भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ततो द्वियाममात्रेण वङ्गं भस्म प्रजायते। अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाऽम्लेन विमर्दयेत् ॥७६॥ ततो गजपुटे पत्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्। तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्। एवं दशपुटै पक्वं वङ्गं भवति मारितम् ॥७७॥ राँगा के मारण की विधि-मिट्टी के पात्र में गलाये हुये राँगे में इसका चतुर्थांश इमली तथा पीपल की छाल का चूर्ण डाल कर लोहे की कलछुल्ली से चलावे। उसके बाद उक्त रीति से दो प्रहर (६ घण्टे) तक चलाने से रांगा भस्म हो जाता है। फिर उस भस्म में उसके बराबर ही हरताल डाल कर अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस के साथ खूब खरल कर उसे गजपुट की आग में पकावे। पक जाने के बाद पुनः दशवाँ भाग हरताल डाल कर अम्लपदार्थ के रस के साथ एक प्रहर तक खरल करे, तत्पश्चात् पुनः गजपुट की आग में पकाये। इस भाँति १० पुट देकर पकाने से वङ्ग (राँगा) अच्छी तरह मर जाता है ॥७५-७७॥ ❖ चिञ्चा=तिन्तिडी। रजः=चूर्णम्। अयोदर्वी=(लौहहाता) ॥७५-७७॥ ७५ वें श्लोक में 'चिञ्चा' पद से 'इमली' तथा 'रजः' पद से 'चूर्ण' और 'अयोदर्वी' पद से 'कलछुल्ली (लौहहाता)' अर्थ समझना चाहिये ॥७५-७७॥ अथ मारितवङ्गस्य गुणानाह- वङ्गं लघु सरं रूक्षं कुष्ठं मेहकफक्रिमीन्। निहन्ति पाण्डुं सश्वासं नेत्र्यमीषत् पित्तलम् ॥७८॥ सिंहो गजौघं तु यथा निहन्ति तथैव वङ्गोऽखिलमेहवर्गम्। देहस्य सौख्यं प्रबलेन्द्रियत्वं नरस्य पुष्टिं विदधाति नूनम् ॥७९॥ मारे हुए राँगा के गुण-मारा हुआ राँगा-लघु, सारक, रूक्ष एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कृमि, पाण्डु तथा श्वास रोग को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर तथा किञ्चित् पित्तकारक होता है। जिस प्रकार सिंह हाथियों के समूह को नष्ट कर देता है उसी प्रकार मारा हुआ राँगा भी संपूर्ण मेह रोग के समूह को नष्ट करता है और मनुष्यों के देहसम्बन्धी सुख, पुष्टि तथा इन्द्रियों की प्रबलता को निश्चित रूप से करने वाला होता है ॥७८-७९॥ अथ यशदस्य स्वरूपं गुणांश्चाह- यशदं गिरिजं तस्य दोषाः शोधनमारणे। वङ्गस्येव हि बोद्धव्या गुणांस्तु गणयाभ्यथ ॥८०॥ यशदं च सरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासञ्च नाशयेत् ॥८१॥ सीसे का स्वरूप-जस्ता (सीसा) भी पर्वत पर ही उत्पन्न होता है। अतः इसके दोष तथा शोधन और मारण की विधि पूर्वोक्त राँगे के समान ही समझना चाहिये। सीसे के गुण-सीसासारक, तिक्तरसयुक्त, शीतल नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकार एवं कफ तथा पित्त को दूर करने वाला और सभी प्रकार के मेहरोग, पाण्डु-तथा श्वास को नष्ट करने वाला होता है ॥८०-८१॥ अथ सीसकस्य शोधनविधिमाह- तस्य साहजिका दोषा वङ्गस्येव निदर्शिताः। शोधनञ्चापि तस्येव भिषग्भिर्गदितं पुरा ॥८२॥ सीसा के शोधन विधि-सीसा के जो स्वाभाविक दोष हैं वे सब राँगा के समान ही होते हैं। अतः प्राचीन वैद्यों ने इसका शोधन भी राँगा के समान ही बतलाया है ॥८२॥ अथ सीसकस्य मारणबिधिमाह- ताम्बूलरससम्पिष्टं शिलालेपात् पुनः पुनः। द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थं भस्म जायते ॥८३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA