्य देहिनाम्। स्निग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक्प्रवर्त्तते ।।१२।। वमनेषु च सर्वेषु सैन्धवं मधु वा हितम्। बीभत्सं वमनं दद्याद्विपरीतं विरेचनम् ।।१३।। वमन कराने की विधि-जो लोग सुकुमार, कृश, बालक, वृद्ध या भीरु (वमन से डरने वाले) हों, उन्हें यवागू या दूध तक्र (छाछ) अथवा दही पिलाकर वमन कराना चाहिये। प्राणियों को यदि प्रथम असात्म्य (प्रकृति के अननुकूल) तथा कफकारक भोज्य पदार्थ खिलाने के द्वारा दोषों को बाहर निकालने के लिये उन्मुख करके स्नेहन करा चूकने पर वमन कराया जाय तो वमन अच्छी तरह से होता है, संपूर्ण वमन कराने वाली औषधियों में सेंधा नमक तथा मधु हितकर होता है। वमन कराने वाली जो ओषधियाँ दी जायँ वे अरुचिकर होनी चाहिये किन्तु विरेचन कराने वाली इसके विपरीत (रुचिकर) होनी चाहिये ।।११-१३।। ❖ बीभत्सम्=अरुच्यम् । विपरीतं=रुच्यम् ।।११-१३।। यहाँ 'बीभत्स' पद का 'अरुचिकर' । 'विपरीत' पद का 'रुचिकर' अर्थ समझना चाहिये ।।११-१३।। क्वाथद्रव्यस्य कुडवं श्रपयित्वा जलाढके। अर्द्धभागावशिष्टञ्च वमनेष्ववचारयेत् ।।१४।। क्वाथपाने नवप्रस्था ज्येष्ठा मात्रा प्रकीर्तिता। मध्यमा षण्मिता प्रोक्ता त्रिप्रस्था च कनीयसी ।।१५।। वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। अर्द्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनीषिणः ।।१६।। जिस वामक द्रव्य का काथ बनाना हो उसे १ कुडल (१६ भर) लेकर एक आढक (३ सेर ३ छ. १) भर) जल में क्वाथ बनाकर आधा (१ से ९ छ. ३) भर) शेष रह जाने पर वमन कराने के लिये देना चाहिये। वमन के लिये क्वाथ पिलाने में ९ प्रस्थ (२ सेर १४ छ. ४) भर) की मात्रा 'ज्येष्ठा' (बड़ी) कहलाती है। ६ प्रस्थ (१ सेर १५ छ. १) भर) की 'मध्यमा' (औसत) तथा ३ प्रस्थ (१५ छ. ३) भर) की 'कनिष्ठा' (छोटी) मात्रा कहलाती है और वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण (रक्त निकलवाने) में पण्डित लोग एक प्रस्थ को ६।। पलों के बराबर मानते हैं ।।१४-१६।। अर्द्धत्रयोदशपलं=सार्द्धषट्कम् ।।१४-१६।। यहाँ 'अर्द्धत्रयोदशपलम्' पदका ६।। साढ़े छ पल' अर्थ समझना चाहिये ।।१४-१६।। कल्कचूर्णावलेहानां त्रिपलं मात्रयोत्तमम्। मध्यमं द्विपलं विद्यात्कनीयस्तु पलं भवेत् ।।१७।। वमने चाष्टवेगाः स्युः पित्तान्ता उत्तममास्तु ते। षड् वेगा मध्यमा वेगाश्चत्वारस्त्वपरे मताः ।।१८।। कफं कटुकतीक्ष्णोष्णैः पित्तं स्वादुहिमैर्जयेत्। सुस्वादुलवणाम्लोष्णैः संसृष्टं वायुना कफम् ।।१९।। कृष्णां राठफल सिन्धुं कफे कोष्णजलैः पिबेत्। पटोलवासानिम्बांश्च पित्ते शीतजलैः पिबेत् ।।२०।। कल्क, चूर्ण तथा अवलेह की मात्रा तीन पल (१२) भर) की उत्तम, दो पल (८) भर) की मध्यम एवं एक पल (४) भर) की कनिष्ठ होती है। वमन में ८ वेग हो तथा अन्त में पित्त निकलने लगे तो उत्तम वमन का वेग, ६ वेग होने से मध्यम तथा ४ वेग होने से कनिष्ठ समझना चाहिये। वमन कराने वाले को कटु, तीक्ष्ण तथा उष्ण द्रव्यों से कफ का दोष शान्त करना चाहिये। स्वादिष्ट तथा शीतल द्रव्यों से पित्त का और अत्यन्त स्वादिष्ट, लवण तथा अम्लरसयुक्त उष्ण द्रव्यों द्वारा वायुयुक्त कफ का दोष दूर करना चाहिये। कफ में पीपल, मयनफल, सेंधा चूर्ण को कुछ गर्म जल के साथ और पित्त में परवल, अडूसा तथा नीम के चूर्ण को शीतल खल के साथ पीवे अर्थात् इनके द्वारा वमन करावे ।।१७-२०।। ❖ राठफलम्=मदनफलम् ।।१७-२०।। ६७ भांव.I

१०१० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यहाँ 'राठफल' पद का 'मयन फल' अर्थ समझना चाहिये ॥१७-२०॥ सश्लेष्मवातपीडायां सक्षीरं मदनं पिबेत् । अजीर्णे कोष्णपानीयं सिन्धुं पीत्वा वमेत्सुधीः ॥२१॥ कफयुक्त-वातसम्बन्धी पीड़ा में मयनफल के चूर्ण के साथ दूध पिलाकर तथा अजीर्ण होने पर किंचित् गर्म जल में सेंधा नमक छोड़कर उसे पिलाकर वमन करावे ॥२१॥ ❖ मदनं=मयनफलम् ॥२१॥ यहाँ 'मदन' पद का 'मैनफल' अर्थ समझना चाहिये ॥२१॥ वमनं पाययित्वा तु जानुमात्रासने स्थितम् । कण्ठमेरण्डनालेन स्पृशन्तं वामयेद्भिषक् ॥२२॥ प्रसेको हृद्ग्रहः कोठः कण्डूर्दुश्छर्दिते भवेत् । अतिवान्ते भवेत्तृष्णा हिक्कोद्गारो विसंज्ञिता ॥२३॥ जिह्वानिःसरणं चाक्ष्णोर्व्यावृत्तिर्हनुसंहतिः । रक्तच्छर्दिः ष्ठीवनञ्च कण्ठपीडा च जाय

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०११ व्यावृत्तेऽक्षिण घृताम्यक्तेपीडनञ्च शनैः शनैः । हनुमोक्षे स्मृतः स्वेदो नस्यञ्च श्लेष्मवातहृत् ।। २७ ।। रक्तपित्तविधानेन रक्तष्ठीवमुपाचरेत् । धात्रीरसाञ्जनोशीरलाजाचन्दनवारिभिः ।। २८ ।। मन्थं कृत्वा पाययेच्च सघृतं क्षौद्रशर्करम् । शाम्यन्त्यनेन तृष्णाऽऽढ्या रोगाश्छर्दिसमुद्भवाः ।। २९ ।। हृत्कण्ठशिरसां शुद्धिर्दीप्ताग्नित्वञ्च लाघवम् । कफपित्तविनाशश्च सम्यग्वान्तस्य लक्षणम् ।। ३० ।। ततोऽपराह्ने दीप्ताग्निं मुद्गषष्टिकशालिभिः । हृद्यैश्च जाङ्गलरसैः कृत्वा यूषञ्च भोजयेत् ।। ३१ ।। तन्द्रा निद्राऽऽस्यदौर्गन्ध्यं कण्डूश्च ग्रहणी विषम् । सुवान्तस्य न पीडायै भवन्त्येते कदाचन ।। ३२ ।। अजीर्णं शीतपानीयं व्यायामं मैथुनं तथा । स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।। ३३ ।। यदि आँख की पुतलियाँ ऊपर की ओर चढ़ गई हों तो आँखों में घी लगाकर धीरे-धीरे भीतर को दबाना चाहिये । यदि दोनों जबड़े एक में न मिलते हों अर्थात् मुख फैल गया हो तो स्वेदन कराना चाहिये तथा कफ और वातनाशक ओषधियों का नास देना चाहिये अर्थात् नाक में डालना चाहिये । यदि थूक के साथ रक्त दिखाई पड़ता हो तो रक्तपित्त वाले रोगी की जैसी चिकित्त्स्र की जाती है वैसी करनी चाहिये । आमला, रसवत, खस ओर धान का लावा इन सबों को सफेद चन्दन मिश्रित जल के साथ खूब मथ कर उस में घी, शक्कर तथा शहद डाल कर पिलाया जाय तो इससे अति वमन होने से उत्पन्न हुये पूर्वोक्त प्यास आदि रोग (उपद्रव) शान्त हो जाते हैं। उत्तम रीति से वमन होने पर—हृदय, गला तथा सिर की शुद्धि (हल्का तथा साफ होना), अग्नि का प्रदीप्त होना, शरीर हल्का मालूम पड़ना और कफ तथा पित्त का दोष नष्ट हो जाना ये जब लक्षण उत्पन्न होते हैं। उसके बाद (उत्तम रीति से वमन हो जाने के बाद) अपराह्न (२ बजे के बाद) में प्रदीप्त अग्नि वाले पुरुष को मूँग की दाल, साठी या अगहनी धान का चावल तथा हृदय के लिये हितकर (रुचकारी) जङ्गली जीवों का मांस का रस (सुरुवा) इन सबों का जूस बनाकर भोजन के लिये देना चाहिये । जिसे भलीभाँति वमन हुआ है उसके लिये तन्द्रा, मुख से दुर्गन्ध निकलना, खुजली, संग्रहणी और विष ये सब कभी पीड़ा देने वाले नहीं होते । बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वमन करने पर एक दिन तक अजीर्ण भोजन, शीतल जल, व्यायाम (कसरत आदि), मैथुन (स्त्रीसङ्ग) तेल की मालिश और क्रोध इन सबों को छोड़ दे ।।२७-३३।। इति वमनाधिकारः अथ विरेचनम् तत्रादौ विरेचनार्हसमयजनानाह- स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय दद्यात्सम्यग्विरेचनम् । अवान्तस्य त्वधःस्रस्तो ग्रहणीं छादयेत्कफः ।।३४।। मन्दाग्निं गौरवं कुर्याज्जनयेद्वा प्रवाहिकाम् । अथ वा पाचनैरामं बलासं परिपाचयेत् ।।३५।। ऋतौ वसन्ते शरदि देहशुद्धौ विरेचयेत् । अन्यदाऽऽत्ययिके कार्ये शोधनं शीलयेद् बुधः ।।३६।। विरेचन के योग्य समय तथा व्यक्ति का निर्देश—प्रथम मनुष्य को स्नेहपान तथा स्वेदन करा कर वमन करा चुकने पर उत्तम रीति से विरेचन दे क्योंकि बिना वमन कराये ही विरेचन देने पर उस मनुष्य का कफ नीचे खिसक कर ग्रहणी को ढक लेता है और उससे मन्दाग्नि तथा शरीर में गुरुता उत्पन्न हो जाती है अथवा प्रवाहिका रोग हो जाता है । यदि वमन न कराया हो तो प्रथम अपरिपक्व कफ का पाचन ओषधियों के द्वारा करावे । वसन्त तथा शरद् ऋतु में ही देहस्थित दोषों की शुद्धि के लिये विरेचन लेना उचित है । यदि प्राण सङ्कट में हो अर्थात् शोधन करना उस समय अत्यावश्यक हो तो बुद्धिमान मनुष्य वसन्तादि से अन्य ऋतुओं में भी विरेचनादि द्वारा देहशोधन कर ले ।।३४-३६।। ❖ आत्ययिके=प्राणसंकटे ।। ३४- ३६ ।। यहाँ 'आत्ययिके' पद का 'प्राण-सङ्कट में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३४-३६।। पित्ते विरेचनं युञ्ज्यादामोद्भूते गदे तथा । उदरे च तथाऽऽध्माने कोष्ठशुद्धौ विशेषतः ।।३७।। दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । शोधनैः शोधिता ये तु न तेषां पुनरुद्भवः ।।३८।।

१०१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बालो वृद्धो भृशं स्निग्धः क्षतक्षीणे भयान्वितः। श्रान्तस्तृषाऽऽर्त्तः स्थूलश्च गर्भिणी च नवज्वरी ।।३९।। नवप्रसूता नारी च मन्दाग्निश्च मदात्ययी। शल्यार्दितश्च रूक्षश्च न विरेच्या विजानता ।।४०।। जीर्णज्वरी गरव्याप्तो वातरोगी भगन्दरी। अर्शः पाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः ।।४१।। योनिरोगप्रमेहार्त्ता गुल्मप्लीहव्रणार्दिताः। विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्ठसंयुताः ।।४२।। कर्णनासाशिरोवक्त्रगुदमेढ्रामयान्विताः। प्लीहशोथाक्षिरोगार्त्ताः कृभिक्षारानिलार्दिताः ।।४३।। शूलिनो मूत्राघातात्र्त्ता विरेकाहाँ नरा मताः ।।४४।। पित्त की अधिकता, आमसम्बन्धी रोग, उदररोग तथा आध्मान (अफारा) होने पर एवं विशेषतः कोष्ठ की शुद्धि के लिये विरेचन अवश्य लेना चाहिये। केवल लङ्घन तथा पाचनद्वारा ही शान्त किये गये वातादि दोष सम्भव है कि किसी समय पुनः कुपित हो जायें, किन्तु जो शोधन (विरेचनादि) द्वारा किये गये हैं उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् पुनः वे प्रकुपित नहीं होते हैं। बालक, वृद्ध, स्नेहपानद्वारा अत्यन्त स्निग्ध हुये, क्षत (घाव) से क्षीण, भय से युक्त, परिश्रम करने से थके हुये, प्यास से दुःखी, स्थूल शरीर वाले, गर्भिणी स्त्री, नवीन ज्वर वाले रोगी, तत्काल प्रसव जिसे हुआ हो ऐसी स्त्री, मन्दाग्निवाले, मदात्यय रोग युक्त, शल्य (बाण आदि) लगने से पीड़ित तथा रूक्ष शरीर वाले जो हों उन्हें बुद्धिमान वैद्य कभी विरेचन न देवे। पुराने ज्वर वाले, विष से व्याप्त शरीर वाले, वातरोगी, भगन्दर, अर्श, पाण्डु, उदररोग, ग्रन्थि (गिल्टी), हृद्रोग तथा अरुचि से पीड़ित, योनिसम्बन्धी रोग से पीड़ित स्त्री, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा तथा व्रण से पीड़ित, विद्रधि, वमन, विस्फोट, हैजा तथा कुष्ठ से युक्त, कान, नाक, सिर, मुख, गुदा तथा शिश्न (मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी रोग वाले, प्लीहाजन्य शोथ तथा नेत्रसम्बन्धी रोग से युक्त, कृमि, क्षार तथा वायु से पीड़ित, शूल रोग वाले तथा मूत्राघात से दुःखी जो हों वें विरेचन देने के योग्य माने गये हैं ।।३७-४४।। अथ मृदुमध्यमक्रूरकोष्ठँस्तद्योग्यमात्राद्रव्यादीनि चाह- बहुपित्तो मृदुः कोष्ठो बहुश्लेष्मा च मध्यमः। बहुवातः क्रूरकोष्ठो दुर्विरेच्यः स कथ्यते ।।४५।। मृद्वी मात्रा मृदौ कोष्ठे मध्यकोष्ठे च मध्यमा। क्रूरे तीक्ष्णा मता द्रव्यैर्मृदुमध्यमतीक्ष्णकैः ।।४६।। मृदुर्द्राक्षापयश्चञ्चुतैलैरिप विरिच्यते। मध्यमस्त्रिवृतातिक्राराजवृक्षैर्विंरिच्यते। क्रूरः स्नुक्पयसा हेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः ।।४७।। मृदु, मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ वाले मनुष्यों तथा उनके योग्य मात्रा एवं द्रव्यों का वर्णन-अधिक पित्त वालों का कोष्ठ मृदु, अधिक कफ वालों का मध्यम तथा अधिक वात वालों का क्रूर होता है और इनका विरेचन बड़ी कठिनता से होता है। अतएव यह दुर्विरेच्य कहलाते हैं। मृदु कोष्ठ होने पर रोगी के लिये विरेचन द्रव्यों की मात्रा मृदु, मध्यम कोष्ठ होने पर मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ होने पर तीक्ष्ण मात्रा देनी उचित है। मृदु, मध्य तथा क्रूर कोष्ठ वाले रोगियों को क्रम से मृदु, मध्यम तथा तीक्ष्ण वीर्य वाले द्रव्यों से विरेचन कराना उचित है। मृदु कोष्ठ वालों को दाख, दूध तथा एरण्ड के तेल के द्वारा, मध्यम कोष्ठ वालों को निशोथ, कुटकी तथा धनबहेरा (अमलतास) के द्वारा और क्रूर कोष्ठ वालों को थूहर का दूध, चोक तथा बड़ी दन्ती के फल (जमालगोटा) के द्वारा विरेचन कराना उचित होता है ।।४५-४७।। ❖ चञ्चुतैलम्=एरण्डतैलम् । राजवृक्षः=धनबहेरा । हेमक्षीरी(चोक) । दन्तीफलं=बृहद्दन्तीफलम्, जयपालेति प्रसिद्धम् ।।४५-४७।। यहाँ 'चञ्चुतैल' से 'एरण्ड का तैल', 'राजवृक्ष' से 'धनबहेरा' (अमलतास), 'हेमक्षीरी' से 'चोक' तथा 'दन्तीफल' से 'बड़ी दन्ती का फल लोकप्रसिद्ध जमालगोटा' का बोध करना चाहिये ।।४५-४७।। मात्रोत्तमा विरेकस्य त्रिंशद्वेगैः कफान्तिका। वेगैर्विंशतिभिर्मध्या हीनोक्ता दशवेगिका ।।४८।। द्विपलं श्रेष्ठमाख्यातं मध्यमं च पलं भवेत्। पलार्द्धं च कषायाणां कनीयस्तु विरेचनम् ।।४९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चमं पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् १०१३ कल्कमोदकचूर्णानां कर्षो मध्वाज्यलेहतः । कर्षद्वयं पलं वाऽपि वयोरोगाद्यपेक्षया ॥५०॥ पित्तोत्तरे त्रिवृच्चूर्णं द्राक्षाक्वाथादिभिः पिबेत् । त्रिफलाक्वाथगोमूत्रैः पिबेद् व्योषं कफार्दितः ॥५१॥ त्रिवृत्सैन्धवशुण्ठीनां चूर्णमम्लैः पिबेन्नरः । वातार्दितो विरेकाय जाङ्गलानां रसेन वा ॥५२॥ विरेचन की जब उत्तम मात्रा होती है तब विरेचन का वेग ३० बार होता है तथा अन्त में कफ निकलने लगता है। मध्यम मात्रा में विरेचन का वेग २० बार और हीन मात्रा में विरेचन का वेग १० बार होता है। जब क्वाथ द्वारा विरेचन कराया जाता है तब उसकी २ पल (८ भर) की मात्रा श्रेष्ठ, १ पल (४ भर) की मात्रा मध्यम तथा आधे पल (२ भर) की मात्रा कनिष्ठ कहलाती है। रोगी की अवस्था तथा रोग के अनुसार विचार कर मधु तथा गौ के घी के साथ मिला कर कल्क, मोदक या चूर्ण के द्वारा विरेचन कराने में इनकी मात्रा १ कर्ष (१ भर), २ कर्ष (२ भर) या १ पल (४ भर) की देनी चाहिये। जब पित्त की अधिकता हो तब दाख के क्वाथ आदि के साथ निसोध का चूर्ण विरेचन के लिये खिलाना चाहिये। जब कफ की अधिकता हो तब विरेचन के लिये रोगी को त्रिफला का क्वाथ तथा गोमूत्र के साथ त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च) का चूर्ण खिलाना चाहिये। वात से पीड़ित रोगी को अम्ल पदार्थों के रस के साथ अथवा जांगल जीवों के मांसरस के साथ निसोध, सेंधा नमक तथा सोंठ का चूर्ण खिला कर विरेचन कराना चाहिये ॥४८-५२॥ एरण्डतैलं त्रिफलाक्वाथेन द्विगुणेन वा । युक्तं पीतं पयोभिर्वा न चिरेण विरिच्यते ॥५३॥ यदि एरण्ड का तेल दुगुने त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेरा) के क्वाथ के साथ अथवा दूध के साथ मिला कर पिलाया जाय तो विरेचन देर में नहीं होता है ॥५३॥ ❖ शीघ्रमेव विरिच्यत इत्यर्थः ॥५३॥ यहाँ 'विरेचन देर में नहीं होता' इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'शीघ्र ही विरेचन होता है' ॥५३॥ अथर्तुभेदेन विरेकद्रव्यभेदानाह- त्रिवृता कौटजं बीजं पिप्पली विश्वभेषजम् । समृद्वीकारसं क्षौद्रं वर्षाकाले विरेचनम् ॥५४॥ त्रिवृद्दुरालभामुस्तशर्करोदीच्यचन्दनम् । द्राक्षाऽम्बुना सयष्ट्याह्वं शीतलक्ष्णं घनात्यये ॥५५॥ ऋतु भेद से विरेचन द्रव्यों में भेद-वर्षाऋतु में दाख का रस तथा शहद के साथ निसोध, इन्द्रजौ, पीपर तथा सोंठ का चूर्ण खिला कर विरेचन कराना चाहिये। शरद् ऋतु में दाख के क्वाथ को शीतल करके उसके साथ निसोध, धमासा, नागरमोथा, साफ शक्कर, सुगन्धवाला तथा मुलेठी का चूर्ण खिला कर विरोचन कराना चाहिये ॥५४-५५॥ ❖ उदीच्यं=वाला । घनात्यये=शरदि ॥५४-५५॥ यहाँ 'उदीच्यम्' पद का 'सुगन्धवाला' तथा 'घनात्यये' पद का 'शरद् ऋतु में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥५४- ५५॥ त्रिवृता चित्रकं पाठामजाजीं सरलं वचाम् । हेमक्षीरीं हेमन्ते तु चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत् ॥५६॥ पिप्पलीं नागरं सिन्धुं श्यामां त्रिवृतया सह । लिह्यात्क्षौद्रेण शिशिरे वसन्ते च विरेचनम् ।। त्रिवृता शर्करा तुल्या ग्रीष्मकाले विरेचनम् ॥५८।। हेमन्त ऋतु में गर्म जल के साथ निसोध, चीता, पाढ़, जीरा, धूप, बालवच तथा चोक का चूर्ण खिला कर, शिशिर तथा वसन्त ऋतु में शहद के साथ पीपर, सोंठ, सेंधानमक, सारिवा और निसोध का चूर्ण चटा कर और ग्रीष्म ऋतु में केवल निसोध के चूर्ण में सम भाग साफ शक्कर खिलाकर विरेचन कराना चाहिये ॥५६-५८॥ ❖ श्यामा (सारिवा) ॥५६-५८॥ यहाँ 'श्यामा' पद का 'सारिवा' अर्थ समझना चाहिये ॥५६-५८॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाभयादिमोदकः- अभया मरिचं शुण्ठीविडङ्गामलकानि च। पिप्पलो पिप्पलीमूलं त्वक्पत्रं मुस्तमेव च ।।५९।। एतानि समभागानि दन्ती तु त्रिगुणा भवेत्। त्रिवृताऽष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ।।६०।। मधुना मोदकान्कृत्वा कर्षमात्रान्प्रमागतः। एकैकं भक्षयेत् प्रातः शीतञ्चानु पिबेज्जलम् ।।६१।। तावद्विरिच्यते जन्तुर्यावदुष्णं न सेवते। पानाहार विहारेषु भवेन्नियन्त्रणः सदा ।।६२।। विषमज्वरमन्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामिकुष्ठगुल्मार्शोगलगण्डोदरभ्रमान् ।।६३।। विदाहप्लीहमेहांश्च यक्ष्माणं नयनामयान्। वातरोगांस्तथाऽऽध्मानं मूत्रकृच्छादि चाश्मरीम् ।।६४।। पृष्ठपार्श्वोरुजघनजङ्घोदररुजं जयेत्। स्नेहाभ्यङ्गञ्च रोषञ्च दिनमेकं सुधीस्त्यजेत् ।।६५।। सततं शीलनादेव पलितानि प्रणाशयेत्। अभयामोदका होते रसायनवराः स्मृताः ।।६६।। अभयादिमोदक-बड़ी हर्रें, मरिच, सोंठ, वायविडङ्ग, आमला, पीपर, पिपरामूल, तज, तेजपात और नागरमोथा इन सबों का चूर्ण सम भाग एकत्र कर उसमें ३ गुना दन्ती के जड़ का चूर्ण, ८ गुना निसोध का चूर्ण और ६ गुना साफ शक्कर मिला कर शहद के साथ १ कर्ष (१ भर) के बराबर-बराबर लड्डू बनाकर रख ले, उसमें से एक-एक लड्डू प्रतिदिन प्रातः काल खाकर ऊपर से शीतल जल पी ले, इससे तब तक विरेचन होता रहेगा जब तक गर्म जल का गर्म अन्न न खावे। इसके सेवन करने के समय सदा खाने, पीने तथा चलने-फिरने आदि में किसी तरह का नियम नहीं करना पड़ता है। सेवन करने से यह निष्मज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डु, कास, भगन्दर, बवासीर, कुष्ठ, गुल्म, गलगण्ड, उदररोग, भ्रमरोग, विदाह, प्लीहा, मेह्रोग, यक्ष्मा, नेत्र तथा वातसम्बन्धी रोग, अफरा, मूत्रकृच्छादि मूत्रसम्बन्धी रोग, पथरी एवं पीठ, पंसुली, ऊरु, जङ्घा तथा उदर की पीड़ा को दूर करता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वह जिस दिन इसका सेवन करे उस दिन तेल की मालिश और क्रोध करना छोड़ दे। इसका निरन्तर सेवन करने से पलित (अकाल में वाल पक जाना) रोग नष्ट हो जाता है। अतएव यह अभयामोदक रसायनों में उत्तम रसायन माना गया है ।।५९-६६।। अथ विरेकोत्तरकर्माणयाह- पीत्वा विरेचनं शीतजलैः संसिच्य चक्षुषी। सुगन्धि किञ्चिदाघ्राय ताम्बूलं शीलयेद् बुधः ।।६७।। निर्वातस्थो न वेगांश्च धारयेन्न शयीत च। शीताम्बु न स्पृशेत्क्वापि कोष्र्णानीरं पिबेन्मुहुः ।।६८।। बलासौषधपित्तानि वायुर्वान्ते यथा व्रजेत्। रेकात्तथा मलं पित्तं भेषजञ्च कफो व्रजेत् ।।६९।। विरेचन लेने के बाद कर्त्तव्य कर्म-विरेचन ओषधि पीने के बाद दोनों आँखों में शीतल जल का छींटा देकर और कोई सुगन्धित पदार्थ इत्र आदि थोड़ा सूंघ कर पान खाना चाहिये और वायुरहित स्थान में बैठना चाहिये। शौच का वेग रोकना, सोना तथा शीतल जल का स्पर्श कभी भी नहीं करना चाहिये बल्कि किञ्चित् गर्म जल बारम्बार पीना चाहिये। वमन करने पर जिस तरह से कफ, औषध, पित्त तथा वायु मुख की राह से निकलता है, उसी तरह से विरेचन ❖ लेने पर गुदा की राह से मल, पित्त, औषध तथा कफ निकलता है ।।६७-६९।। अथ दुर्वरिक्तातिविरिक्तयोर्लक्षणानि भेषजं चाह- दुर्वरिक्तस्य नाभेस्तु स्तबन्द्यता कुक्षिशूलरुक्। पुरीषवातसङ्गश्च कण्डूमण्डलगौरवम् ।।७०।। विदाहोऽरुचिराध्मानं भ्रमश्छर्दिश्च जायते। तं पुनः पाचनैः स्नेहैः पक्त्वा स्निग्धं तु रेचयेत् ।। तेनास्योपद्रवा यान्ति दीप्ताग्निर्लघुता भवेत् ।।७१।। विरेकस्यातियोगेन मूर्च्छा भ्रंशो गुदस्य च। शूलं कफात्तियोगः स्यान्मांसाधावनसन्निभम् ।।७२।। मेदोनिभं जलाभासं रक्तञ्चापि विरिच्यते। तस्य शीताम्बुभिः सिक्त्वा शरीरं तण्डुलाम्बुधि ।।७३।। मधुमिश्रैस्तथा शीतैः कारयेद्वमनं मृदु। सहकारत्वचः कल्को दध्ना सौवीरकेण वा ।।७४।। पिष्ट्वा नाभिप्रलेपेन हन्त्यतीसारमुल्वणम्। सौवीरं तु यवैरामैः पक्वौर्वा निस्तुषीकृतैः ।।७५।।