भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८१ सीसा के मारने की विधि- पान के रस के मैनसिल को बारीक चटनी सा पीस ले और सीसे पर उसी का चारो- तरफ लेकर गजपुट की अग्नि में पका ले। तत्पश्चात् पुनः निकाल कर उक्त मैनशिल का प्रलेप करके गजपुट में पकावे, इस प्रकार ३२ पुट देने से सीसे की निरुत्थ (पुनः नहीं जीवित होने वाली) भस्म तैयार हो जाती है ॥८३॥ ❖ शिला=मनःशिलाः ।।८३।। यहाँ शिला' से 'मैनशिल' का ग्रहणकरना चाहिये ॥८३॥ अथापरं सीसकमारणविधिमाह- अश्वत्थचिञ्चात्वक्चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्। मृत्पात्रे विद्रुतो नागो लोहदर्व्या प्रचालितः ।।८४।। यामैकेन भवेद्भस्म तत्तुल्या स्मान्मनःशिला । काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद्गजपुटेन च ।।८५।। स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च। पुनः पचेच्छरावाभ्यामेवं षष्ठिपुटैर्मृतिः ।।८६।। सीसा मारने की दूसरी विधि-मिट्टी के पात्र में सीसे को गला कर उसमें सीसे का चतुर्थांश पीपल तथा इमली के छाल का चूर्ण मिला कर एक पहर तक लोहे की कलछुली से चलाता रहे। ऐसा करने से सीसा भस्म हो जाता है। तत्पश्चात् उस भस्म में उसके बराबर ही मैनसिल मिला कर कांजी के साथ पीस कर गजपुट की आग में पकावे, पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः पूर्वोक्त रीति से दो शराव (कोसा) के अन्दर रखकर मैनसिल मिला कर कांजी से पीसकर गजपुट की आग में पकावे। इसी भाँति ६० पुट की आँच देने से सीसा मर जाता है ॥८४-८६॥ अथ मारितसीसकस्य गुणानाह- सीसं रङ्गगुणं ज्ञेयं विशेषान्मेहनाशनम् ।।८७।। नागस्तु नागशततुल्यबलं ददाति व्याधिं च नाशयति जीवनमातनोति । वह्निं प्रदीपयति कामबलं करोति मृत्युञ्च नाशयति सन्ततसेवितः सः ।।८८।। मारे हुये सीसा के गुण-सीसा के गुण यद्यपि राँगा के समान ही होते हैं तथापि यह विशेष कर मेह्रोगनाशक होता है। सीसा निरन्तर सेवन करने से सौ हाथियों के समान बल देने वाला, रोगनाशक, जीवन को बढ़ाने वाला, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, कामशक्ति को बढ़ाने वाला तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है ॥८७-८८॥ अथाशुद्धलौहस्य दोषानाह- खञ्जत्वकुष्ठामयमृत्युकारी हृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । नानारुजानां च तथा प्रकोपं कुर्याच्च हल्लासमशुद्धलौहम् ।।८९।। अशुद्ध लोहा के दोष-अशुद्ध लोहा खञ्जता (लँगड़ापन), कुष्ठरोग, मृत्यु, हृद्रोग, शूल, पथरी, हल्लास (उबकाई) तथा अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति करता है ॥८९॥ अथ लौहस्य दोषशान्तये शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि लौहस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।९०।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं लौहस्य पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।।९१।। लोहा के दोष की शान्ति के लिये शोधनविधि-प्रथम लोहे के अत्यन्त पतले-पतले पत्तरों को लेकर अग्नि में पकावे, तत्पश्चात् तपे हुये उन सबों को क्रम से तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में प्रत्येक में तीन-तीन बार तपा-तपा कर बुझावे। ऐसा करने से लोहा के पत्तरों की शुद्धि होती है ॥९०-९१॥ अथ लौहस्य मारणविधिमाह- शुद्धं लौहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः । मर्दयित्वा पुटेद्द्वौ दद्यादेवं पुटत्रयम् ।।९२।। पुटत्रयं कुमार्याश्च कुठारच्छिन्त्रिकारसैः । पुटषट्क ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत् ।।९३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA